कौन है VS अच्युतानंद जिनके सम्मान में CPM ने पलट दी पॉलिसी

मोदी सरकार के फैसले पर सवाल उठ रहे हैं कि केरल के दिग्गज नेता वीएस अच्युतानंदन को मरणोपरांत पद्म विभूषण देने का फैसला कहीं आगामी केरल चुनावों को ध्यान में रखकर तो नहीं लिया गया. इस कदम के बाद लेफ्ट की पारंपरिक राजनीति और उसके रुख को लेकर भी नई बहस शुरू हो गई है.

V. S. Achuthanandan
V. S. Achuthanandan

रूपक प्रियदर्शी

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देश में तीन तरह की राजनीतिक विचारधाराएं हैं. एक विचारधारा कांग्रेस की जो मद्धिम पड़ रही है. एक लेफ्ट की विचारधारा जो केरल में ही सबसे मजबूत स्थिति में है और तीसरी विचारधारा है बीजेपी की जिसका परचम दक्षिण को छोड़कर पूरे देश में लहरा रहा है. 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद विचारधारा की लड़ाइयां जमकर छिड़ीं. फिर भी सरकार ने दूसरी बार ऐसा फैसला लिया जिसमें लेफ्ट की विचारधारा का सम्मान दिखाते हुए पद्म सम्मान देने का एलान हुआ.  

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सरकार ने केरल के सीएम रहे बड़े कम्युनिस्ट नेता वी एस अच्युतानंदन को भारत रत्न के बाद दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म विभूषण देने का एलान किया. वीएस अच्युतानंदन का पिछले जुलाई में निधन हुआ था. केरल में चुनाव आए तो सरकार ने मरणोपरांत वीएस अच्युतानंदन को पद्म विभूषण देने का एलान कर दिया. 

मोदी सरकार के मास्टरस्ट्रोक में फंस गया लेफ्ट 

केरल चुनाव से पहले मोदी सरकार का सम्मान देने के फैसले से राजनीतिक खलबली मचा दी. है तो मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक जिसमें फंस गया है लेफ्ट. बीएस अच्युतानंदन को सम्मान तब मिला जब वो जीवित नहीं हैं. सम्मान लेने या नहीं लेने का फैसला करने के लिए वो हैं नहीं. 

सीपीएम पार्टी फैसला ले नहीं सकती. न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक परिवार की ओर से वीएस के बेटे वीए ए अरुण कुमार ने एलान कर दिया है कि परिवार पिता को मिलने वाला पद्म विभूषण सम्मान स्वीकार करेगा.ये देश से मिला सम्मान है. हम इसे स्वीकार करेंगे. बीएस अच्युतानंदन के परिवार का सम्मान स्वीकार करना लेफ्ट के लिए बड़ा झटका है. पार्टी की लाइन रही है कि उसके नेता सरकार के नागरिक सम्मान नहीं स्वीकारते रहे हैं. लेफ्ट के किसी नेता ने आज तक ऐसा कोई सम्मान स्वीकार नहीं किया. ज्यादा पुरानी बात नहीं है कि 2022 में मोदी सरकार ने ही पश्चिम बंगाल के सीएम रहे बुद्धदेब भट्टाचार्य को पद्म भूषण देने का एलान किया था लेकिन खुद बुद्धदेब बाबू ने सरकार का सम्मान लेने से मना कर दिया. कहा कि ये पार्टी की नीतियों के खिलाफ है. 

ज्योति बसु को भारत रत्न देने की चली थी बात 

यूपीए शासन में बंगाल के सीएम रहे ज्योति बसु को भारत रत्न देने की बात चली लेकिन उन्होंने मना कर दिया. ज्योति बसु ने 1996 में पीएम बनने से भी मना किया था. 1992 में कांग्रेस सरकार ने केरल के रहे E M S Namboodiripad को भी पद्म विभूषण देने का फैसला किया था लेकिन तब भी उन्होंने सम्मान स्वीकार नहीं किया.  ये पहला मौका है जब मरणोपरांत किसी लेफ्ट नेता को सरकार से नागरिक सम्मान मिल रहा है. पार्टी लाइन के मुताबिक हां या नहीं कहने के वो जीवित नहीं है. परिवार ने सरकार से सम्मान लेना मंजूर किया तो पार्टी ने भी नीति बदल दी. पार्टी ने इसे अपने और परिवार के लिए सम्मान की बात कहा है.  पार्टी की पुरानी लाइन रही है कि ऐसे सरकारी सम्मान नहीं लेंगे.

केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल-ये तीन ऐसे राज्य हैं जहां बीजेपी सत्ता में नहीं है. सत्ता पाने की बड़ी हसरतें जरूर हैं. केरल और तमिलनाडु में कोई करिश्मा हो जाएगा, बीजेपी को भी इसकी उम्मीद बहुत ज्यादा नहीं लेकिन बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी के साथ जरा भी ऊंच-नीच हुई तो बीजेपी की लॉटरी लग सकती है. 26 जनवरी आया तो मोदी सरकार को मौका मिला उन राज्यों में अपनी जयकार कराने का जहां उसकी जयकार होती नहीं. पद्म सम्मान के बहाने मोदी सरकार ने केरल की 8, तमिलनाडु की 13 और बंगाल की 11 हस्तियों को पद्म सम्मान देने का एलान कर दिया. वीएस अच्युतानंद के राजनीतिक होने, लेफ्ट नेता होने से चर्चा खूब हो रही है.

एस अच्युतानंदन हो गए थे राजनीति से दूर 

2006 से 2011 तक केरल के सीएम वी एस अच्युतानंदन 2019 से ही खराब सेहत के कारण सक्रिय राजनीति से दूर हो गए थे. पिछले साल जुलाई में लंबी बीमारी के बाद उन्होंने 101 साल की उम्र में आखिरी सांस ली. तब कहां किसे मालूम था कि लेफ्ट के कट्टर नेता रहे वीएस को लेकर बीजेपी की सरकार क्या सोच रही है. जुलाई में बीएस चले गए और जनवरी में अनाउंस हो गया कि वीएस अच्युतानंदन को दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया जाएगा. ये सब तब हुआ जब केरल में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. कनेक्शन सीधे जुड़ रहा है कि केरल चुनाव में बीजेपी के एंबिशन से.

कौन है कॉमरेड वीएस 
 
कॉमरेड वीएस-यही पॉपुलर नाम है वेलिक्काकाथु शंकरन अच्युतानंदन का. 1964 में वीएस उन 32 सदस्यों में शामिल थे जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) के फाउंडर मेंबर बने. तब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) से अलग होकर सीपीएम बनी थी. 2006 में उन्होंने तब चुनावों में लेफ्ट को लीड किया जब उनकी उम्र 82 साल हो चुकी थी. उनके जीवन का मशहूर किस्सा है कि जब उनके बेटे वीए अरुण कुमार की सरकारी नौकरी लगने पर आरोप लगे तो उन्होंने सीएम रहते हुए खुद विधानसभा समिति से जांच का एलान किया था. हालांकि जांच में कुछ भी आरोप साबित नहीं हो पाया. 

40 साल की राजनीति में 10 चुनाव लड़े, 7 में जीत 

40 साल की राजनीतिक में 10 चुनाव लड़े और 7 में जीत हासिल की. बचपन में मां और केरल के अलपुझा जिले के पुन्नपरा गांव में जन्मे वीएस के बचपन में मां और पिता का निधन हुआ. सातवीं से आगे पढ़ नहीं पाए. पहले दर्जी की दुकान में, फिर कारखाने में मजदूरी की. 18 साल के होने से पहले लेफ्ट के पी कृष्ण पिल्लई के संपर्क में आए और वहीं से राजनीति शुरू हो गई. कम्युनिस्ट आंदोलनों में शामिल होकर अंग्रेजों की लाठियां खाईं. ब्रिटिश पुलिस के जुल्म सहे. एक बार तो ऐसा हुआ कि मरा समझकर उन्हें जंगल में दफना दिया गया लेकिन मरे नहीं. लौटकर पार्टी में बुलंदी तक पहुंचे. 

केरल में अच्युतानंद याद किए जाते रहेंगे लेबर राइट्स, लैंड रिफॉर्म्स के लिए. ऐसे कट्टर कम्युनिस्ट नेता बने जिन्होंने जमीन पर जनता के बीच पकड़ और लोकप्रियता बनाई. हालांकि एक दौर ऐसा भी आया जब वो पार्टी से निकाले गए. उन्हें गुटबाजी के लिए जिम्मेदार ठहराया गया. 2016 में अच्युतानंदन सीएम फेस थे लेकिन जब लेफ्ट की सरकार बनी तब पिनराई विजयन के हाथों में सीएम की कमान चली गई. नाराज होकर वीएस अच्युतानंदन बीच बैठक से निकल गए. सम्मान बनाए रखने के लिए 2016 से 2021 तक कैबिनेट रैंक देकर केरल प्रशासनिक सुधारों की समिति का अध्यक्ष बनाया गया. हालांकि 2019 में स्ट्रोक के बाद वो घर तक सीमित हो गए. 

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