एंटी-गवर्नमेंट नैरेटिव वाले शेखर सुमन क्यों संजय दत्त को बचा रहे, कभी ज्वॉइन तो नहीं की क्यों संजय दत्त कहते रहे खून में कांग्रेस?

रूपक प्रियदर्शी

• 12:53 PM • 06 Oct 2026

बॉलीवुड के 'ग्रेट सरवाइवर' संजय दत्त हाल ही में एक टॉक शो में राजनीतिक तंज कसकर विवादों में घिर गए, जिसके बाद उन्हें अपनी सफाई देनी पड़ी. विवादों, कानूनी मुकदमों और निजी त्रासदियों से भरे जीवन के बावजूद हर बार उठ खड़े होने की उनकी यह अदम्य भावना ही उन्हें सिनेमा का अनूठा किरदार बनाती है.

संजय दत
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बॉलीवुड का एक ऐसा चमकता सितारा, जिसकी जिंदगी में शोहरत भी चरम पर रही और रुसवाई भी. जो फर्श से उठा, अर्श पर पहुंचा, फिर गुनाहों और कानूनी पचड़ों के ऐसे गर्त में गिरा जहां से लौटना नामुमकिन था, लेकिन वो शख्स हर बार मौत और बर्बादी को मात देकर वापस खड़ा हो गया. हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के ग्रेट सरवाइवर संजय दत्त की. संजू बाबा इस बार चर्चित चेहरा बने हैं लेकिन पर्सनल लाइफ, बॉलीवुड करियर या किसी केस-मुकदमे के कारण नहीं. अबकी बार उन्होंने कुछ ऐसा बोला है जिसका निशाना सीधे माना जा रहा है देश की सरकार के ऊपर. इतना कुछ बोले कि सोशल मीडिया संजय दत्त के लिए चेतावनियों से भर गया.  आनन-फानन में संजय दत्त रफू करने में जुटे हैं. जितने प्लेटफॉर्म हैं उस पर लिखा बयान हुआ बयान डालकर सफाई दे रहे हैं जिसका भाव माफी से भरा है. 

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अरसे से राजनीतिक चर्चाओं से दूर रहने वाले संजय दत्त बोले भी कहां जाकर? किसी जमाने में कांग्रेस में रह चुके एक्टर शेखर सुमन के टॉक शो में जिनकी ब्रैंडिंग हो चुकी है सरकार और बीजेपी विरोध की. गांधी जयंती के मौके पर शेखर सुमन टॉक शो Shekhar Tonite लेकर आए. शो में संजय दत्त मेहमान बनकर पहुंचे. बातचीत हुई देश के मौजूदा हालात पर. संजय दत्त ने बिना किसी सरकार, पार्टी, नेता का नाम लिए कह दिया कि भारत में अब मुझे वो शांति महसूस नहीं होती. हम भारतीय बड़े दिल वाले और मेहमाननवाज हैं. मैं शिवजी से प्रार्थना करता हूं कि वो पुराने दिन वापस आ जाएं.

शो के एक मजेदार सेगमेंट में संजय दत्त को 5 मिनट के लिए देश का काल्पनिक प्रधानमंत्री बनने को कहा गया. आइकॉनिक मुन्ना भाई वाले अंदाज में देश को संबोधित करते हुए नेताओं के लगातार होने वाले विदेशी दौरों, हर जगह बड़े-बड़े पोस्टर्स लगाने और गांधीजी के चौथे बंदर का जिक्र करते हुए देश की राजनीतिक व्यवस्था पर तीखे तंज कस दिए. मजाकिया लहजे में कह दिया अगर मैं पीएम बना तो आनंद मनाने विदेश नहीं जाऊंगा, यहीं अपनी जनता के बीच रहूंगा.

फिर तो वही हुआ जो आम तौर पर होता है. संजय दत्त का बयान इंटरनेट पर आग की तरह फैला. उनके बयानों को पीएम मोदी और सरकार पर सीधा हमला माना गया. बीजेपी समर्थकों ने संजय दत्त का अतीत कुरेदते हुए रगड़ दिया कि यरवदा जेल में सजा काट चुके और शराब का कारोबार करने वाले व्यक्ति से देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए. अगर उन्हें भारत में शांति नहीं दिखती, तो पाकिस्तान चले जाएं.

 पूरी तरह से स्क्रिप्टेड थीं बातें 

संजय दत्त ने अनुमान नहीं लगाया कि उनका हंसी-खेल इतना भारी पड़ेगा. सफाई में कहा कि मेरा इरादा किसी भी व्यक्ति, समुदाय या संस्था की भावनाओं को ठेस पहुंचाना बिल्कुल नहीं था. वो सारी बातें पूरी तरह से स्क्रिप्टेड थीं और सिर्फ एक हल्के-फुल्के कॉमेडी एक्ट का हिस्सा थीं. इसका मकसद मुन्ना भाई की गांधीगिरी की तरह सिर्फ प्यार, सद्भाव और एकजुटता का संदेश देना था, जिसे संदर्भ से बाहर निकालकर देखा गया. शो के होस्ट शेखर सुमन ने भी बचाव किया कि संजय दत्त पक्के देशभक्त हैं. उनके मजाक को गलत तरीके से पढ़ा गया.

पूरे विवाद का एक सिरा 2015 के उस मशहूर विवाद से भी जुड़ता है जब आमिर खान और अब पूर्व हो चुकी उनकी पत्नी किरन राव ने देश में असहिष्णुता यानी Intolerance की डिबेट छेड़ी थी. आमिर खान ने बयान दिया था कि देश के माहौल को देखते हुए किरन राव ने एक बार भारत छोड़ने की बात कही थी. फिर आमिर खान एंटी सरकार, एंटी बीजेपी डिक्लेअर कर दिए गए. अब ठीक वैसा ही नैरेटिव संजय दत्त के लिए बना है.

संजय दत्त अराजनीतिक हो चुके हैं लेकिन उनका लंबा इतिहास है राजनीतिक होने का. मां नरगिस दत्त को शानदार एक्टिंग के इनाम के तौर पर 1980 में राज्यसभा का सांसद मनोनीत किया गया था. हालांकि, साल भर बाद 1981 में कैंसर से मौत हो गई. दत्त परिवार से राजनीति छूट रही थी लेकिन सुनील दत्त ने मौके को जाने नहीं दिया. एक्टिव एक्टिंग करियर के बीच उन्होंने बड़ा जोखिम लिया. 1987 में पंजाब में फैले आतंकवाद के खिलाफ उन्होंने मुंबई से अमृतसर तक की ऐतिहासिक महाशांति पदयात्रा की. वहीं से कांग्रेस से जुड़ते गए. एक बार कांग्रेस का हाथ थामा तो आखिरी दम तक नहीं छोड़ा. मुंबई उत्तर-पश्चिम सीट से कांग्रेस के टिकट पर पांच बार लोकसभा चुनाव जीते. 2004 में मनमोहन सिंह सरकार की बनी तो खेल और युवा मामलों के कैबिनेट मंत्री भी बने. 

2005 में सुनील दत्त भी नहीं रहे तो कांग्रेस ने उनकी जगह बेटी प्रिया दत्त को सौंप दी. प्रिया दत्त ने कांग्रेस के टिकट पर मुंबई उत्तर-पश्चिम सीट से चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज कर संसद पहुंचीं. 2009 में भी मुंबई उत्तर-मध्य सीट से दोबारा सांसद चुनी गईं. 2014 और 2019 की मोदी लहर में उन्हें बीजेपी की पूनम महाजन से हार का सामना करना पड़ा. प्रिया दत्त आज भी कांग्रेस में हैं. उन्होंने मुंबई में सुनील दत्त की राजनीति को भी जिंदा रखा और भाई संजय दत्त के लिए भी मजबूत चट्टान की तरह खड़ी रहीं.

घर से अवैध एके-56 राइफल और भारी गोला-बारूद बरामद हुआ

सुनील दत्त के रहते 1981 में संजय दत्त बॉलीवुड में डेब्यू कर चुके थे. उनका करियर बढ़िया चलते हुए करीब 10 साल बाद गलत संगत में फंसा. 1993 के मुंबई सीरियल बम धमाकों से संजय दत्त की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई.  संजय दत्त मॉरीशस में अपनी फिल्म आतिश की शूटिंग करके जैसे ही मुंबई के सहार एयरपोर्ट पर लैंड हुए, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. आरोप लगा कि धमाकों में तस्करी से लाए गए हथियार इस्तेमाल अपने पास रखे. घर से अवैध एके-56 राइफल और भारी गोला-बारूद बरामद हुआ. जिस केस में दाऊद इब्राहिम, अबू सलेम जैसे आतंकी आरोपों में घिरे उसी में संजय दत्त सख्त टाडा कानून और आर्म्स एक्ट के तहत केस दर्ज करके गिरफ्तार करके जेल भेजा गया. संजय दत्त आतंकियों की कैटेगरी में आ गए. 

तब शुरू हुआ पिता सुनील दत्त की जिंदगी और राजनीति का सबसे बड़ा इम्तिहान. बेटे के कारण सुनील दत्त भी देशद्रोही पुकारे गए लेकिन कांग्रेस ने उन पर संजय दत्त वाली आंच नहीं आने दी. हालांकि कभी ये भी कभी सामने नहीं आया कि कांग्रेस में से किसी ने बेटे को बचाने में उनकी मदद की हो. दत्त परिवार की राजनीति का एक और सिरा जुड़ा शिवसेना के प्रमुख बालासाहेब ठाकरे से. मुंबई की राजनीति में धुर-विरोधी होने के बाद भी बालासाहेब ठाकरे ने संजय के लिए सुनील दत्त की मदद की. संजय दत्त को 15 महीने की जेल के बाद जमानत मिली. जेल से बाहर आते ही संजय दत्त सबसे पहले बालासाहेब का आशीर्वाद लेने मातोश्री ही पहुंचे थे.

सुनील दत्त के जाने के बाद प्रिया दत्त के जरिए परिवार कांग्रेस से जुड़ा रहा लेकिन संजय दत्त कभी नहीं जुड़ पाए. 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने बड़ा धमाका किया. फैमिली की पॉलिटिकल लेगेसी को छोड़कर अमर सिंह के जरिए मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी ज्वाइन कर ली. पार्टी ने हाथों-हाथ लिया और तुरंत सपा का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया. केस-मुकदमों में फंसे बहुत सारे लोगों ने राजनीति के जरिए खुद को मजबूत किया लेकिन संजय दत्त ने ऐसी किस्मत नहीं पाई. 

2007 में जब टाडा कोर्ट की सजा के बाद संजय दत्त सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत पर बाहर आए, तो दिल्ली जाकर कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मिले थे लेकिन राजनीतिक पारी धमाके से शुरू हुई, धमाके से खत्म हो गई. जब 2009 में समाजवादी पार्टी ने संजय दत्त को लखनऊ से उम्मीदवार घोषित किया, तब उन पर 1993 धमाकों से जुड़े आर्म्स एक्ट मामले में 2007 में मिली 6 साल की सजा का फैसला प्रभावी था. संजय दत्त ने चुनाव लड़ने की अनुमति पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. सजा पर रोक लगाने की मांग की थी लेकिन कोर्ट ने चुनाव लड़ने नहीं दिया.  हालांकि बाद में 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने ही सजा घटाकर 5 साल कर दी. 

राजनीति में संजय दत्त स्टार प्रचारक से आगे नहीं बढ़ पाए. 2010 में अमर सिंह पार्टी से बाहर कर दिए गए. कड़वाहट के साथ संजय दत्त की भी कहानी सपा में खत्म हो गई. बाद में उन्होंने भावुक होकर माना था कि दत्त खानदान के खून में सिर्फ कांग्रेस पार्टी बहती है और वो अमर सिंह के खातिर भटक गए थे. फिर भी वो कभी राजनीति के आसपास नहीं भटके. 

जवानी के दिनों में भयंकर ड्रग्स की लत

संजय दत्त की कहानी सिर्फ एक एक्टर की कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसे इंसान की दास्तान है जिसने जिंदगी के हर उस थपेड़े को झेला है जो किसी का भी हौसला तोड़ दे. जवानी के दिनों में भयंकर ड्रग्स की लत, पहली फिल्म 'रॉकी' के प्रीमियर से ठीक तीन दिन पहले मां नरगिस का कैंसर से निधन, पहली पत्नी रिचा शर्मा की कैंसर से मौत, 24 साल तक टाडा कोर्ट और जेल के चक्कर, आर्म्स एक्ट के तहत यरवदा जेल में पांच साल की सख्त सजा काटना, और कुछ साल पहले खुद फेफड़ों के एडवांस स्टेज के कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को हराना- संजय दत्त  ने हर एक मोर्चे पर जिंदगी की जंग जीती है.

जब-जब दुनिया ने यह मान लिया कि संजय दत्त का दौर खत्म हो चुका है, तब-तब उन्होंने स्क्रीन पर आकर 'वास्तव', 'मुन्ना भाई एमबीबीएस', 'अग्निपथ' के कांचा चीना और 'केजीएफ चैप्टर 2' के अधीरा जैसे किरदारों से बॉक्स ऑफिस को हिलाकर रख दिया. आज शेखर सुमन के शो वाले विवाद ने भले ही उन्हें फिर से चर्चा में ला दिया हो, लेकिन संजय दत्त का यह 'फाइटिंग स्पिरिट' और उनका यह सर्वाइवल नैरेटिव उन्हें भारतीय सिनेमा का सबसे दिलचस्प और कभी न मिटने वाला किरदार बनाता है.

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