Lok Sabha Speaker Removal Process: संसद के बजट सत्र में इस समय जबरदस्त सियासी घमासान देखने को मिल रहा है. विपक्ष का सीधा आरोप है कि जब भी उनके नेता राहुल गांधी सदन में बोलने के लिए खड़े होते हैं तो स्पीकर ओम बिरला उन्हें टोक देते हैं या बोलने का पर्याप्त मौका नहीं देते. इसी नाराजगी के चलते अब विपक्षी खेमे में स्पीकर के खिलाफ मोर्चा खोलने की सुगबुगाहट तेज हो गई है. चर्चा है कि विपक्ष अब लोकसभा अध्यक्ष को उनके पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने की योजना बना रहा है.
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आमतौर पर लोग इसे अविश्वास प्रस्ताव समझते हैं, लेकिन संवैधानिक तकनीकी भाषा में इसे 'हटाने का प्रस्ताव' यानी 'मोशन ऑफ रिमूवल ऑफ स्पीकर' कहा जाता है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94(c) में लोकसभा स्पीकर को पद से हटाने का प्रावधान दिया गया है. हालांकि, यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं है जितनी दिखती है. इसके लिए कुछ कड़ी शर्तें पूरी करनी होती हैं जिसके बाद ही सदन में इस पर कोई चर्चा या फैसला संभव हो पाता है.
क्या है स्पीकर को हटाने की शर्तें?
अगर विपक्ष ओम बिरला को हटाने की दिशा में आगे बढ़ता है तो सबसे पहले उन्हें 14 दिन पहले एक लिखित नोटिस देना होगा. इस नोटिस पर कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर होना अनिवार्य है. बिना 50 सांसदों के समर्थन के यह प्रस्ताव पेश ही नहीं किया जा सकता. इसके अलावा यदि नोटिस स्वीकार हो जाता है तो अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए सदन में मौजूद सदस्यों के बहुमत की आवश्यकता होती है. यानी जिस पक्ष के पास ज्यादा सांसद होंगे जीत उसी की होगी.
मौजूदा लोकसभा का नंबर गेम?
लोकसभा में कुल 543 सीटें हैं, मौजूदा 18वीं लोकसभा में इसमें से एक सीट खाली है यानी कुल 542 सदस्य हैं. इस हिसाब से बहुमत का आंकड़ा 272 बैठता है. वर्तमान में सत्ताधारी एनडीए गठबंधन के पास 293 सांसद हैं जो बहुमत से काफी ज्यादा है. वहीं, विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' के पास 234 सांसद हैं. आंकड़ों को देखकर साफ पता चलता है कि जब तक एनडीए के सहयोगी दल विपक्ष का साथ न दें तब तक ओम बिरला को हटाना नामुमकिन है. फिलहाल सरकार और स्पीकर दोनों ही बेहद सुरक्षित स्थिति में नजर आ रहे हैं.
तीन बार आ चुका है स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी लोकसभा स्पीकर को प्रस्ताव के जरिए पद से हटाया गया हो. अतीत में कई बार कोशिशें जरूर हुईं, लेकिन वे कभी अंजाम तक नहीं पहुंच सकीं. 1967 में नीलम संजीव रेड्डी, 1987 में बलराम जाखड़ और 2011 में मीरा कुमार जैसी हस्तियों के खिलाफ भी विपक्ष ने हटाने के नोटिस दिए थे. चर्चाएं भी हुईं, लेकिन बहुमत के अभाव में कभी भी मामला औपचारिक वोटिंग तक नहीं पहुंच सका और प्रस्ताव गिर गए.
विपक्ष का केवल एक प्रतीकात्मक हथियार
ऐस में वर्तमान संख्या बल को देखते हुए ये स्पष्ट है कि स्पीकर के खिलाफ नोटिस देना विपक्ष के लिए केवल एक प्रतीकात्मक हथियार है. यह सदन में अपनी असहमति दर्ज कराने और सरकार पर दबाव बनाने का एक तरीका मात्र रहा है. जिस तरह की स्थिति अभी बनी हुई है, उसमें भी यह प्रस्ताव केवल एक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश ही साबित होता दिख रहा है, क्योंकि जमीन पर इसे पास कराने के लिए जरूरी आंकड़े फिलहाल विपक्ष के पास नहीं हैं.
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