एक ऐसा शख्स जिसकी पहचान केवल उसकी कुर्सी नहीं, उसकी 'जमीर' बनी. एक ऐसा कलेक्टर, जिसने 2018 के केरल बाढ़ में अपनी पहचान छिपाकर आम लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बोरियां उठाईं और सेवा की मिसाल पेश की. लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती क्योंकि साल 2019 में जब पूरा सिस्टम खामोश था, तब भारतीय प्रशासनिक सेवा के इस 2012 बैच के अफसर ने जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 हटाने के विरोध में अपनी IAS की पदवी को ठोकर मार दी. ये कोई और नहीं बल्कि कन्नन गोपीनाथन है, जिन्होंने पिछले साल कांग्रेस पार्टी ज्वॉइन की. लगा था कि सियासी पारी की शुरुआत के साथ, चुनावी डेब्यू भी जल्द होगा लेकिन सरकार ने ऐसा खेल किया कि कन्नन चुनाव लड़ ही नहीं पा रहे.
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कन्नन ने सोशल मीडिया पर सरकार को घेरा
9 अप्रैल को केरल में चुनाव है. कन्नन गोपिनाथन की इच्छा है कि कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े. लेकिन वो सिर्फ एक ख्वाहिश बनकर इसलिए रह गई क्योंकि पिछले साढ़े 6 साल से उनका रेजिग्नेशन ही सरकार ने एक्सेप्ट नहीं किया है. चुनाव न लड़ने की ख्वाइश मन की मन में ही रह गई इसलिए कन्नन ने सोशल मीडिया पर जमकर गुस्सा निकाला. उन्होंने पीएम मोदी कौ टैग करते हुए लिखा,
'मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूं कि आपकी सरकार ने पिछले 6.5 सालों से मेरा इस्तीफा स्वीकार नही किया है. न सैलरी मिल रही है, न ही रिलीज किया जा रहा है. इस वजह से मैं प्रोफेशनली आगे नहीं बढ़ पा रहा हूं और इसने मुझे केरल में चुनाव लड़ने से भी रोक दिया है. यह शुद्ध रूप से उत्पीड़न के अलावा और कुछ नहीं है.'
उन्होंने आगे लिखा कि, 'मैंने अब तक अपना व्यक्तिगत मुद्दा नहीं उठाने का फैसला किया था, क्योंकि मैं उन कठिनाइयों से अच्छी तरह वाकिफ हूं जिनसे करोड़ों लोग आपके शासन में गुजर रहे हैं. लेकिन मेरे इस्तीफे के अधिकार को रोकना और मुझे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने से रोकना बेहद दयनीय और ओछी हरकत है, चाहे मेरी राजनीतिक विचारधारा जो भी हो. इस संकीर्णता को बंद करें और अपनी सुस्त सरकार को निर्देश दें कि वे तुरंत मेरा इस्तीफा स्वीकार करें.'
क्या है चुनाव लड़ने के लिए नियम?
अब बिना इस्तीफा स्वीकार हुए वह न तो कन्नन कहीं और नौकरी कर सकते हैं और न ही अपना करियर आगे बढ़ा सकते हैं. इसी बात को लेकर उनका गुस्सा है. सिर्फ इस्तीफा 'दे देना' काफी नहीं है, बल्कि उसका 'स्वीकार' होना जरूरी है. जब तक सरकार इस्तीफा स्वीकार नहीं करती, अधिकारी तकनीकी रूप से 'ऑन ड्यूटी' या सेवा में माना जाता है. रिटर्निंग ऑफिसर (RO) नामांकन पत्रों की जांच के समय यह देखता है कि उम्मीदवार ने सरकारी पद से विधिवत त्यागपत्र दे दिया है और वह स्वीकार हो चुका है. अगर इस्तीफा लंबित है, तो नामांकन रद्द किया जा सकता है क्योंकि उम्मीदवार अभी भी 'लाभ के पद' पर माना जाएगा.
पहले चर्चा थी कि कन्नन गोपीनाथन पलक्कड़ से चुनाव लड़ सकते है क्योंकि इस जगह से उनका निजी जुड़ाव हैं. हालांकि, उन्हें चुनाव लड़ने का अवसर नहीं मिल सका. अब यूडीएफ (UDF) ने पलक्कड़ से फिल्मी सितारे रमेश पिशारोडी को अपना उम्मीदवार बनाया है.
कन्नन गोपीनाथन का मशहूर किस्सा!
कन्नन गोपीनाथन केरल से ही आते हैं. उनका जन्म केरल के कोट्टायम (Kottayam) जिले में हुआ था. केरल से जुड़ा एक किस्सा उनके आईएस के दिनों का काफी चर्चा में रहता है. 2018 में जब केरल सदी की सबसे भीषण बाढ़ से जूझ रहा था, तब कन्नन गोपीनाथन दादरा और नगर हवेली के कलेक्टर थे. उन्होंने आधिकारिक तौर पर छुट्टी ली और चुपचाप केरल पहुंच गए. उन्होंने किसी को नहीं बताया कि वह एक IAS अधिकारी या जिला कलेक्टर हैं. वह एक साधारण टी-शर्ट और पैंट पहनकर राहत शिविरों में पहुंच गए.
वहां उन्होंने कुली की तरह काम करते हुए तिरुवनंतपुरम और एर्नाकुलम के कलेक्शन सेंटरों पर आम वॉलंटियर्स के साथ मिलकर ट्रकों से भारी-भारी राहत सामग्री की बोरियां उतारते रहे. किसी को कानों-कान खबर नहीं थी कि उनके साथ बोरियां उठाने वाला यह शख्स एक 'बड़ा साहब' है. करीब 8 दिनों बाद, जब वह एक अन्य राहत केंद्र पर पहुंचे, तो वहां मौजूद एक अन्य अधिकारी ने उन्हें पहचान लिया.
क्यों दिया था इस्तीफा?
कन्नन ने 21 अगस्त 2019 को अपना इस्तीफा सौंपा. उस समय वे दादरा और नगर हवेली में बिजली और गैर-पारंपरिक ऊर्जा सचिव के पद पर तैनात थे. उनका इस्तीफा मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद लगाए गए प्रतिबंधों के विरोध में था. उनके गुस्से के पीछे का बड़ा कारण था मौलिक अधिकारों का हनन, बोलने की आजादी पर रोक.
हैरानी की बात यह है कि 6.5 साल बीत जाने के बाद भी तकनीकी रूप से उनका इस्तीफा अभी तक मंजूर नहीं हुआ है. सरकार ने उनके खिलाफ 'अनुशासनात्मक जांच' (Disciplinary Inquiry) शुरू कर दी, जिसकी वजह से उनका रेजिग्नेशन 'पेंडिंग' कैटेगरी में डाल दिया गया है.
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