राष्ट्रपति भवन के भव्य दरबार हॉल से आई ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं. मौका था पद्मा अवार्ड्स दिए जाने का. 83 साल के रिटायर्ड साइंटिस्ट और सीनियर एक्टर अनिल कुमार रस्तोगी को भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित कर रही थीं...कि तभी कुछ ऐसा हुआ जिसपर सोशल मीडिया के बाशिंदों की नजरें पड़ गईं. कह दिया कि पद्मा अवार्ड लेने आए अनिल कुमार रस्तोगी ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सरेआम 'इग्नोर' यानी नजरअंदाज कर दिया!
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इस वीडियो को देखकर आपका शायद इस मोमेंट पर ध्यान नहीं जाएगा. पद्म सम्मान से नवाजे जाने वाले कई विजेता जब अवॉर्ड लेने आते हैं तो कोई पीएम के सामने हाथ जोड़कर अभिवादन करता है, तो कोई जाकर उनसे हाथ मिलाता है. अब जरा इस पूरे नजारे की गहराई में चलिए. दरबार हॉल का माहौल बेहद गौरवमयी था. देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिल्कुल पहली पंक्ति में बैठे हुए थे. उनकी नजरें मंच पर आने वाले हर एक विजेता पर थीं. जैसे ही 82 साल के डॉ. अनिल कुमार रस्तोगी का नाम पुकारा गया, वह आगे बढ़े. पहली पंक्ति में बैठे पीएम मोदी ने गर्मजोशी दिखाते हुए उनकी तरफ अपना हाथ बढ़ाया.
सोशल मीडिया पर बना तिल का ताड़
पहली नजर में देखने पर यह बिल्कुल एक सामान्य सी तस्वीर लगती है. एक 82 साल का बुजुर्ग, देश के सबसे बड़े मंच पर, सम्मान पाने की खुशी और घबराहट में सीधे आगे बढ़ता चला जा रहा है. कैमरे के एंगल से यह एक आम पल था, लेकिन सोशल मीडिया के बाशिंदों को तो जैसे कोई बड़ा मुद्दा मिल गया. इस बेहद सामान्य सी दिखने वाली तस्वीर को लेकर लोगों ने तिल का ताड़ बनाना शुरू कर दिया. वीडियो के चंद सेकेंड के हिस्से को काट-काटकर लूप पर चलाया जाने लगा. दावों की बाढ़ आ गई कि देखिए कैसे एक सीनियर एक्टर ने प्रधानमंत्री को नजरअंदाज कर दिया.
अनिल रस्तोगी ने सोशल मीडिया पर रखा अपना पक्ष
सोशल मीडिया पर जब इस तिल का ताड़ बनाया जाने लगा तो खुद डॉ. अनिल कुमार रस्तोगी को सामने आना पड़ा. उन्होंने इस पूरे विवाद पर अपना पक्ष रखते हुए सोशल मीडिया पर ट्रोल करने वालों को करारा जवाब दिया. डॉ. अनिल ने कहा- 'यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि समारोह में हुई तमाम महत्वपूर्ण बातों को छोड़कर कुछ लोग सिर्फ इसी बात पर ध्यान दे रहे हैं कि एक बुजुर्ग व्यक्ति (मैं 83 वर्ष का हूं) प्रधानमंत्री मोदी जी के बढ़ाए हुए हाथ को नहीं देख पाया और आगे बढ़ गया. मुझे भी इस बारे में तब पता चला, जब मैंने बाद में उसका प्रसारण देखा. मैं भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक सम्मान प्राप्त करने गया था. यह मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी. उस समय मैं भावुक, उत्साहित और थोड़ा घबराया हुआ था. इसी वजह से मैं प्रधानमंत्री जी के बढ़ाए हुए हाथ को देख नहीं पाया. इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि मेरे मन में उनके प्रति सम्मान कम है.'
TMC के साकेत गोखले ने भी इस वीडियो को Modi’s event management fail लिखकर पोस्ट किया था. उसपर भी डॉ. अनिल कुमार रस्तोगी ने अलग से जवाब देते हुए अपनी उम्र का हवाला देते हुए कहा था कि "जो लोग भी इसका मजाक उड़ा रहे हैं, उन्हें मैं बता दूं कि मेरी उम्र 80 साल से ज़्यादा है. मेरी उम्र के कारण यह मेरी तरफ़ से हुई एक अनजानी चूक थी. मेरे मन में हमारे प्रधानमंत्री जी के लिए बहुत गहरा सम्मान है और मुझे लगता है कि देश चलाने के लिए मौजूदा समय में वह हमारे पास सबसे बेहतरीन विकल्प हैं. '
अब आप खुद सोचिए, यह कितनी सामान्य सी बात है. क्या ऐसी घटना हमारे और आपके साथ रोज़मर्रा की ज़िंदगी में नहीं होती? कई बार हम सड़क पर चल रहे होते हैं, गहरी सोच में होते हैं, या किसी बड़ी घबराहट में होते हैं...सामने से हमारा कोई सगा-संबंधी या दोस्त हाथ बढ़ाता है या आवाज़ देता है, और हम बिना देखे आगे निकल जाते हैं. बाद में जब वो टोकता है, तब हमें एहसास होता है. अब ज़रा सोचिए, उस 83 साल के बुजुर्ग के दिल की स्थिति क्या रही होगी, जो देश के सबसे बड़े और भव्य मंच पर राष्ट्रपति के हाथों सम्मान लेने जा रहा था! वहां की चकाचौंध और घबराहट में किसी का भी ध्यान भटकना बेहद स्वाभाविक है.
कौन हैं डॉ. अनिल रस्तोगी ?
विवाद खड़ा करने वाले लोग शायद डॉ. रस्तोगी के छह दशकों के उस तप को नहीं जानते, जिसने उन्हें आज इस मुकाम पर पहुंचाया है. 4 अप्रैल 1943 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में जन्मे अनिल रस्तोगी बचपन लखनऊ के 'राजा बाजार' इलाके में बीता. एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि परिवार में बच्चों के जीवित न रहने की मान्यता के चलते बचपन में उन्हें एक बेगम साहिबा को प्रतीकात्मक तौर पर बेच दिया गया था. ये एक सांकेतिक टोटका टाइप था. उन बेगम साहिबा ने अनिल रस्तोगी का नाम 'फकीरे' रखा. वहीं बड़े भाई का नाम 'गुलाम हुसैन' रखा.
डॉ. अनिल रस्तोगी ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में बताया था- 'मोहर्रम के दौरान घर में ताजिया रखा जाता था. तब ताबीज पहनकर फकीरी की रस्म निभाते हुए लोगों के घर जाते थे. बेगम साहिबा हमें खाने-पीने की चीजें दिया करती थीं.'
वैज्ञानिक भी रह चुके अनिल रस्तोगी
भले ही लोगों ने डॉ. अनिल रस्तोगी को फिल्मों और छोटे पर्दों पर, थिएटर में अभिनय करते हुए देखा हो पर आपको बता दें कि वे सीएसआईआर के प्रतिष्ठित संस्थान सीडीआरआई, लखनऊ में बायोकेमेस्ट्री विभाग के हेड भी रह चुके हैं. वे एक वैज्ञानिक के रूप में भी लंबी सेवा दे चुके हैं.
डॉ. रस्तोगी का फिल्मी सफर
डॉ. अनिल रस्तोगी फिल्मी दुनिया का एक ऐसा जाना-माना चेहरा हैं, जिन्होंने 'इश्कजादे', 'मुल्क', 'रेड' और 'थप्पड़' जैसी 75 से अधिक सुपरहिट फिल्मों में अपने दमदार अभिनय की छाप छोड़ी है. फिल्मों के अलावा, उन्होंने 14 लोकप्रिय वेब सीरीज और अलग-अलग टीवी धारावाहिकों के लगभग 500 एपिसोड्स में भी अपनी कला का जादू बिखेरा है. रंगमंच (थिएटर) से तो उनका रिश्ता उनकी सांसों की तरह गहरा है. वह देश के कोने-कोने में 99 विभिन्न नाटकों के करीब एक हजार मंचन कर चुके हैं. कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनके इसी ऐतिहासिक योगदान के लिए उन्हें कई बड़े सम्मानों से नवाजा जा चुका है, जिनमें मुख्य रूप से शामिल हैं-
- यश भारती-2017
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार-2023
- पाटलिपुत्र लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड-2024
- अभ्युदय अंतरराष्ट्रीय शलाका सम्मान-2026
- कालिदास सम्मान
विज्ञान और थिएटर का अनूठा संतुलन
एक वैज्ञानिक की गंभीर सोच और रंगमंच की कलात्मक दुनिया के बीच संतुलन बिठाना किसी के लिए भी असंभव सा काम है. डॉ. अनिल रस्तोगी के जीवन में भी एक ऐसा दौर आया था, जब उन्हें विज्ञान और थिएटर में से किसी एक को चुनने की सलाह दी गई थी, लेकिन उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि वह देश और विज्ञान के प्रति अपनी जिम्मेदारी को कभी नहीं छोड़ेंगे.
उनका दैनिक शेड्यूल किसी कठिन तपस्या से कम नहीं था. वह दिनभर पूरी निष्ठा के साथ अपनी वैज्ञानिक जिम्मेदारियों को निभाते थे. इसके बाद, शाम को जब बाकी लोग थककर अपने परिवार के साथ समय बिता रहे होते थे, तब डॉ. रस्तोगी अपने आराम और चैन की परवाह न करते हुए थिएटर की रिहर्सल के लिए वक्त निकालते थे. उन्होंने अपना वह अतिरिक्त समय पूरी तरह कला को समर्पित कर दिया. आज डॉ. रस्तोगी खुद गर्व से इस बात को स्वीकार करते हैं कि थिएटर को दिया गया वही अतिरिक्त समय आज उनकी सबसे बड़ी और अनूठी पहचान बन चुका है.
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