धर्मनगरी मथुरा में आयोजित 'पंचायत आजतक' के मंच पर मशहूर कथावाचक अनिरुद्धाचार्य ने विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी. बातचीत के दौरान जब उनसे कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा 'मनुस्मृति' और महिलाओं के अधिकारों को लेकर दिए गए बयान पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने तीखा पलटवार किया. अनिरुद्धाचार्य ने दोटूक शब्दों में कहा कि वह खुद राजनीति से दूर रहते हैं और न ही उन्हें इसमें कोई दिलचस्पी है. लेकिन, जब राजनेता अपनी सीमाएं लांघकर धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करेंगे और सनातन परंपराओं पर सवाल उठाएंगे, तो धर्म के प्रतिनिधियों के रूप में वे शांत नहीं बैठेंगे और उन्हें मुंहतोड़ जवाब देंगे.
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राहुल गांधी केवल सनातन को ही क्यों टारगेट करते हैं?
राहुल गांधी के बयान का कड़ा विरोध करते हुए अनिरुद्धाचार्य ने सीधे सवाल दागे. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी मनुस्मृति को तो बड़ी आसानी से गलत ठहरा देते हैं, लेकिन क्या उनमें इतनी हिम्मत है कि वह कुरान को गलत कह सकें? उन्होंने आगे पूछा कि क्या राहुल गांधी कभी यह कहने का साहस जुटा सकते हैं कि बुर्का प्रथा, तीन तलाक या हलाला जैसी कुरीतियां गलत हैं?
अनिरुद्धाचार्य का आरोप था कि राहुल गांधी और उनके जैसे अन्य नेता सिर्फ इसलिए सनातन धर्म को निशाना बनाते हैं क्योंकि सनातन धर्म अत्यधिक सहनशील है और तुरंत उग्र प्रतिक्रिया नहीं देता. उन्होंने कहा कि मनुस्मृति में सदैव नारी के सम्मान का विधान है, जबकि तीन तलाक देकर किसी महिला को छोड़ देना ही असल में नारी का अपमान है, जिस पर ये नेता मौन साधे रहते हैं.
अन्य धर्मों से सीख लेने की जरूरत, अपने ग्रंथों का करें सम्मान
सोशल मीडिया के दौर में सनातन धर्म की गलत व्याख्या और धार्मिक ग्रंथों के अनादर पर चिंता जताते हुए कथावाचक ने तीखा प्रहार किया. उन्होंने रामचरितमानस और मनुस्मृति की प्रतियां जलाने वाले नेताओं व लोगों को आड़े हाथों लिया. अनिरुद्धाचार्य ने कहा कि आज तक किसी ने नहीं सुना कि किसी मुस्लिम ने कुरान जलाई हो या किसी ईसाई ने बाइबल में आग लगाई हो, लेकिन हिंदू समाज के ही कुछ लोग अपने ग्रंथों का अपमान कर रहे हैं. बिना पढ़े-लिखे केवल राजनीति के लिए चौपाइयों का गलत अर्थ निकालने वालों को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा कि इन नेताओं के पूर्वज भी इन्हीं ग्रंथों को पढ़कर बड़े हुए हैं.
सूप जैसे स्वभाव से अच्छाइयों को अपनाने की सलाह
संत कबीरदास के प्रसिद्ध दोहे "साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप स्वभाव" का उदाहरण देते हुए अनिरुद्धाचार्य ने लोगों को विवेकशील बनने का संदेश दिया. उन्होंने समझाया कि जिस तरह बांस का बना सूप फटकने पर कंकड़-कचरे और बेकार हिस्से को उड़ा देता है और अनाज के शुद्ध दाने बचा लेता है, ठीक उसी तरह मनुष्य को भी अपने धर्मग्रंथों से केवल अच्छाइयों को ग्रहण करना चाहिए.
उन्होंने स्पष्ट किया कि ग्रंथों में कुछ भी बुरा नहीं है, लेकिन अगर किसी को अपने संकीर्ण नजरिए की वजह से कुछ गलत लगता भी है, तो वह उसे छोड़कर अच्छी बातों को अपनाए. उन्होंने कहा कि जो लोग मनुस्मृति या रामचरितमानस को बुरा बता रहे हैं, वास्तव में कमी उनके खुद के मन और सोच में है.
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पुणे के बाद अब नासिक! महाराष्ट्र में राहुल गांधी का बड़ा सियासी प्लान, जानें क्या है रणनीति
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