D K Shivakumar News: कर्नाटक की राजनीति में इस समय सबसे बड़ी चर्चा मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बदले हुए तेवरों को लेकर हो रही है. जो डीके कल तक कांग्रेस के सबसे बड़े ट्रबलशूटर माने जाते थे और रूठे हुए विधायकों को मनाने के लिए खुद उनके दरवाजे पर जाते थे, आज वे अचानक बेहद आक्रामक रुख अपना चुके हैं. जून में लंबे संघर्ष के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद, डीके ने 3 अगस्त को अपनी कैबिनेट का पहला बड़ा विस्तार किया, जिसमें 19 नए मंत्रियों को शामिल किया गया. लेकिन इस विस्तार के बाद जैसे ही पार्टी में बगावत के सुर उठे, डीके ने किसी को मनाने के बजाय दोटूक कह दिया कि वे ब्लैकमेलिंग के आगे नहीं झुकेंगे. डीके शिवकुमार खुद का उदाहरण देते हुए कह रहे हैं कि वे भी सालों तक कैबिनेट से बाहर रहे लेकिन सब्र रखा, इसलिए बाकी नेताओं को भी अब 'लोड नहीं लेने का' और चुपचाप काम करने का वक्त है.
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जूनियरों को तरजीह और दागी चेहरों की एंट्री पर बगावत
डीके की सरकार के कैबिनेट विस्तार में कुछ ऐसे चेहरों को एंट्री दी गई है, जिससे कांग्रेस के पुराने वफादारों के सीने पर सांप लोट गया है. सबसे बड़ा विवाद पहली बार के विधायकों पी.एम. नरेंद्रस्वामी, रिजवान अर्शद और अजय सिंह को सीधे कैबिनेट मंत्री की मलाईदार कुर्सी सौंपने पर है. सीनियर नेताओं का आरोप है कि दशकों की वफादारी और अनुभव को दरकिनार कर जूनियरों को तरजीह दी गई है. चामराजपेट के विधायक जमीर अहमद खान को कैबिनेट में शामिल करने पर भी पार्टी के भीतर भारी असंतोष है. जमीर अहमद खान पर हाल ही में हुए दवणगेरे साउथ उपचुनाव में पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के गंभीर आरोप लगे थे, लेकिन इसके बावजूद उन्हें मंत्री पद से नवाज दिया गया, जिसे लेकर काफी खुसर-पुसर हो रही है.
महिला नेतृत्व दरकिनार: गायत्री शांतिगौड़ा का पत्ता कटा और वीटो राजनीति
विवाद सिर्फ मंत्री बनाने पर नहीं, बल्कि कइयों का पत्ता काटने पर भी है. इस कैबिनेट विस्तार का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि पूरी कैबिनेट में एक भी महिला मंत्री शामिल नहीं की गई. आखिरी वक्त तक एमएलसी ए.वी. गायत्री शांतिगौड़ा का नाम तय माना जा रहा था, लेकिन ऐन मौके पर उनका नाम लिस्ट से उड़ा दिया गया. कहा जा रहा है कि सिद्धारमैया के कड़े विरोध और आखिरी मिनट के सियासी समीकरणों के कारण ए.वी. गायत्री शांतिगौड़ा के नाम की बलि चढ़ गई. राजभवन में शपथ ग्रहण से ठीक पहले पूर्व सीएम सिद्धारमैया ने बिना सलाह-मशविरा किए गायत्री का नाम शॉर्टलिस्ट होने पर सीधे दिल्ली दरबार के सामने वीटो लगा दिया और अपने करीबी बसावराज रायरेड्डी को कैबिनेट में फिट करवा दिया. मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने इस फेरबदल को "तकनीकी मुद्दा" बताकर टालने की कोशिश तो की, लेकिन इस 'लास्ट-मिनट एडजस्टमेंट' के कारण अब पूरी कैबिनेट में एक भी महिला मंत्री नहीं बची है, जिसने कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी को सरेआम उजागर कर दिया है.
दिग्गजों की छुट्टी, दफ्तर में तोड़फोड़ और इस्तीफे की धमकी
दिनेश गुंडू राव और एम. कृष्णप्पा जैसे कांग्रेस के कद्दावर दिग्गजों को भी कैबिनेट से सीधे ड्रॉप कर दिया गया. इसके बाद उनके समर्थकों ने बेंगलुरु में केपीसीसी (KPCC) दफ्तर के बाहर जमकर तोड़फोड़ और प्रदर्शन किया. कोलार और चिक्कबल्लापुर जैसे जिलों को पूरी तरह नजरअंदाज करने से नाराज होकर इंडी (Indi) के वरिष्ठ विधायक यशवंतरायगौड़ा पाटिल ने तो गुस्से में अपना इस्तीफा तक आलाकमान को भेज दिया है.
सिद्धारमैया की रहस्यमयी खामोशी और बैकस्टेज से बगावत को हवा
इस पूरी सियासी आग के बीच पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की भूमिका सबसे ज्यादा रहस्यमयी और दिलचस्प बनी हुई है. 3 अगस्त को राजभवन में हुए भव्य शपथ ग्रहण समारोह से सिद्धारमैया का पूरी तरह गायब रहना इस बात का सबूत है कि 'ऑल इज नॉट वेल'. सिद्धारमैया इस बात से बेहद खफा हैं कि डीके शिवकुमार और दिल्ली आलाकमान ने मिलकर उनकी कई महत्वपूर्ण सिफारिशों को कूड़ेदान में डाल दिया. गायत्री शांतिगौड़ा का पत्ता कटना और सिद्धारमैया के करीबी कुरुबा समुदाय के सीनियर नेताओं को जगह न मिलना उनके लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका है. सिद्धारमैया खुद भले ही कैमरे के सामने खामोश हैं, लेकिन उनके गुट के विधायक खुलकर डीके शिवकुमार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं, जो यह दिखाता है कि वे बैकस्टेज से इस असंतोष को हवा दे रहे हैं.
2004 और 2013 का वो दौर: जब डीके ने भी पिया था सब्र का घूंट
डी.के. शिवकुमार के तीन दशकों से ज़्यादा लंबे राजनीतिक करियर में दो मौके ऐसे आए जब उन्हें भारी राजनीतिक कद और वफादारी के बावजूद 'सब्र का कड़वा घूंट' पीना पड़ा. पहला मौका साल 2004 में आया, जब धर्म सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार बनी और डीके को कैबिनेट से बाहर बैठना पड़ा. 2013 में जब सिद्धारमैया पहली बार मुख्यमंत्री बने, तब डीके शिवकुमार को उनके कट्टर विरोधी गुट और उनके खिलाफ चल रहे कानूनी मामलों का हवाला देकर शुरुआती कैबिनेट से दूर रखा गया. इन दोनों ही मौकों पर नंबर वन ट्रबलशूटर होने के बावजूद उन्होंने पार्टी से बगावत नहीं की, बल्कि संगठन के लिए जमीन पर काम करते रहे.
2023 के ढाई साल का इंतजार और जून 2026 में सीएम कुर्सी का फल
डी.के. शिवकुमार की राजनीतिक यात्रा में सब्र का सबसे बड़ा और कड़ा इम्तिहान साल 2023 में आया, जब कर्नाटक में कांग्रेस की बंपर जीत के बाद वे मुख्यमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार थे, लेकिन हाईकमान के फैसले के आगे सिर झुकाकर उन्हें सिद्धारमैया के नीचे 'डिप्टी सीएम' पद पर सब्र करना पड़ा. साल 2004 और 2013 में कैबिनेट से बाहर रहने का दर्द झेलने वाले डीके ने 2023 में भी पार्टी की एकजुटता के लिए ढाई साल तक मुख्यमंत्री बनने का अपना सपना दबाए रखा और संगठन को मजबूत करते रहे. इसी बेमिसाल सब्र का फल उन्हें जून 2026 में मिला जब वे आखिरकार कर्नाटक के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे, और आज इसी लंबे इंतजार और त्याग का उदाहरण देकर वे कैबिनेट विस्तार से नाराज विधायकों को समझा रहे हैं कि राजनीति में रोने-धोने से नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ धैर्य रखने से ही मुख्यमंत्री पद तक का रास्ता तय होता है.
किंगमेकर से सुल्तान बनने की चाह और दिल्ली दरबार का 'फ्री-हैंड'
आखिर ऐसा क्या हुआ कि सबको साथ लेकर चलने वाले डीके शिवकुमार अचानक इतने बेपरवाह हो गए? असल में, डीके अब किंगमेकर की भूमिका से बाहर आकर खुद को कर्नाटक के एकछत्र और मजबूत 'सुल्तान' के रूप में स्थापित करना चाहते हैं. उन्हें अच्छी तरह पता है कि जून 2026 में मुख्यमंत्री बनने के बाद अगर वे इस वक्त क्षेत्रीय क्षत्रपों की ब्लैकमेलिंग के आगे झुक गए, तो वे 2028 के अगले विधानसभा चुनाव तक सरकार को मजबूती से नहीं चला पाएंगे. सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार डीके को राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे का 100% समर्थन हासिल है. दिल्ली दरबार से मिले इसी 'फ्री-हैंड' और अभयदान के दम पर डीके अब साफ कह रहे हैं कि जिसे पार्टी छोड़नी है, वो शौक से छोड़ें, लेकिन सरकार अब उनके 'कड़क' नियमों से ही चलेगी.
135 सीटों का जादुई आंकड़ा: क्यों बागी विधायकों से बेफिक्र हैं डीके?
कर्नाटक विधानसभा का नंबर गेम भी डी.के. शिवकुमार की इस बेपरवाही की सबसे बड़ी ताकत है. कुल 224 सीटों वाली कर्नाटक विधानसभा में बहुमत के लिए जादुई आंकड़ा 113 का है, जबकि कांग्रेस पार्टी 135 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता के शीर्ष पर बैठी है. मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार अच्छी तरह जानते हैं कि कैबिनेट विस्तार से नाराज होकर अगर 10-15 विधायक बगावत का झंडा बुलंद भी कर देते हैं, तब भी उनकी सरकार की सेहत पर कोई आंच नहीं आने वाली. कांग्रेस के पास बहुमत के आंकड़े से 22 सीटें ज्यादा हैं, और यही 'सरप्लस' नंबर गेम डीके को यह ताकत देता है कि वे नाराज और बागी विधायकों को मनाने के बजाय सीधे 'इस्तीफा' देने की दोटूक चुनौती दे सकें.
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