हाल ही में चार राज्यों की 28 विधान परिषद (MLC) सीटों के नतीजे सामने आए, जिनमें बिहार की 8, कर्नाटक की 4, महाराष्ट्र की 5 और उत्तर प्रदेश की 11 सीटें शामिल थीं. इन परिणामों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है. खास तौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि सत्ताधारी दल के लिए 'सुरक्षित' माने जाने वाले गढ़ अब उतने सुरक्षित नहीं रहे हैं. आइए समझते हैं कि आखिर इन चुनावों में समीकरण कैसे बदले और किस तरह राजनीतिक खेल पलट गया.
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यूपी में क्या रहा हाल? अयोध्या-काशी दोनों हाथों से फिसलीं
उत्तर प्रदेश की 11 MLC सीटों के लिए 23 अक्टूबर को हुए मतदान के परिणामों में बीजेपी ने 5 और समाजवादी पार्टी ने 2 सीटें अपने नाम कीं, जहां मेरठ से दिनेश गोयल व श्रीचंद शर्मा, बरेली से डॉ. हरि सिंह ढिल्लों, लखनऊ से उमेश द्विवेदी और आगरा खंड स्नातक से मानवेन्द्र प्रताप सिंह ने बीजेपी को जीत दिलाई, तो वहीं दूसरी ओर वाराणसी व आगरा खंड की शिक्षक सीटों पर क्रमशः लाल बिहारी यादव और आकाश अग्रवाल ने और इलाहाबाद-झांसी खंड स्नातक सीट पर डॉ. मान सिंह यादव ने सपा की झोली में जीत डाली.
वाराणसी और अयोध्या का संदेश
सबसे ज्यादा चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की शिक्षक सीट की हो रही है. लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अयोध्या सीट गंवानी पड़ी थी और अब MLC चुनाव में वाराणसी शिक्षक सीट भी हाथ से निकल गई यानी बीजेपी ने अपने दोनों सबसे बड़े वैचारिक और राजनीतिक गढ़ गंवा दिए हैं.
वाराणसी में सपा के लाल बिहारी यादव ने करीब 4,900 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि पुरानी पेंशन योजना (OPS), शिक्षकों के मानदेय और रोजगार जैसे मुद्दों पर यह वर्ग सरकार की नीतियों से नाखुश था. क्योंकि, इसे 2027 के विधानसभा चुनाव का 'सेमीफाइनल' माना जा रहा था, इसलिए ये परिणाम सत्ताधारी दल के लिए एक बड़ा वेक-अप कॉल है. वहीं, इस जीत से सपा का मनोबल सातवें आसमान पर है और पूर्वांचल में पार्टी की स्थिति और मजबूत हुई है.
पटना में बीजेपी को बड़ा झटका, जन सुराज की एंट्री
बिहार की 8 एमएलसी सीटों के चौंकाने वाले परिणामों में पटना शिक्षक सीट से आरजेडी के डॉ. संजीव, तिरहुत शिक्षक सीट से बीजेपी के नरेंद्र सिंह, दरभंगा शिक्षक सीट से 'जन सुराज' के सुरेश प्रसाद राय, सारण शिक्षक सीट से बीजेपी के बागी निर्दलीय राहुल राज और पटना स्नातक व कोसी स्नातक सीटों पर जेडीयू के नीरज कुमार और बीजेपी के डॉ. एन.के. यादव ने जीत हासिल की.
पटना में टूटा 3 दशक पुराना तिलिस्म
बिहार में सबसे बड़ा उलटफेर पटना शिक्षक सीट पर हुआ. यहां आरजेडी उम्मीदवार डॉ. संजीव कुमार ने बीजेपी के दिग्गज और पिछले 30 सालों (तीन दशकों) से लगातार जीतते आ रहे सिटिंग एमएलसी नवल किशोर यादव को 1,057 वोटों के अंतर से हरा दिया. केंद्र और राज्य दोनों जगह एनडीए की सरकार होने के बावजूद इस 'सुपर सेफ' सीट पर हार यह बताती है कि शिक्षित वर्ग में सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) किस हद तक हावी है.
एनडीए के भीतर खींचतान और जन सुराज का उभार
बिहार में एनडीए के लिए यह चुनाव कई झटके लेकर आया. पटना स्नातक सीट पर जहां जेडीयू के नीरज कुमार मैदान में थे, वहीं एनडीए के भीतर ही बागी तेवर देखने को मिले, जैसे बाहुबली विधायक अनंत सिंह का जन सुराज समर्थित उम्मीदवार का समर्थन करना. इसके अलावा, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बाद सम्राट चौधरी के नेतृत्व में एनडीए का यह प्रदर्शन बहुत उत्साहजनक नहीं रहा है. हाल ही में बांकीपुर उपचुनाव में हार और अब दरभंगा शिक्षक सीट पर प्रशांत किशोर की 'जन सुराज' पार्टी के उम्मीदवार सुरेश प्रसाद राय की जीत ने यह साफ कर दिया है कि बिहार के पढ़े-लिखे और प्रबुद्ध वर्ग के बीच एनडीए का जनाधार खिसक रहा है.
2027 के विधानसभा चुनावों से पहले सबक
एमएलसी और शिक्षक-स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के ये चुनाव आम जनता के बजाय शिक्षकों, स्नातकों और सरकारी कर्मचारियों जैसे प्रबुद्ध वर्ग की सोच को दर्शाते हैं. इन चुनावों के नतीजे साफ इशारा करते हैं कि जनता केवल राजनीतिक हवा के भरोसे वोट नहीं कर रही, बल्कि जमीनी मुद्दे- जैसे पुरानी पेंशन, रोजगार और मानदेय सबसे ऊपर हैं. आने वाले समय में मुख्यधारा की पार्टियों को इन समीकरणों पर गंभीरता से विचार करना होगा, वरना यह छोटी दिखने वाली हार बड़े चुनावों में भारी पड़ सकती है.
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