कोई सोच भी नहीं सकता कि चुनाव आयोग जैसी संस्था में बगावत भी हो सकती है. बगावत भी ऐसे हेड के खिलाफ जिसके सिर पर सत्ता का हाथ माना जाता है. CEC ज्ञानेश कुमार के लेफ्ट-राइट बैठने वाले चुनाव आयुक्तों विवेक जोशी और एसएस संधू ने कुछ ऐसा किया कि पूरे देश का सिस्टम हिल गया. इसी सिस्टम को हिलाने के लिए राहुल महीनों से चिल्ला रहे थे, आरोप लगा रहे थे, लेकिन पावर सेंटर में उनकी सुनवाई नहीं थी.
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अचानक इंडियन एक्सप्रेस पर एक कवर स्टोरी छपी और राहुल गांधी की चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ वोट चोरी के मुहिम को ब्रह्मास्त्र मिल गया. खुलासे ने ज्ञानेश कुमार को Tainted(भ्रष्ट) ठहराने की राहुल गांधी की मुहिम के लिए एक जबरदस्त बूस्टर डोज़ का काम किया. कांग्रेस और पूरे विपक्ष को वो लिखित सबूत मिल गए, जिसकी तलाश उन्हें महीनों से थी.
पूरे विवाद के सेंटर में हैं ज्ञानेश कुमार, जो अकेले सारे हंगामे की जड़ घोषित हो गए हैं और बन गए है चर्चित चेहरा. कभी उनके कवच बनने वाले पलटकर आरोप लगा रहे हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयोग को अपनी जागीर बनाकर वन-मैन शो चला रहे थे जिसमें उनके पैरलल चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और एसएस संधू का काम बस यस बॉस कहने वाला बन गया था. जिसे दोनों ने मंजूर नहीं किया. ज्ञानेश कुमार के पक्ष में सोशल मीडिया पर समर्थन में खामोशी छाई है. सरकार, प्रशासन, पार्टी के लोग क्यों ही बोलेंगे.
शानदार करियर लेकिन चुनाव आयोग आते ही सब बदला!
शायद ज्ञानेश कुमार का अच्छा समय जा रहा है. चक्रव्यूह इतना गहरा और कठिन है कि ज्ञानेश कुमार के लिए कोई एग्जिट रूट नहीं दिख रहा. ज्ञानेश कुमार देश के चर्चित आईएएस रहे जिनका लंबा करियर बेदाग और शानदार था लेकिन चुनाव आयोग में आते ही पूरी तरह टेंटेड हो चुका है. जिस किसी ने ज्ञानेश कुमार की जर्नी को नजदीक से देखा होगा उसके लिए हैरान करने वाला दौर होगा कि आज ज्ञानेश कुमार जैसे पावरफुल ब्यूरोक्रैट को ये सुनने के दिन आए कि कोई कह रहा जेल भेजो. कोई रिजाइन मांग रहा है. कोई डिस्मिस करने की मुहिम पर काम कर रहा है.
ज्ञानेश कुमारी की फैमिली ट्री!
जनवरी 1964 को जब आगरा में ज्ञानेश कुमार ने जन्म लिया तब कहां किसी को अंदाजा होगा कि एक दिन बच्चा देश का भाग्य विधाता जैसा कुछ बन जाएगा. परिवार बेहद पढ़ा-लिखा था. पिता डॉ. सुबोध गुप्ता उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग में सीएमओ थे. परिवार में बारे में कहा जाता है कि उनकी फैमिली ट्री में डॉक्टर, आईएएस, आईपीएस भरे पड़े हैं.
बड़ी बेटी मेधा रूपम भी आईएएस, दामाद मनीष बंसल भी आईएएस. छोटी बेटी अभिश्री IRS तो उनके पति कश्मीर में आईएएस. भाई मनीष कुमार भी आईआरएस. बहनोई उपेंद्र जैन भी मध्य प्रदेश कैडर के आईपीएस. पता नहीं कि जिस पावरफुल पोजिशन के लिए पिता-बेटी की चर्चा होती है आज दोनों बुरी तरह घिरे हैं. नोएडा की डीएम बेटी मेधा रूपम बड़े कानूनी कार्रवाई का सामना कर रही हैं. सैलरी से 5 लाख देने की सजा हो चुकी है जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश से होल्ड पर है. इंटरनेट पर आग लगी है कि ऐसे पोस्ट से जो पिता-पुत्री पर पावर मिसयूज के आरोप लगा रहे हैं.
IIT से IAS बनने का सफर
ज्ञानेश कुमार की परवरिश लखनऊ में हुई. वहीं से ही स्कूल-कॉलेज किया. इंजीनियर बनने के लिए आईआईटी कानपुर (IIT Kanpur) से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक किया. पढ़ाई की भूख यहीं शांत नहीं हुई. उन्होंने फाइनेंस की पढ़ाई की और आगे चलकर अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से एनवायर्नमेंटल इकोनॉमिक्स की डिग्री भी हासिल की. इतना कुछ करने के बाद ललक खत्म नहीं हुई आईएएस बनने की. 1988 में ज्ञानेश कुमार का वो सपना भी पूरा हो गया. उन्हें आईएएस अफसर के तौर पर केरल कैडर मिला.
केरल आईएएस के तौर पर ज्ञानेश कुमार सब कलेक्टर, जिला कलेक्टर की ढेर सारी पोस्टिंग संभालते रहे. सेंट्रल डेप्युटेशन के बाद उनका कद बढ़ता रहा. ये एक अनटोल्ड स्टोरी जैसी है कि ज्ञानेश कुमार देश के डिफेंस सिस्टम और डिफेंस प्रोडक्शन के बारे में जितना जानते हैं उतना शायद ही किसी आईएएस को पता हो. 2007 से 2012 तक लंबी पोस्टिंग रक्षा मंत्रालय में रहीं. Department of Defence Production में Joint Secretary के रूप में करीब 5 साल तक काम किया.
क्यों कहा जाता था ज्ञानेश कुमार को संकटमोचक?
ज्ञानेश कुमार का ब्यूरोक्रेसी में सबसे शक्तिशाली दौर तब शुरू हुआ जब मई 2016 में उन्हें गृह मंत्रालय में पोस्टिंग मिली. 2019 में अमित शाह संगठन से सरकार में आए और गृह मंत्री बने. ज्ञानेश कुमार की ऊंची हैसियत के पीछे अमित शाह के साथ उनकी गहरी घनिष्ठता मानी जाती है.
जब अमित शाह ने गृह मंत्रालय का जिम्मा संभाला, तो ज्ञानेश कुमार उनके सबसे भरोसेमंद सिपहसालार बनकर उभरे. 2019 में जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म करने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया, तो उस पूरे 'ऑपरेशन' और ड्राफ्टिंग को परदे के पीछे से संभालने वाले मुख्य सूत्रधार ज्ञानेश कुमार थे. अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' के गठन की सभी कानूनी और प्रशासनिक औपचारिकताएं भी अमित शाह ने ज्ञानेश कुमार के ही सुपुर्द की थीं. सरकारी गलियारों में उन्हें 'संकटमोचक' कहा जाने लगा. जब अमित शाह के तहत नए सहकारिता मंत्रालय का गठन हुआ, तो ज्ञानेश कुमार को ही इसका पहला सचिव बनाया गया और जनवरी 2024 में वह इसी पद से रिटायर हुए.
ज्ञानेश कुमार और राहुल गांधी की जंग!
रिटायरमेंट के तुरंत बाद मार्च 2024 में देश में लोकसभा चुनावों का ऐलान होना था, लेकिन ऐन वक्त पर चुनाव आयुक्त अरुण गोयल ने इस्तीफा दे दिया. सरकार ने आनन-फानन में ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया. वहीं से शुरू हुई कांग्रेस नेता राहुल गांधी और ज्ञानेश कुमार के बीच की वो ऐतिहासिक जंग, जो आज अपने चरम पर है. राहुल गांधी ने सबसे पहले अगस्त 2025 में एक बड़ा धमाका करते हुए ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग पर "वोट चोरी" का खुला आरोप लगाया था. उस वक्त सत्ता के गलियारों और मेनस्ट्रीम मीडिया में राहुल गांधी के आरोपों को 'हार की हताशा' या 'आधारहीन' कहकर पूरी तरह अनसुना कर दिया गया था. किसी को अंदाजा नहीं था कि बंद कमरों के पीछे चल रहा खेल कुछ और ही है. अब जब चुनाव आयोग के अंदरूनी मतभेदों का कच्चा चिट्ठा बाहर आया, तो राहुल गांधी के सारे आरोपों पर जैसे मुहर लग गई.
क्यों ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नहीं चल सकता है कोई केस?
चुनाव आयोग में ज्ञानेश कुमार तब चुनाव आयुक्त बनकर आए जब राजीव कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त थे. राजीव कुमार के समय भी चुनाव आयोग पर विपक्ष ने तीखे हमले किए, लेकिन तब संस्था के भीतर सब कुछ ठीक होने का भ्रम बरकरार था. जैसे ही 19 फरवरी 2025 को ज्ञानेश कुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पद संभाला, स्थितियां विस्फोटक हो गईं. आज हालात ये हैं कि सोशल मीडिया पर ज्ञानेश कुमार के समर्थन में पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ है. विपक्ष पद से हटाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है. लोग हैरान हो रहे हैं कि हमेशा सरकार के समर्थन और हमेशा राहुल गांधी के खिलाफ लिखने वाले बड़े-बड़े लोग भी ज्ञानेश कुमार को विलेन बोल रहे हैं.
इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जहां ज्ञानेश कुमार विलेन के रूप में घिर गए हैं, वहीं आयोग के बाकी दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने खुद को पूरी तरह बेदाग साबित कर दिया है. सोशल मीडिया पर कोई ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कितना गला फाड़ ले, हकीकत है कि उनको कोई टच भी नहीं सकता. न आज, न पद छोड़ने के बाद. मोदी सरकार ने ही राजीव कुमार, ज्ञानेश कुमार जैसे चुनाव आयुक्तों के लिए ढाल बनाया. 2023 में मोदी सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से केवल चीफ जस्टिस को बाहर कर अमित शाह को अंदर लिया तब एक और खेल किया कि सेक्शन 16 में मेंशन किया कि पद छोड़ने के बाद किसी चुनाव आयुक्त के खिलाफ कोई केस नहीं चल सकता.
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