पिता-पुत्र की लड़ाई, कोर्ट केस और दर्द भरे साल…कौन हैं रेमंड के 'कम्प्लीट मैन' विजयपत सिंघानिया, जिनकी अंतिम यात्रा ने बदल दी परिवार की पूरी कहानी?

Gautam Singhania Family Dispute: रेमंड के ‘कम्प्लीट मैन’ विजयपत सिंघानिया की जिंदगी सिर्फ सफलता की कहानी नहीं थी, बल्कि रिश्तों के उतार-चढ़ाव से भरी एक भावनात्मक यात्रा थी. मौत के बाद उनकी अंतिम विदाई में बिखरा परिवार एक साथ नजर आया, जहां सालों की तकरार और कानूनी लड़ाइयां आंसुओं में बहती दिखीं और सुलह की तस्वीर सामने आई.

Vijaypat Singhania Raymond owner story
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रूपक प्रियदर्शी

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Vijaypat Singhania Raymond owner story: यह कहानी है उस 'कम्प्लीट मैन' की विरासत की जिसने सिर्फ कपड़े नहीं, बल्कि एक पूरी पहचान गढ़ी, लेकिन इस चमकदार साम्राज्य के पीछे रिश्तों की डोर कई बार उलझती और टूटती भी नजर आई. सिंघानिया परिवार की यह दास्तान उतनी ही भावनात्मक है, जितनी उतार-चढ़ाव भरी. यहां कभी पिता-बेटे के रिश्तों की कसौटी हुई, तो कभी पति-पत्नी के बीच दरारें सामने आईं. सास-बहू के समीकरण भी बदले, लेकिन इन सबके बीच प्यार, तकरार और फिर जुड़ाव की एक पूरी कहानी बनती चली गई, जिसका अंत किसी फिल्मी हैप्पी एंडिंग जैसा महसूस होता है.

देश के दिग्गज उद्योगपति विजयपत सिंघानिया अब हमारे बीच नहीं रहे. रेमंड को नई पहचान देने वाले और कम्प्लीट मैन की छवि गढ़ने वाले सिंघानिया का 28 मार्च 2026 को निधन हो गया. यह दिन उनके परिवार के लिए गहरा सदमा लेकर आया. लंबे समय से अकेलेपन में जीवन बिता रहे विजयपत सिंघानिया की अंतिम विदाई एक खास मायने में 'कम्प्लीट' रही क्योंकि बिखरा हुआ परिवार एक साथ उन्हें अंतिम प्रणाम देने पहुंचा.

चंदनवाड़ी श्मशान घाट पर इस दौरान कई चर्चित चेहरे नजर आए. बेटे गौतम सिंघानिया ने आपसी तनाव के बावजूद बेटे का फर्ज निभाया. वहीं, पारिवारिक मतभेदों के बावजूद बहू नवाज ने भी मजबूती से परिवार का साथ दिया. इस पूरे घटनाक्रम में आशादेवी सिंघानिया की भूमिका भी अहम रही, जिन्होंने अपने बनाए परिवार को बिखरते भी देखा और फिर से एक होते भी.

बेटे का फर्ज और अंतिम विदाई की भावुक तस्वीरें

मुंबई के चंदनवाड़ी श्मशान घाट पर विजयपत सिंघानिया के अंतिम संस्कार की तस्वीरें इंटरनेट पर बहुत वायरल हैं. गौतम सिंघानिया, जो कभी अपने पिता से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे, उन्होंने बेटे का फर्ज निभाते हुए पिता के पार्थिव शरीर को कंधा दिया. हो सकता है प्यार के पीछे कोई पछतावा भी छुपा हो. 29 मार्च की दोपहर, मुंबई के चंदनवाड़ी श्मशान घाट पर जब गौतम सिंघानिया ने अपने पिता के पार्थिव शरीर को कंधा दिया, तो वो कोई 'पावरफुल बिजनेसमैन' नहीं, बल्कि पिता को खोने वाला एक बेटा था. सालों की तकरार, कोर्ट के केस और परिवार की सार्वजनिक जगहंसाई... सब कुछ उस चिता के धुएं के साथ उड़ गया. अंतिम विदाई के समय गौतम की नम आँखें शायद यही कह रही थीं कि काश, यह सुलह थोड़ी और पहले हो गई होती.

कानूनी कागजों से परे, एक हुआ परिवार

भले विजयपत और गौतम सिंघानिया के रिश्ते खराब हुए, भले नवाज मोदी एक दिन पति से विवाद के कारण अपने ही घर-ससुराल से बाहर की गई हों, लेकिन बाबूजी को आखिरी विदाई की घड़ी आई तो सब आए, सबके साथ दिखे. ये सब देख विजयपत सिंघानिया सुकून से अंतिम यात्रा पर गए हों. उनके साथ उनका पूरा परिवार था. वही परिवार जो कभी कानूनी कागजों में उलझा था, आज उनके सिरहाने खड़ा था.

ससुर और बहू के बीच अटूट 'बाप-बेटी' का रिश्ता

सिंघानिया खानदान की बहू नवाज़ ने भी क्या कुछ नहीं झेला. उस दौर में ससुर और बहू बाप-बेटी बनकर एक-दूसरे की ढाल बने जब दोनों का अपना घर, अपना परिवार अपना नहीं रहा. चंदनवाड़ी श्मशान घाट का माहौल भारी था. सबकी निगाहें नवाज़ मोदी सिंघानिया पर टिकी थी. नवाज़ मोदी सिंघानिया साये की तरह अपने ससुर के साथ रहीं. उन्होंने विजयपत जी को हमेशा अपना "दूसरा पिता" माना.

सास और बहू: ममता और सहारे की एक मिसाल

विजयपत सिंघानिया के अंतिम संस्कार के दिन, मुंबई की तपती दोपहर में आशादेवी पूरी तरह टूट चुकी थीं. सफेद साड़ी में लिपटी, अपने जीवनसाथी को खोने के गम में डूबी आशादेवी को चलते नहीं बन रहा था. नवाज़ ने अपनी सास का हाथ ऐसे थाम रखा था जैसे कोई बेटी अपनी मां को संभाल रही हो. जब चिता को अग्नि दी गई, तब नवाज़ ने सास आशादेवी का हाथ थाम लिया. श्मशान घाट से बाहर निकलते वक्त, नवाज़ ने आशादेवी के कंधे पर हाथ रखा और उन्हें धीरे-धीरे गाड़ी तक ले गईं. उस एक फ्रेम में पुरानी कड़वाहटें राख हो चुकी थीं और सिंघानिया परिवार की दो सबसे मजबूत महिलाएं एक-दूसरे के सहारे खड़ी थीं. आमतौर पर सास-बहू के रिश्तों में तकरार की खबरें आती हैं, लेकिन आशादेवी और नवाज़ मोदी ने मां-बेटी का रिश्ता मेनटेन किया. जब गौतम सिंघानिया पर पत्नी नवाज के साथ बदसलूकी के आरोप लगे तब भी सिंघानिया पति-पत्नी ने बहू का साथ दिया.

आशादेवी सिंघानिया: साम्राज्य की अदृश्य शक्ति का दर्द

आशादेवी सिंघानिया साम्राज्य की उस 'अदृश्य पावर' थी जिन्होंने दशकों तक रेमंड की चकाचौंध के पीछे रहकर रिश्तों की सबसे जटिल डोर को थामे रखा. आशादेवी सिंघानिया-विजयपत सिंघानिया की धर्मपत्नी और गौतम सिंघानिया की मां. ए वुमन विहाइंड सक्सेस. आशादेवी और विजयपत का रिश्ता एक 'क्लासिक' पावर कपल जैसा था. जब विजयपत कीर्तिमान बनाए जा रहे थे तब आशादेवी घर की नींव मजबूत कर रही थी. लेकिन जब विजयपत और बेटे गौतम के बीच 'संपत्ति युद्ध' छिड़ा, तो सबसे ज्यादा चोट आशादेवी के दिल पर लगी. उन्होंने सार्वजनिक रूप से कभी कुछ नहीं कहा, लेकिन उनकी खामोशी में वो दर्द साफ था कि दो पाटों के बीच पिसना मजबूरी बनी. एक तरफ सुहाग और दूसरी तरफ कोख.

साइलेंट मेडिएटर और 19 अप्रैल की वो ऐतिहासिक सुलह

कानूनी लड़ाइयों के दौरान भी गौतम ने कभी अपनी मां के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा. आशादेवी ने भी गौतम का साथ नहीं छोड़ा, बल्कि साइलेंट मेडिएटर बनकर पिता-पुत्र के बीच की बर्फ पिघलाने का इंतजार किया. उनकी प्रार्थनाओं का ही असर होगा कि 19 अप्रैल 2025 को गौतम और विजयपत ने एक-दूसरे को गले लगाया. तस्वीर उनके मुंबई स्थित आलीशान घर 'जेके हाउस' के अंदर ली गई थी. सालों बाद पिता-पुत्र को एक ही फ्रेम में देख कर कॉर्पोरेट जगत और मीडिया में हलचल मच गई थी.

विदाई से पहले माफी और पूर्णता का अहसास

मौत से ठीक एक साल पहले, गौतम और विजयपत की वह मुस्कुराती हुई तस्वीर आज सबके जेहन में ताजा थी. वह सुलह, वह गले मिलना... शायद कुदरत ने उन्हें वह आखिरी मौका दिया था ताकि वे एक-दूसरे को माफ कर सकें. विजयपत जी की विदाई 'अधूरी' नहीं थी, क्योंकि उनके जाने के वक्त उनका बेटा, उनकी बहू और उनकी पत्नी सब एक साथ खड़े थे.

गौरवशाली शुरुआत और रिश्तों पर लगी 'बुरी नजर'

एक दौर था जब विजयपत सिंघानिया अपने बेटे गौतम पर गर्व करते थे. उन्होंने अपनी आंखों के सामने गौतम को रेमंड की कमान संभालते देखा. पिता का भरोसा ही था कि 2015 में विजयपत ने अपने साम्राज्य के करोड़ों के शेयर अपने बेटे के नाम कर दिए. उस वक्त लगा कि पिता-पुत्र आगे और भी दुनिया जीतेंगे. लेकिन वक्त ने करवट ली. परिवार को किसी की बुरी नजर लगी.

'जेके हाउस' का विवाद और सड़क पर आने का दर्द

जिस जेके हाउस को विजयपत ने बड़े चाव से बनाया था, उसी को लेकर विवाद शुरू हो गया. देखते ही देखते बात इतनी बढ़ गई कि पिता को अपने ही बेटे के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. विजयपत सिंघानिया ने कई इंटरव्यू में अपना दर्द बयां करते हुए कहा था, "मैंने उसे सब कुछ दे दिया, और उसने मुझे सड़क पर छोड़ दिया." वो दौर सिंघानिया परिवार के लिए सबसे कठिन था, जहाँ सार्वजनिक रूप से दोनों के बीच दूरियां बढ़ती गईं.

 

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