कर्नाटक की राजनीति में इस वक्त गजब का राजनीतिक भूचाल आया हुआ है. सरकार में रहते हुए कांग्रेस का चारों सीटों पर हारना बड़ा गजब ढा रहा है. MLC चुनाव के नतीजों ने कर्नाटक की पूरी राजनीति पलट दी है. पूरी चर्चा ये है कि बैलेट पेपर से हुए चुनाव में कांग्रेस हार गई. हार ने डीके शिवकुमार को प्रेशर में डाल दिया है. कर्नाटक बीजेपी नेता हुंकार भर रहे हैं कि 2028 का विधानसभा चुनाव तो हम ही जीतेंगे. बीजेपी के लिए बड़ी जीत का जश्न बनता है, लेकिन जोश सातवें आसमान पर पहुंचने के अति-उत्साह में बीजेपी ने कुछ ऐसे आरोप लगा दिया है जिसमें चुनाव आयोग को ही को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है.
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राहुल गांधी लगातार आरोप लगाते हैं कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं हैं. अब ठीक वही स्क्रिप्ट बीजेपी ने कर्नाटक में कांग्रेस के खिलाफ लिख दी है. विधानसभा में नेता विपक्ष आर अशोक ने बड़ा आरोप लगाया है कि अगले महीने होने जा रहे ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (GBA) चुनावों में धांधली करने के लिए कर्नाटक का राज्य चुनाव आयोग खुद ही 'वोटर लिस्ट घोटाले' का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है. आरोप ये कि यहां का चुनाव आयोग 'फेयर' नहीं रह गया है और पर्दे के पीछे से सरकार के इशारे पर खेल कर रहा है. बीजेपी की लड़ाई तो कांग्रेस और डीके शिवकुमार से है लेकिन लगाए गए आरोपों से चुनाव आयोग ही फंस रहा है जिसकी निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं.
आर अशोक ने चुनाव आयोग पर उठाए सवाल
आर अशोक का आरोप सीधे राज्य चुनाव आयोग की नीयत पर है. 14 मई को चुनाव आयोग (ECI) आदेश देता है कि बेंगलुरु की वोटर लिस्ट का SIR किया जाए, यानी फर्जी वोटरों को बाहर निकाला जाए. अगले दिन 15 मई को राज्य चुनाव आयोग आनन-फानन में बिना नई लिस्ट का इंतजार किए, पुरानी लोकसभा लिस्ट के आधार पर 90 लाख नए वोटर आईडी कार्ड छापने का टेंडर जारी कर देता है. आर अशोक का सीधा सवाल है- जब पता था कि नई और शुद्ध वोटर लिस्ट आने वाली है, तो पुरानी लिस्ट के आधार पर 90 लाख कार्ड छापने की इतनी हड़बड़ी क्या थी? 31 लाख बोगस वोटर आईडी क्यों छपवाए गए? आर अशोक ने ही चुनाव आयोग के टेंडर की सीबीआई जांच की मांग की है.
दफ्तरों में धूल खा रहे हैं बोगस कार्ड ?
आर अशोक के आरोपों का दूसरा और सबसे पुख्ता सिरा आंकड़ों से जुड़ता है. 27 अक्टूबर 2026 को जब विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की फाइनल रिपोर्ट आई, तो बेंगलुरु में असली मतदाताओं की संख्या सिमटकर महज 59.97 लाख (करीब 60 लाख) रह गई. अब बीजेपी का चुनाव आयोग से सीधा सवाल है कि नियम के मुताबिक कार्ड छापने से पहले अफसरों को घर-घर जाकर भौतिक सत्यापन करना था, नई तस्वीरें लेनी थीं. ऐसा कुछ नहीं किया गया. नतीजा यह है कि जब शहर में असली वोटर ही 59 लाख हैं, तो आयोग के पास पहले से छपे हुए 90 लाख कार्ड क्या कर रहे हैं? ये अतिरिक्त 31 लाख कार्ड सीधे-सीधे 'बोगस हैं, जो अब कॉरपोरेशन के दफ्तरों में धूल खा रहे हैं. आर अशोक का दावा है कि ये फर्जी कार्ड चुनाव में धांधली के लिए बचाकर रखे गए हैं.
BJP ने कांग्रेस पर लगाए बड़े आरोप
यह पूरी जंग जिस मैदान के लिए लड़ी जा रही है, उसका नाम है 'ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी' (GBA) चुनाव, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद 31 दिसंबर 2026 तक होने तय हैं. बेंगलुरु को पांच नगर निगमों और 369 वार्डों में बांटकर पहली बार इस नए ढांचे के तहत चुनाव कराए जा रहे हैं. सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस चुनाव के लिए भी राज्य चुनाव आयोग ने 'बैलेट पेपर' का ही फैसला किया है. बीजेपी का कहना है कि एमएलसी चुनाव में तो जनता ने उन्हें सीधे वोट दिया, पर इस जीबीए चुनाव में कांग्रेस अपनी साख बचाने के लिए राज्य चुनाव आयोग की मदद से इन 31 लाख अतिरिक्त बोगस कार्डों का इस्तेमाल कर 'वोट चोरी' का बड़ा प्लान बना रही है.
बेंगलुरु शहर पिछले छह साल से बिना किसी चुनी हुई स्थानीय सरकार (निकाय सरकार) के चल रहा है. आखिरी बार साल 2015 में पुराने 'बीबीएमपी' (BBMP) ढांचे के तहत स्थानीय चुनाव हुए थे, जिसमें बीजेपी ने 198 में से 100 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया था और कांग्रेस को सिर्फ 76 सीटों पर समेट दिया था. बेंगलुरु शहर को बीजेपी का एक मजबूत गढ़ माना जाता रहा है, जहां मध्यम वर्ग और शहरी वोटर पारंपरिक रूप से बीजेपी के साथ खड़े दिखते हैं. कांग्रेस हमेशा से यहां पैर जमाने की जद्दोजहद में रही है.
2023 के बाद कांग्रेस सरकार ने पुराने बड़े निगम को भंग करके पांच छोटे नगर निगमों वाली नई 'ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी' (GBA) का गठन किया है. अब इस नए ढांचे के तहत 369 वार्डों पर होने जा रहा यह मुकाबला दोनों दलों के लिए पुरानी हार-जीत का हिसाब चुकता करने का सबसे बड़ा अखाड़ा बन गया है. अब जबकि चुनाव सिर पर हैं, तो बीजेपी अपनी इस पुरानी पकड़ को खोना नहीं चाहती, खासकर तब जब एमएलसी चुनाव के नतीजों ने उनके कार्यकर्ताओं में जबरदस्त करंट पैदा कर दिया है.
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CM डीके शिवकुमार के लिए चुनाव करो या मरो बना
सीएम डीके शिवकुमार के लिए चुनाव करो या मरो का बन चुका है. बेंगलुरु का पूरा राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण सीधे उनके पोर्टफोलियो और प्रतिष्ठा से जुड़ा है. एमएलसी चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद उन पर पार्टी के भीतर और बाहर भारी दबाव है. अगर कांग्रेस यह चुनाव भी हार जाती है, तो डीके शिवकुमार के नेतृत्व पर बहुत बड़ा सवालिया निशान लग जाएगा. यही वजह है कि बीजेपी उन्हें घेरने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है और सीधे आरोप लगा रही है कि हार के डर से कांग्रेस अब चुनाव आयोग के साथ मिलकर 'फर्जी कार्डों' के दम पर चुनाव जीतना चाहती है.
बैलेट पेपर से हुए एमएलसी चुनाव में मिली जीत ने कर्नाटक बीजेपी को 'ओवर-कॉन्फिडेंट' या कहें कि बहुत ज्यादा जोश में ला दिया है कि वे अब सीधे संवैधानिक संस्था को ही चुनौती दे रहे हैं. वहीं कांग्रेस बैकफुट पर आकर अपनी कमियों को सुधारने की बात कह रही है, लेकिन 31 लाख अतिरिक्त वोटर कार्ड्स का यह जिन्न अब कर्नाटक की राजनीति में इतनी आसानी से शांत होने वाला नहीं है. देखना होगा कि निष्पक्षता का यह नैरेटिव ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी के चुनावों में ऊंट किस करवट बैठता है.
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