SC ने रद्द किया सावरकर से जुड़ा मानहानि का केस, जानें कैसे मामला पलटा राहुल गांधी के पक्ष में?

रूपक प्रियदर्शी

• 04:43 PM • 15 Aug 2026

सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी प्रक्रिया की खामी और राज्य सरकार की मंजूरी न होने के आधार पर राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज सावरकर टिप्पणी मामले और लखनऊ कोर्ट के समन को पूरी तरह रद्द कर दिया है. हालांकि, अदालत ने स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति जिम्मेदारी से बयानबाजी करने की सख्त हिदायत भी दी है.

राहुल गांधी
राहुल गांधी
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राजनीति में जब बयानों के तीर जब भी चलते हैं, तो वो अक्सर अदालतों की चौखट तक पहुंच जाते हैं. और जब बयान राहुल गांधी के हों  तो उनके मुकदमों की एक लंबी फेहरिस्त खड़ी दिखाई देती है. मानहानि से लेकर हेट स्पीच तक... राहुल गांधी के खिलाफ देश की अलग-अलग अदालतों में करीब एक दर्जन से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज हैं. अकेले मानहानि और बयानों से जुड़े कम से कम 3 बड़े और हाई-प्रोफाइल मामले सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंच चुके हैं. मोदी सरनेम' वाला सबसे चर्चित मामला शामिल है, जिसने एक वक्त पर राहुल गांधी की सांसदी तक छीन ली थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगाकर उन्हें राहत दी. 

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अब सावरकर पर की गई बयानबाजी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी राहत दी है. उनके खिलाफ उत्तर प्रदेश में दर्ज केस को पूरी तरह रद्द कर दिया है. लखनऊ कोर्ट की तरफ से जारी समन को भी खारिज कर दिया गया है. कोर्ट ने इस मामले को तकनीकी और कानूनी आधार पर पूरी तरह समाप्त कर दिया है. फैसला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने सुनाया है. जब अप्रैल 2025 में इस मामले पर अंतरिम रोक (Stay) लगाई गई थी, तब उस बेंच में जस्टिस दीपांकर दत्ता के साथ जस्टिस मनमोहन शामिल थे. आइए आपको बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने किस ग्राउंड पर राहुल गांधी को राहत दी, उत्तर प्रदेश सरकार का इसमें क्या स्टैंड रहा और इस पूरी कहानी का बैकग्राउंड क्या है. 

विवाद साल 17 नवंबर 2022 का है

यह पूरा विवाद साल 17 नवंबर 2022 का है. राहुल गांधी अपनी 'भारत जोड़ो यात्रा' के दौरान महाराष्ट्र के अकोला जिले में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे. इस दौरान उन्होंने हिंदुत्व विचारक विनायक दामोदर सावरकर को लेकर एक विवादित बयान दिया. राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि सावरकर अंग्रेजों के मददगार (collaborator) थे और वे अंग्रेजों से पेंशन लिया करते थे.राहुल गांधी के इस बयान के बाद लखनऊ के एक वकील नृपेंद्र पांडेय ने कोर्ट में  शिकायत (Private Complaint) दर्ज कराई. शिकायत में आरोप लगाया गया कि राहुल गांधी ने जानबूझकर सावरकर का अपमान किया और समाज में नफरत व वैमनस्य फैलाने के इरादे से यह बयान दिया, जिससे सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ सकता था. इस शिकायत पर संज्ञान लेते हुए लखनऊ की एक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने दिसंबर 2024 में राहुल गांधी को बतौर आरोपी समन जारी कर दिया था.

राहुल गांधी ने इस समन और आपराधिक कार्यवाही को पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन अप्रैल 2025 में हाईकोर्ट ने राहत देने से इनकार करते हुए उन्हें सेशंस कोर्ट जाने को कह दिया था. इसके बाद राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तकनीकी और कानूनी पहलू सबसे बड़ा आधार बना. राहुल गांधी के खिलाफ आईपीसी की धारा 153A (सांप्रदायिक नफरत फैलाना) और धारा 505 (सार्वजनिक शरारत) के तहत आरोप लगाए गए थे. इन धाराओं के तहत किसी भी व्यक्ति पर मुकदमा चलाने के लिए राज्य सरकार  औपचारिक कानूनी मंजूरी लेना अनिवार्य होता है. सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस मामले में कानून की इस अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था.

मुकदमे के लिए कोई मंजूरी जारी नहीं

बड़ा बाउंसर उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) के.एम. नटराज ने फेंका. सुप्रीम कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार की तरफ से इस मुकदमे के लिए कोई मंजूरी जारी नहीं की गई है. यूपी सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे के मुताबिक, उनके रिकॉर्ड में राहुल गांधी के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देने का कोई विवरण या रिकॉर्ड मौजूद नहीं है. जब सरकार ने स्वयं स्वीकार किया कि मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं दी गई है, तो कोर्ट ने साफ कहा कि बिना वैध मंजूरी के मजिस्ट्रेट द्वारा लिया गया संज्ञान और जारी किया गया समन गैर-कानूनी है. इसी तकनीकी आधार पर शिकायत को कूड़े के ढेर में डाल दिया गया.

भले ही तकनीकी आधार पर राहुल गांधी को आज केस से मुक्ति मिल गई हो, लेकिन इसी केस की पिछली सुनवाइयों के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को कड़ी फटकार भी लगाई थी. कोर्ट ने उनके बयानों को गैर-जिम्मेदाराना बताया था और चेतावनी दी थी कि देश के स्वतंत्रता सेनानियों का इस तरह मजाक नहीं उड़ाया जाना चाहिए. अदालत ने मौखिक तौर पर यह भी कहा था कि यदि भविष्य में राहुल गांधी ने स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ ऐसी टिप्पणियां दोहराईं, तो कोर्ट खुद संज्ञान लेते हुए उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू कर सकता है. कोर्ट ने याद दिलाया था कि खुद राहुल गांधी की दादी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी सावरकर की तारीफ में पत्र लिखा था.

विनायक दामोदर सावरकर को लेकर राहुल पर चल रहा ये अकेला केस नहीं है. राहत एक केस में मिली है.  वीर सावरकर के पोते सत्यकी सावरकर ने पुणे की अदालत में आपराधिक मानहानि का केस दर्ज कराया है. आरोप है कि राहुल गांधी ने मार्च 2023 में लंदन के एक कार्यक्रम में दावा किया था कि सावरकर ने अपनी किताब में लिखा था कि उन्होंने और उनके दोस्तों ने एक मुस्लिम व्यक्ति की पिटाई की थी और उन्हें खुशी मिली थी. सत्यकी का कहना है कि सावरकर ने ऐसा कभी कहीं नहीं लिखा. इस मामले में पुणे पुलिस कोर्ट में जांच रिपोर्ट भी सौंप चुकी है.

सत्यकी सावरकर ने कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया

इस मामले में राहुल गांधी को जनवरी 2025 में कोर्ट से जमानत और कोर्ट में पेशी से स्थायी छूट मिल चुकी है. पुणे कोर्ट में शिकायतकर्ता सत्यकी सावरकर का क्रॉस-एग्जामिनेशन चल रहा है, जो पिछले 7 महीनों से जारी है. सत्यकी सावरकर ने कोर्ट में एक याचिका दायर कर आरोप लगाया कि राहुल गांधी के वकील जिरह को जानबूझकर लंबा खींच रहे हैं, जिससे उन्हें मानसिक प्रताड़ना हो रही है; इसलिए उन्होंने कोर्ट से जिरह पूरी करने के लिए एक सख्त टाइमलाइन (समय-सीमा) तय करने की मांग की है. इसके साथ ही, इस केस में एक बड़ा तकनीकी अपडेट यह भी आया कि गूगल ने राहुल गांधी के उस विवादित लंदन भाषण (मार्च 2023) के यूट्यूब वीडियो और चैनल से जुड़े डेटा को सीलबंद लिफाफे में पुणे कोर्ट को सौंप दिया है, क्योंकि इससे पहले शिकायतकर्ता द्वारा दी गई वीडियो सीडी खाली (ब्लैंक) निकली थी.

सावरकर के मुद्दे पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच की सियासी जंग जगजाहिर है. राहुल गांधी लगातार अपने भाषणों में सावरकर और सावरकर की विचारधारा पर हमला बोलते रहे हैं. यूपी के लखनऊ में दर्ज इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी प्रक्रिया का पालन न होने के आधार पर राहुल गांधी को बरी कर दिया है. लेकिन कोर्ट की वह नसीहत भी राजनीतिक गलियारों में गूंज रही है, जिसमें कहा गया था कि आजादी की लड़ाई लड़ने वालों का सम्मान होना चाहिए. 

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