CJP के बाद अब सोशल मीडिया पर तेजी से बढ़ रही RHA की गूंज, जानिए क्या है इनकी मांगे और इतिहास से इसका नाता?

राजू झा

• 01:01 PM • 28 Jul 2026

Reservation Hatao Andolan: कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद अब सोशल मीडिया पर रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन की गूंज तेजी से फैल रही है. जानिए आखिर क्या है यह आंदोलन, इसकी प्रमुख मांगें क्या हैं, इसे कौन चला रहा है, सोशल मीडिया पर यह इतना तेजी से क्यों बढ़ रहा है और इसकी तुलना मंडल आयोग आंदोलन से की जा रही है.

Reservation Hatao Andolan
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सोशल मीडिया के जरिए जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन और पेपर लीक के मुद्दे पर देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब एक और नया डिजिटल कैंपेन तेजी से चर्चा में आ गया है. CJP के सफल प्रदर्शन और E20 जनता पार्टी की पेट्रोल विकल्पों से जुड़ी मांगों के बीच अब इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 'रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन'(RHA) जोर पकड़ रहा है. खबर लिखे जाने तक इंस्टाग्राम पर इस आंदोलन के अकाउंट से 5.5 मिलियन (55 लाख) से भी अधिक फॉलोअर्स जुड़ चुके हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर क्या है यह नया आंदोलन और इसे कौन चला रहा है? आइए विस्तार से जानते है इन्हीं सवालों के जवाब और साथ ही जानते हैं इसके पीछे की पूरी कहानी.

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क्या है 'रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन' और कौन चला रहा है इसे?

रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन यानी RHA किसी रजिस्टर्ड राजनीतिक दल का बैनर नहीं है, बल्कि यह युवाओं द्वारा संचालित एक नया डिजिटल और सोशल मीडिया अभियान है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, CJP के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के बाद इसे जनरल और कुछ ओबीसी (OBC) कैटेगरी के युवाओं ने मिलकर शुरू किया है. इस अभियान का मुख्य उद्देश्य देश में जाति के आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण को पूरी तरह समाप्त करना है.

अभियान के समर्थकों की मांग है कि सरकारी नौकरियों और कॉलेज एडमिशन में चयन केवल प्रतिभा (टैलेंट), अंक और योग्यता (मेरिट) के आधार पर होना चाहिए, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक स्थिति से पिछड़े युवाओं के सपनों को साकार करने के लिए आर्थिक आधार पर मदद दी जानी चाहिए. इस पेज पर 'रिजर्वेशन इज डिस्क्रिमिनेशन' जैसे नारे भी दिए गए हैं.

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस और नेतृत्व की स्थिति

पेज के एडमिन और इसके समर्थकों का इरादा इसे CJP की तर्ज पर एक बड़े धरातलीय आंदोलन में बदलने का है. हालांकि, जानकारों का मानना है कि CJP का मुद्दा हर वर्ग के छात्रों से जुड़ा था जिसके आगे सरकार को झुकना पड़ा, जबकि आरक्षण एक बेहद संवेदनशील और संवैधानिक विषय है. इस अभियान को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी बहस जारी है.

एक पक्ष इसे मेरिट आधारित पारदर्शी व्यवस्था की दिशा में जरूरी कदम मान रहा है, तो दूसरा पक्ष इसे सामाजिक न्याय और ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करने के लिए आवश्यक बता रहा है. फिलहाल इस अभियान का मुख्य चेहरा कौन है या यह पेज किसने बनाया है, इसकी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में CJP की तरह कोई चेहरा सामने आ सकता है.

1990 का मंडल कमीशन आंदोलन: जब सड़कों पर उतरी थी हिंसक क्रांति

आरक्षण विरोधी आंदोलनों का देश में एक लंबा इतिहास रहा है, जिसकी तुलना आज के इस डिजिटल आंदोलन से की जा रही है. साल 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की थी. इसके विरोध में दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार समेत पूरे देश में सामान्य वर्ग के छात्रों और युवाओं ने चक्का जाम और उग्र प्रदर्शन किए थे. इस आंदोलन में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी मुख्य चेहरा बने थे, जिन्होंने आत्मदाह का प्रयास किया था. उस दौरान हुए भारी राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल के कारण तत्कालीन सरकार तक गिर गई थी.

2006 का 'यूथ फॉर इक्वालिटी' प्रदर्शन और राज्यों के स्तर पर टकराव

साल 2006 में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह की अगुवाई में केंद्र सरकार ने एम्स (AIIMS), आईआईटी (IITs), आईआईएम (IIMs) और केंद्रीय विश्वविद्यालयों जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी वर्ग के लिए 27 प्रतिशत कोटा लागू करने का प्रस्ताव रखा. इसके विरोध में 'यूथ फॉर इक्वालिटी' के बैनर तले सैकड़ों मेडिकल छात्रों, डॉक्टरों और इंजीनियरों ने देशव्यापी हड़ताल और आंदोलन किया.

नई दिल्ली में पुलिस द्वारा लाठीचार्ज और वाटर कैनन के इस्तेमाल के बाद यह विरोध पूरे देश में फैल गया था. इसके अलावा 2015 में गुजरात का पाटीदार आंदोलन (हार्दिक पटेल के नेतृत्व में), 2016 में हरियाणा का जाट आंदोलन, महाराष्ट्र का मराठा आंदोलन और 2018 का एससी-एसटी कानून के खिलाफ भारत बंद भी आरक्षण और जातिगत व्यवस्था की समीक्षा को लेकर बड़े टकराव के रूप में देखा गया.

1990, 2006 और जुलाई 2026 के आंदोलन में क्या है अंतर?

आरक्षण से जुड़े इन तीनों दौर के आंदोलनों का स्वरूप एक-दूसरे से काफी अलग रहा है. 1990 का मंडल कमीशन आंदोलन पूरी तरह सड़कों पर लड़ा गया एक हिंसक और भावनात्मक आंदोलन था. साल 2006 का आंदोलन डॉक्टरों, इंजीनियरों और पेशेवरों का एक संगठित विरोध प्रदर्शन था.

वहीं जुलाई 2026 का 'रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन' पूरी तरह से जन-जी (Gen-Z) युवाओं का एक डिजिटल और सोशल मीडिया-सेंट्रिक अभियान है, जो बिना किसी राजनीतिक झंडे के ऑनलाइन चलाया जा रहा है. अब देखने वाली बात यह होगी कि सोशल मीडिया पर चल रही यह डिजिटल क्रांति धरातल पर कितना असर दिखा पाती है और आने वाले दिनों में इसे क्या मोड़ मिलता है.

यहां देखें वीडियो

E20 Janta Party: CJP के बाद सोशल मीडिया पर उभरी 'E20 जनता पार्टी', नितिन गडकरी के इस्तीफे की उठाई मांग