Charchit Chehra: 'दिमागी नक्सल' का तीर खुद पर लेकर क्यों खड़े हो गए पी. चिदंबरम? जानिए कैसे बने सोनिया-राहुल की ढाल

रूपक प्रियदर्शी

• 12:29 PM • 18 Aug 2026

P. Chidambaram Profile: 'दिमागी नक्सल' विवाद में पी. चिदंबरम के बयान के बाद बीजेपी और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है. जानिए कैसे चिदंबरम ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के लिए राजनीतिक ढाल की भूमिका निभाई, उनका लंबा राजनीतिक सफर, अमित शाह से टकराव, कांग्रेस में बढ़ता कद, परिवार और निजी जिंदगी से जुड़ी पूरी कहानी.

P Chidambaram Profile
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लाल किले से जब दिमागी नक्सल का विवाद शुरू हुआ तो ये किसी उड़ते तीर की तरह था. जिसने भी सुना उसने अपने-अपने तरीके से विश्लेषण किया. जिस लाल किले से पीएम का भाषण हुआ उसे सुनने के लिए राहुल गांधी, सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे कोई नहीं पहुंचे थे. सरकार की ओर से किरेन रिजिजू ने क्लेरिफिकेशन भी दे दिया कि पीएम ने किसी विपक्षी नेता को दिमागी नक्सली नहीं कहा लेकिन तीर तो कमान से निकल कर निशाने पर लगने के लिए उड़ चुका था. 

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लाल किले की प्राचीर से दिमागी नक्सल वाले तीर के छूटते ही कांग्रेस मुख्यालय में सोनिया गांधी वंदे मातरम विवाद में घिरीं दिखीं. जब कांग्रेस अटैक और डिफेंस की स्ट्रैटजी में उलझी तब पी. चिदंबरम ने खुद आगे बढ़कर उस 'उड़ते तीर' को अपने सीने पर ले लिया. दिमागी नक्सल से सरकार बैकफुट पर थी. वंदेमातरम विवाद से कांग्रेस भी बैकफुट पर आने लगी. इसी मौके पर चौका मारकर चर्चित चेहरा बन गए  पूर्व वित्त मंत्री, पूर्व गृह मंत्री और सीनियर कांग्रेस नेता पी चिदंबरम जो खुद को गर्व से दिमागी नक्सल बताकर बीजेपी का निशाना अपनी ओर मोड़कर सोनिया गांधी, राहुल गांधी के सेवियर बन गए. और सचमुच उनकी तरकीब काम कर गई, जिसके बाद सोनिया गांधी से कहीं ज्यादा अब बीजेपी के निशाने पर हैं पी चिदंबरम. विस्तार से समझिए पूरी कहानी.

शांत हो चुके युद्ध को चिदंबरम ने दी हवा!

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने समझाया कि दिमागी नक्सल का असल मतलब क्या था. कैटेगरी गिनाई कि माओवादियों का समर्थन करने, संविधान को नकारने वाले, अलगाववादियों का साथ देने वाले, 370 हटाने वाले, चिकन नेक को काटने जैसी खतरनाक बातें सोचते हैं, उन्हें ही 'दिमागी नक्सली' कहा गया है. चूंकि यूपीए सरकार में गृह मंत्री रहे इसलिए बीजेपी को कहने का मौका मिला कि चिदंबरम के गृह मंत्री रहते हुए देश में नक्सलवाद का सबसे ज्यादा विस्तार हुआ. कांग्रेस चिदंबरम को नक्सलवाद और माओवाद के समर्थन का चेहरा बना रही है.

बीजेपी और चिदंबरम के बीच टकराव का लंबा इतिहास था जो लंबे वक्त से शांत थे. दिमागी नक्सल वाले विवाद में खुद घुसकर चिदंबरम ने बीजेपी के साथ शांत हो चुके युद्ध को हवा दे दी. जब चिदंबरम 2008 से 2012 के दौरान गृह मंत्री रहे तब बीजेपी से कई मौकों पर टकराव हुआ. पहली बार था जब देश के किसी गृह मंत्री ने आतंकवाद को 'भगवा' या 'हिंदू' रंग से जोड़कर बयान दिया था. दंतेवाड़ा में 76 जवानों की निर्मम हत्या के बाद गृह मंत्री चिदंबरम का बातचीत का प्रस्ताव देना भी पसंद नहीं किया गया. 

अमित शाह और चिदंबरम की तकरार की कहानी

अमित शाह की गिरफ्तारी का विवाद भारतीय राजनीति के इतिहास के सबसे बड़े और सबसे तीखे राजनीतिक प्रतिशोध के विवादों में से एक माना जाता है. जुलाई 2010 में, जब पी. चिदंबरम देश के गृह मंत्री थे, तब CBI ने गुजरात के तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह को फेक एनकाउंटर केस में गिरफ्तार किया था. गिरफ्तारी के बाद अमित शाह को करीब तीन महीने साबरमती जेल में काटने पड़े थे. इसके बाद गुजरात हाईकोर्ट ने जमानत तो दी, लेकिन 2 साल के लिए गुजरात से तड़ीपार भी किया. राहुल गांधी आज तक अमित शाह को उस दौर का ताना देते हैं.

ठीक 9 साल बाद इतिहास ने खुद को दोहराया, जब देश के गृह मंत्री अमित शाह बने. 2019 में अमित शाह के गृह मंत्री बनने पर सीबीआई ने पी. चिदंबरम को आईएनएक्स मीडिया करप्शन केस में दिल्ली वाले घर की दीवार फांदकर टांग कर गिरफ्तार किया था. चिदंबरम को भी अमित शाह की तरह साबरमती जेल और तिहाड़ जेल में करीब 100 दिन काटने पड़े थे.

कौन हैं पी. चिदंबरम?

चिदंबरम देश के उन बड़े नेताओं और वकीलों में से हैं जो पहले टॉप लेवल के वकील बने और फिर राजनीति में भी आकर टॉप पर पहुंचे. पी. चिदंबरम का जन्म 16 सितंबर 1945 को तमिलनाडु के शिवगंगा जिले नगरथार चेट्टियार परिवार में हुआ. पिता पालनियप्पन चेट्टियार बड़े कपड़ा व्यवसायी थे और उनकी माता लक्ष्मी आची, अन्नामलाई विश्वविद्यालय के संस्थापक राजा सर अन्नामलाई चेट्टियार की बेटी थीं. उनके नाम के आगे लगा P उनके पिता पालनियप्पन का नाम है. चेट्टियार परंपरा में नाम के आगे सरनेम नहीं, बल्कि पिता के नाम का पहला अक्षर लगाते हैं.

पढ़ाई तो उन्होंने सांख्यिकी(Statistics) से की. ग्रेजुएशन करने के बाद लॉयर बनने की सोची. मद्रास लॉ कॉलेज से एलएलबी (LLB) की डिग्री ली. आगे हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से एमबीए की डिग्री हासिल की. चाहते तो कॉरपोरेट फील्ड में भी जा सकते थे लेकिन वो उस जमाने के मद्रास लौटे और हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने लगे. बहुत कम समय में देश के सबसे महंगे और दिग्गज कॉरपोरेट वकीलों की कतार में खड़े हो गए.

इंटरकास्ट मैरिज और परिवार का विरोध

लॉ करते समय उनकी मुलाकात नलिनी से हुई. नलिनी भी उसी कॉलेज में लॉ स्टूडेंट थीं. नलिनी के पिता, पी.एस. कैलासम, मद्रास हाई कोर्ट के जाने-माने जज जो बाद में सुप्रीम कोर्ट के जज बने थे. कॉलेज के दिनों में ही दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे. प्यार परवान चढ़ा, लेकिन उस दौर में उनकी शादी की राह इतनी आसान नहीं थी. शादी फंसी जाति विवाद में. 

चिदंबरम चेट्टियार समुदाय के थे लेकिन नलिनी का परिवार वेल्लालर था. जब दोनों ने अपने-अपने घरों में शादी की बात की, तो परिवारों ने इंटर कास्ट मैरिज के लिए मंजूरी नहीं दी. पारिवारिक बंदिशों और विरोध के बावजूद दोनों अपने फैसले पर अडिग रहे. दोनों ने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर ही बिना किसी तामझाम के सादगी से शादी कर ली. नलिनी केवल चिदंबरम की जीवनसंगिनी ही नहीं बनीं, बल्कि वे खुद मद्रास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की बड़ी वकील बनीं. 

जब दोनों ने परिवार के खिलाफ जाकर शादी की, तब चिदंबरम को हार्वर्ड बिजनेस स्कूल जाना था. दिक्कत पैसों की थी. तब नलिनी चिदंबरम भारत में रहकर वकालत और कानूनी करियर के जरिए पति चिदंबरम का सपोर्ट सिस्टम बनीं. चिदंबरम अपनी हर बड़ी कामयाबी का श्रेय नलिनी के इसी त्याग को देते हैं.

कैसे राजनीति में आए चिदंबरम?

चिदंबरम का राजनीति में आना किसी सोची-समझी योजना का हिस्सा नहीं था. कॉलेज के दिनों में थोड़े लेफ्ट समर्थक तो थे लेकिन आगे कांग्रेस अच्छी लगने लगी. तमिलनाडु कांग्रेस की ट्रेड यूनियन विंग (INTUC) और यूथ कांग्रेस से जुड़े. उसी दौरान संजय गांधी की नजर चिदंबरम पर पड़ी जहां से दिल्ली की राजनीति का रास्ता खुला. 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद  लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी देश में 'युवा और आधुनिक' चेहरों की तलाश कर रहे थे. चिदंबरम को उनकी गृह सीट शिवगंगा से टिकट मिला और वे भारी बहुमत से जीतकर पहली बार संसद पहुंचे. सरकार बनी तो राजीव गांधी को यंग चिदंबरम इतने पसंद आए कि उन्होंने गृह मंत्रालय और कार्मिक मंत्रालय में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी सौंप दी. फिर चिदंबरम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. कांग्रेस और सरकार के लिए चिदंबरम असेट बनते गए. 

नरसिम्हा राव के खिलाफ क्यों बागी हुए थे चिदंबरम?

राजीव गांधी के जाने के बाद पीवी नरसिम्हा राव के दौर में भी चिदंबरम का सिक्का बोलता रहा. नरसिम्हा राव, मनमोहन सिंह के साथ आर्थिक सुधारों की तिकड़ी में शामिल थे चिदंबरम. तब कॉमर्स मिनिस्टर होते थे लेकिन 1996 में राजनीतिक कारणों से नरसिम्हा राव के खिलाफ बागी हो गए.

1996 के लोकसभा और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के दौरान राव ने जयललिता के साथ अलायंस का फैसला किया. तब जयललिता पर करप्शन के भारी दाग थे. जीके मूपनार, चिदंबरम जैसे तमिल नेता अलायंस के खिलाफ थे. वो चाहते थे कांग्रेस या तो अकेले लड़े या डीएमके के साथ जाए लेकिन नरसिम्हा राव नहीं माने. तब नरसिम्हा राव के खिलाफ बगावत करते हुए जी.के. मूपनार, पी. चिदंबरम ने बगावत कर दी. अपनी पार्टी तमिल मनीला कांग्रेस (TMC) बनाई और डीएमके से अलायंस किया.चुनावों में नरसिम्हा राव गलत साबित हुए और चिदंबरम सही. कांग्रेस और जयललिता की बुरी हार हुई. डीएमके के साथ तमिल मनीला कांग्रेस सत्ता में आ गई. 

सोनिया और मनमोहन सिंह के भरोसेमंद साथी!

जब 1996 में देश में संयुक्त मोर्चा सरकार बनी तो चिदंबरम किंग मेकर रोल में थे. समर्थन के एवज में पहली बार देश के वित्त मंत्री बने लेकिन आगे चीजें एक के बाद खराब होती गई. मोर्चा सरकारें चली नहीं. 1999 में एनडीए सरकार बन गई. 2001 में जीके मूपनार का निधन हो गया और कांग्रेस में नरसिम्हा राव, सीताराम केसरी को हराते हुए सोनिया गांधी कांग्रेस की सब कुछ हो गईं. 2004 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले चिदंबरम ने अपनी पार्टी का विलय वापस कांग्रेस में कर दिया. वे अपनी पुरानी सीट शिवगंगा से चुनाव लड़े और जीतकर संसद पहुंचे. 2004 में जब यूपीए-1 सरकार बनी, तो वित्त मंत्री पद के लिए सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पसंद चिदंबरम ही बने. 

सोनिया गांधी के लिए चिदंबरम हमेशा भरोसेमंद रहे. 2008 में जब मुंबई पर भीषण 26/11 आतंकी हमला हुआ, तो तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल की विफलता से देश में भारी गुस्सा था. संकट की इस घड़ी में सोनिया गांधी ने चिदंबरम पर भरोसा जताया और उन्हें देश का गृह मंत्री बनाया. वित्त मंत्री रहते हुए उनके आर्थिक फैसलों की चर्चा होती रही लेकिन गृह मंत्री बनने के बाद उनके भाषण, विवाद लगातार विवादित बनाए रहे. 2012 में जब प्रणब मुखर्जी देश के राष्ट्रपति बन गए, तब सोनिया गांधी ने आर्थिक मोर्चे पर घिरी यूपीए-2 सरकार को बचाने के लिए चिदंबरम को दोबारा वित्त मंत्रालय सौंप दिया.

राहुल गांधी के लिए करते है कवच का काम!

राहुल गांधी के कांग्रेस नेतृत्व संभालने के बाद पी. चिदंबरम की भूमिका पार्टी में 'मार्गदर्शक' और 'मुख्य रणनीतिकार' की रही, हालांकि किंगमेकर से ज्यादा गांधी परिवार के सलाहकार के रूप में सिमट गए. यूपीए सरकार के जाने और राहुल गांधी के युग की शुरुआत के बाद चिदंबरम चुनावी राजनीति से पीछे हट गए. उन्होंने अपनी पारंपरिक लोकसभा सीट शिवगंगा अपने बेटे कीर्ति चिदंबरम को सौंप दी और खुद राज्यसभा के रास्ते संसद पहुंचे. 

राहुल गांधी के दौर में भी कांग्रेस को चिदंबरम के कद का कोई दूसरा अर्थशास्त्री नहीं मिली. इसलिए पार्टी के 2019 और 2014 के चुनावी घोषणापत्र को तैयार करने का जिम्मा बार-बार चिदंबरम को ही मिला. चिदंबरम राहुल गांधी के लिए कवच का काम करते रहे. आज भले दिमागी नक्सल के बहाने उन्होंने बीजेपी के साथ शांत हो चुके युद्ध को भड़काया लेकिन इकोनॉमी पर सरकार को घेरने के लिए कांग्रेस के पास चिदंबरम से बड़ा नाम कोई और नहीं.

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