26 साल की प्रियंका जारकीहोली की कहानी की शुरुआत होती है राहुल गांधी के उस राजनीतिक नारे से, जिसे उन्होंने स्मैश द पैट्रियार्की यानी पितृसत्ता को ध्वस्त करो का नाम दिया. राहुल गांधी की इसी नई सोच और युवा चेहरों पर दांव लगाने की पॉलिसी के चलते, कर्नाटक के बेलगावी की 26 साल की एक लड़की प्रियंका जारकीहोली की सीधे देश की संसद में ग्रैंड एंट्री होती है. जब प्रियंका राजनीति में आईं, तब राहुल सार्वजनिक मंचों से ये भारी-भरकम शब्द नहीं कहते थे, लेकिन परदे के पीछे उनकी टीम इसी फॉर्मूले पर काम कर रही थी. नतीजा ये हुआ कि पुरुष वर्चस्व वाले जारकीहोली परिवार की ये बेटी, पारंपरिक बंदिशों और खुद अपने बीजेपी वाले चाचाओं की चुनौती को लांघते हुए कर लोकसभा पहुंच गई.
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कहानी में ट्विस्ट यहीं खत्म नहीं होता. अभी इस युवा महिला सांसद को दिल्ली की राजनीति की हवा लगे कुछ ही महीने हुए थे कि उन पर देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी ईडी का फंदा कस गया है. चर्चित चेहरा इसलिए बनी हैं कि राजनीति में आते ही 28 साल की प्रियंका जारकीहोली ईडी के लपेटे में फंसी हैं. हालांकि फिलहाल प्रियंका का नाम किसी एफआईआर में नहीं है लेकिन ईडी ने जब उनके पिता और कर्नाटक के PWD मंत्री और सीनियर कांग्रेस नेता सतीश जारकीहोली पर शिकंजा कसा तो सिरे जुड़ते गए प्रियंका जारकीहोली पर. ऐसा इसलिए कि सतीश जारकीहोली न केवल कर्नाटक के सीनियर नेता हैं बल्कि बड़े बिजनेसमैन भी हैं. विस्तार से जानिए पूरी कहानी.
क्या है पूरा मामला?
प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत दर्ज केस फैमिली ट्राएंगल से जुड़ा है. जिसमें मुख्य आरोप सतीश जारकीहोली पर, उनके बहनोई और प्रियंका के फूफा और एडिशनल एक्ससाइज कमिश्नर वाई.डी. मंजूनाथ के साथ प्रियंका पर लग रहे हैं. प्रियंका राजनीति में आने से पहले अपने पिता की सतीश शुगर्स कंपनी की मैनेजिंग डायरेक्टर रहीं. उसी कंपनी के खाते-बही ईडी के शक के घेरे में हैं. परिवार पर मंजूनाथ के जरिए 18 बार अवैध एक्ससाइज लाइसेंस जारी करने और घूसखोरी का सिंडिकेट चलाने का आरोप है. दूसरा गंभीर आरोप है कि काले धन की कमाई को मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए विदेशों में रूट किया गया है.
चूंकि सतीश जारकीहोली 2013 से 2016 के बीच कर्नाटक के आबकारी मंत्री रहे इसलिए भी जांच की आंच गहराई है. ED जब भी किसी बड़े आरोपी पर कार्रवाई करती है, तो उनके पारिवारिक बिजनेस और कंपनियों के खातों की बारीकी से जांच की जाती है. सतीश जारकीहोली की कंपनी में प्रियंका के एमडी होने के कारण उनके घर, ऑफिस, बिजनेस ट्रांजेक्शन को जांच के दायरे में लिया गया है.
प्रियंका और कर्नाटक की राजनीति में जारकीहोली परिवार का वर्चस्व!
प्रियंका जारकीहोली का जन्म 1997 में बेलगावी के जिस प्रभावशाली, राजनीतिक, बिजनेस फैमिली में हुआ उसमें बचपन से ही उन्होंने घर में राजनीति, चीनी मिलों के बड़े बिजनेस को बेहद करीब से देखा. कर्नाटक की राजनीति में जारकीहोली केवल परिवार नहीं, ब्रैंड माना जाता है जिसका उत्तरी कर्नाटक की राजनीति में जबरदस्त राज माना जाता है. जारकीहोली कर्नाटक के आदिवासी होते हैं लेकिन बड़े परिवार में हर किसी ने बिना राजनीतिक बैकग्राउंड, सपोर्ट के अपना जबरदस्त राजनीतिक सपोर्ट बनाया. जारकीहोली ब्रैंड के बारे में कहा जाता है कि कर्नाटक में सरकार चाहे किसी भी पार्टी की बने, कोई न कोई जारकीहोली सरकार में मंत्री जरूर बनता है.
कांग्रेस में रहते हुए सतीश जारकीहोली ने केवल टॉप के नेता बने बल्कि जब भी कर्नाटक कांग्रेस में सीएम बदलने की बारी आती है तो सतीश नेचुरल दावेदार बनकर उभरते हैं. उन्हें सिद्धारमैया कैंप का करीबी माना जाता है. उन्हीं के साथ 2006 में जेडीएस से कांग्रेस में आए और उसी के होकर रह गए. 2008 से आजतक कभी चुनाव नहीं रहे. पता नहीं ये संयोग है या नहीं लेकिन उनका एक बेटी, एक बेटे का परिवार है. बेटी प्रियंका और बेटा राहुल है जो एरोनॉटिकल इंजीनियर होने के बाद पिता के बिजनेस के साथ कांग्रेस में भी काम कर रहे हैं.
प्रियंका के नामाकरण के पीछे की कहानी
दिलचस्प ये है कि जब सतीश जारकीहोली के बच्चों का जन्म हुआ(प्रियंका का जन्म 1997 में और राहुल का 1999 में हुआ), तब सतीश कांग्रेस पार्टी में शामिल भी नहीं हुए थे. उस समय देवगौड़ा की पार्टी JD(S) में हुआ करते थे. लेकिन कांग्रेस, नेहरू-गांधी परिवार को पसंद कर रहे थे. सम्मान और दीवानगी के चलते उन्होंने अपने नवजात बच्चों के नाम दिल्ली के 'राहुल-प्रियंका' के नाम पर रख दिए.
कर्नाटक के राजनीतिक गलियारों में अक्सर यह चुटकी ली जाती है कि सतीश जारकीहोली ने 90 के दशक में ही अपने बच्चों के राजनीतिक करियर का 'लॉन्चिंग पैड' तैयार कर दिया था. जब 2006 में वे खुद औपचारिक रूप से कांग्रेस में शामिल हुए, तो उनके बच्चों के नाम दिल्ली हाईकमांड (सोनिया गांधी और राहुल गांधी) के कानों में बहुत स्वाभाविक और अपनेपन जैसे लगते थे. हालांकि इससे उन्हे फायदा इतना ही हुआ कि वो कांग्रेस के फ्रंटलाइन नेता बने लेकिन बार-बार कांग्रेस सरकार बनने के बाद भी सीएम बनने की लॉटरी हासिल नहीं कर सके.
बीजेपी-कांग्रेस दोनों में ही वर्चस्व
जारकीहोली परिवार का दबदबा राजनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर बेहद मजबूत है. कांग्रेस में और बीजेपी में रहकर दोनों हाथों में लड्डू लिए रहते हैं. पांच भाइयों के परिवार में दो भाई बीजेपी में हैं और दो भाई कांग्रेस में. सतीश जारकीहोली और लखन जारकीहोली कांग्रेस में हैं. रमेश जारकीहोली और बालचंद्र जारकीहोली बीजेपी के बड़े नेता और विधायक हैं. गोकाक से बीजेपी विधायक रमेश जारकीहोली परिवार के सबसे बड़े भाई हैं. बीजेपी सरकार में जल संसाधन मंत्री रहे. 2019 में कांग्रेस-JD(S) की सरकार गिराकर बीजेपी की सरकार बनवाने वालों में फ्रंट पर थे. भीमशी जारकीहोली परिवार का बिजनेस साम्राज्य संभालते हैं और बैकस्टेज से राजनीति में सक्रिय रहते हैं.
राजनीति के अलावा भी कई क्षेत्रों में फैला है साम्राज्य!
कर्नाटक विधानसभा में बेंगलुरु के बाद सबसे ज्यादा अकेले बेलगावी जिले से 18 सीटें आती हैं. इस पूरे बेल्ट की लगभग 8 से 10 सीटों पर जारकीहोली परिवार का सीधा प्रभाव माना जाता है. परिवार ST के वाल्मीकि नायक समुदाय का है. उत्तरी कर्नाटक में इस समुदाय की आबादी अच्छी-खासी है. जारकीहोली भाइयों को इस पूरे वोटबैंक का निर्विवाद नेता माना जाता है. इसी सामाजिक समीकरण (AHINDA) के दम पर सतीश जारकीहोली कर्नाटक की राजनीति में बड़ा कद रखते हैं.
जारकीहोली सिर्फ नेता नहीं, बल्कि कर्नाटक के बड़े 'शुगर बैरन्स यानी चीनी मिल मालिक हैं. इस परिवार के पास कुल मिलाकर 6 से अधिक बड़ी शुगर फैक्ट्रियां हैं. इसके अलावा रियल एस्टेट, माइनिंग (खनन) और कंस्ट्रक्शन में इनका अरबों का बिजनेस फैला हुआ है. हजारों किसान और स्थानीय मजदूर सीधे तौर पर इनकी मिलों से आजीविका पाते हैं, जिससे इनका जमीनी स्तर पर तगड़ा होल्ड है. जारकीहोली परिवार का मुख्य रसूख उनके अरबों रुपये के शुगर मिल और लिकर बिजनेस से आता है.
जारकीहोली को कर्नाटक की राजनीति का किंगमेकर परिवार भी कहा जाता है. पार्टियों की विचारधारा इनके लिए बस एक चोला है. असली मकसद इस क्षेत्र पर अपने जारकीहोली 'ब्रांड' के वर्चस्व को बनाए रखना है, जिसमें वे पिछले तीन दशकों से लगातार कामयाब हैं. पॉलिटिकली डिवाइडेड बट स्टिल यूनाइडेट फैमिली है जारकीहोली की.
प्रियंका की राजनीति में एंट्री!
प्रियंका जारकीहोली को पता नहीं राजनीति में आना भी था या नहीं. उन्होंने तो एमबीए की डिग्री ली और राजनीति में आने की बजाय पिता के कंपनी सतीश शुगर्स की एमडी बनकर बिजनेस एक्सपेंशन में जुटी रहीं. आज उसी की कीमत चुकानी पड़ रही है. 5 साल तक सतीश जारकीहोली फाउंडेशन के जरिए गांव, गरीब, महिलाओं, युवाओं के लिए काम करती रहीं. अभी तक उनकी शादी भी नहीं हुई है. शादी को लेकर फिलहाल न तो उनके परिवार की तरफ से कोई चर्चा चल रही है और न ही राजनीतिक गलियारों में ऐसी कोई बात सामने आई है.
2024 के चुनावों में अचानक ये बात उठी कि परिवार के दबदबे वाली सीट चिक्कोडी को प्रियंका को चुनाव में उतारा जाए. ज्वाइंट फैमिली में इस बात को लेकर विरोध हुआ कि एक लड़की कैसे राजनीति में आ सकती है. इतने बड़े परिवार में सारे मर्दों ने ही राजनीति में एंट्री ली. किसी महिला के बारे में कभी सोचा नहीं गया. तमाम पारिवारिक हिचकिचाहट के बीच उनके पिता सतीश जारकीहोली ने डटकर अपनी बेटी का साथ दिया. उन्होंने प्रियंका को चिक्कोडी सीट से टिकट दिला दिया.
पहली बार में ही प्रियंका ने बना दिया रिकॉर्ड
एमबीए ग्रेजुएट, एक लड़की, वो भी आदिवासी, प्रोफेशनली बिजनेस संभाल रही प्रियंका का रेजूमे राहुल गांधी के टिकट देने के कई क्राइटेरिया के लिए परफेक्ट मैच था. 26 साल की उम्र में उन्हें लोकसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड बना दिया. अपने पहले ही चुनाव में अनुभवी और 60 साल के दो बार के बीजेपी सांसद अन्नासाहेब जोले को 90 हजार वोटों के बड़े अंतर से मात दे दी. कांग्रेस के लिए प्रियंका की जीत इसलिए बड़ी बनी कि चिक्कोडी सीट 2004 से लगातार बीजेपी का गढ़ बनी हुई थी. कर्नाटक के चुनावी इतिहास में प्रियंका किसी जनरल सीट से जीतने वाली पहली आदिवासी महिला उम्मीदवार बनीं. चिक्कोडी जैसी सामान्य सीट पर आदिवासी चेहरे को उतारना कांग्रेस का बड़ा जुआ था, जिसे जीतकर उन्होंने इतिहास रच दिया.
राहुल की टीम में प्रियंका की एंट्री!
प्रियंका के सगे चाचा जो बीजेपी में हैं अपनी ही भतीजी के खिलाफ बीजेपी उम्मीदवार अन्नासाहेब जोले के लिए वोट मांग रहे थे. फिर भी प्रियंका ने कमाल कर दिखाया. इतना सब होने के बाद प्रियंका को दिल्ली आते ही सीधे राहुल गांधी की टीम में लैंड होना ही था. उन पर राहुल का कॉन्फिडेंस ही था कि महिला आरक्षण, डिलिमिटेशन, एजुकेशन बजट को लेकर करारे भाषण देने का मौका मिला. संसद में भाषण देने के अलावा उन्होंने एक और खास पहल की. दिसंबर 2025 में, अपने चुनाव क्षेत्र चिक्कोडी की 15 Meritorious Girl Students को अपने खर्च पर हवाई जहाज से दिल्ली लेकर आईं संसद की कार्यवाही लाइव दिखाने.
ईडी रेड से कर्नाटक की राजनीति में हलचल तेज!
ईडी के रेड वाले एक्शन ने कर्नाटक की राजनीति में एकदम से आग लगा दी है. सतीश जारकीहोली सिद्धारमैया समर्थक माने जाते हैं लेकिन सीएम डीके शिवकुमार ने Political Vendetta और अगले चुनावों से जोड़ा है. शिवकुमार ने साफ आरोप लगाया कि सतीश जारकीहोली कर्नाटक में दलित और आदिवासी (AHINDA) राजनीति के सबसे मजबूत स्तंभ हैं और उनकी बेटी प्रियंका कांग्रेस की एक उभरती हुई युवा आदिवासी महिला सांसद हैं. सरकार जानबूझकर जारकीहोली जैसे कद्दावर विपक्षी नेताओं को निशाना बनाकर उन पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालना चाहती है, ताकि कांग्रेस के बढ़ते हौसलों को रोका जा सके.
सतीश जारकीहोली को न केवल जनाधार बल्कि क्लीन इमेज वाला नेता माना जाता रहा है. अंधविश्वास के खिलाफ लड़ने और जमीन से जुड़े रहने के लिए जाने जाते हैं. ईडी की एंट्री ने उनकी क्लीन इमेज पर फिलहाल के लिए तो दाग लगा दिया है. ये सब जानते हैं कि एक बार ईडी का फंदा करीब आया तो आसानी से जाता नहीं. सतीश के लिए सबसे बड़ा व्यक्तिगत और राजनीतिक झटका ये है कि उनकी प्रियंका, जिन्होंने अभी-अभी लोकसभा सांसद के रूप में शुरुआत की थी, अपने करियर के पहले-दूसरे साल में ED के जांच के घेरे में आ गई हैं. एक पिता और राजनीतिक गुरु के तौर पर सतीश के लिए अपनी बेटी के राजनीतिक भविष्य को इस विवाद से बचाना एक बड़ी चुनौती होगी.
भले ही राजनीतिक तौर पर कांग्रेस इस छापे को 'विक्टिम कार्ड' की तरह इस्तेमाल कर जनता के बीच बीजेपी को घेरने की कोशिश करेगी, लेकिन कानूनी मोर्चे पर सतीश जारकीहोली और उनके परिवार के लिए आने वाले दिन बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं. यदि जांच लंबी खिंचती है या कोई बड़ी रिकवरी होती है, तो यह कर्नाटक कांग्रेस के भीतर चल रही लीडरशिप की रेस में सतीश जारकीहोली को बैकफुट पर धकेल सकता है.
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