जाति...वो पहचान है जिसे इंसान चाहकर भी कभी बदल नहीं सकता. लेकिन, इतिहास ऐसे नामों से भरा पड़ा है कि जिन्होंने जाति की बनाई सीमाएं तोड़कर टॉप पोजिशन हासिल की. देश की राजनीति में आज एक ऐसा ही नाम गूंज रहा है, मल्लिकार्जुन खरगे का. एक ऐसा व्यक्ति जिसने जाति की बंदिशों, राजनीति की बेड़ियों और बचपन के सबसे खौफनाक दंगों के जख्मों को पीछे छोड़ते हुए देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष बनने का सफर तय किया. लेकिन आज उसी नेता के साथ हुई एक घटना ने देश की राजनीति को हिलाकर रख दिया है. मल्लिकार्जुन खरगे पिछले 57 सालों से सक्रिय राजनीति में हैं. चुनावी राजनीति करते हुए 54 साल हो चुके. 84 साल की उम्र में खरगे को झेलना पड़ रहा है कि वो दलित हैं. हालांकि दलित होने की सजा उन्होंने पहले भी भुगती लेकिन वो सजा ऐसी नहीं राजनीतिक गुणा-गणित में उलझी थी.
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क्या 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी का संविधान और आरक्षण खतरे में है वाला नैरेटिव एक बार फिर देश की राजनीति को बदलने जा रहा है? उत्तराखंड के हल्द्वानी से उठा शुद्धिकरण विवाद अब हल्द्वानी से निकलकर देश की राजनीति के सेंटर में है.
देश में दलित सम्मान का मुद्दा फिर सिर उठा चुका है. मल्लिकार्जुन खरगे दलित हैं इसलिए उनका अपमान किया-राहुल गांधी ने इसी लड़ाई को 2026 का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बना दिया है और उनके निशाने पर बीजेपी है. खरगे के साथ हुई नाइंसाफी के खिलाफ आवाज उठाने पर राहुल गांधी पर एफआईआर होने से ये मुद्दा अब खरगे के अपमान से कहीं बड़ा हो गया है. आखिर क्या है उस लड़के मल्लिकार्जुन नाम के लड़के की कहानी जो बचपन के दंगों में अपनी मां को खोकर आज कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना, और कैसे उनका अतीत आज की राजनीति के सेंटर में आ गया है. चर्चित चेहरा के इस खास एपिसोड में आज जानेंगे मल्लिकार्जुन खरगे की पूरी कहानी.
क्या है विवाद की पूरी कहानी?
पूरा विवाद उत्तराखंड के हल्द्वानी से शुरू हुआ, जहां 8 अगस्त को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद, राइट विंग हिंदू संगठन श्री राम सेना ने उस मंच का गंगाजल से शुद्धिकरण और हवन किया जहां से खरगे का भाषण हुआ था. इस उम्र में इस अपमान के बारे में खरगे ने कभी सोचा नहीं था. संसद में अपना दर्द बयां किया. तब तक किसी को खबर थी, कोई बेखबर था.
उसी दिन से खरगे के अपमान की लड़ाई शुरू थी लेकिन जब राहुल गांधी ने बाकायदा 29 अगस्त की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हल्द्वानी के 'शुद्धिकरण' को "छुआछूत का दूसरा नाम" और संविधान के तहत एक बड़ा अपराध बताया तो विवाद बेकाबू हो चुका है. कांग्रेस शहर-शहर मुद्दा बनाए घूम रही है कि दलित समुदाय से आने वाले खरगे और पूरे दलित समाज के साथ छुआछूत वाला भेदभाव हुआ.
राहुल पर ही उलट पड़ गया दांव!
राहुल गांधी तो चाहते थे कि पीएम मोदी से दोषियों पर तुरंत एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर कराएं लेकिन खेल तब पलट गया जब उस धार्मिक अनुष्ठान और सफाई अभियान में शामिल अमित कुमार ने हल्द्वानी कोतवाली पहुंचकर राहुल गांधी के खिलाफ ही एफआईआर दर्ज करा दी. इस आरोप में कि राहुल गांधी ने सामान्य धार्मिक सफाई को जातिगत रंग देकर समाज में नफरत फैलाने की कोशिश की, झूठे दावों से खुद दलित समाज की भावनाएं आहत की. जो राहुल दूसरों के लिए एफआईआर मांग रहे थे, वो खुद कानूनी चक्रव्यूह में फंस चुके हैं.
मल्लिकार्जुन खरगे का संघर्ष भरा बचपन!
कर्नाटक के बीदर जिले का एक छोटा सा गांव है वरवट्टी. महज 7 साल के एक दलित बच्चे मल्लिकार्जुन ने आंखों के सामने दंगाइयों को घर में आग लगाते और मां समेत परिवार के कई सदस्यों को जलते देखा. जान बचाकर पिता के साथ भागे खरगे गुलबर्गा पहुंच गए. फिर कभी वरवट्टी नहीं लौट पाए. पिता ने मिल में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करना शुरू किया. अभावों में पले-बढ़े, मेहनत की, वकालत की पढ़ाई की और मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ते-लड़ते राजनीति में कदम रखा.
कॉलेज के बाद उन्होंने कलबुरागी के सेठ शंकरलाल लाहोटी लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री ली और कलबुरागी कोर्ट में वकालत शुरू की. वे कलबुरागी के मिल मजदूरों और वंचित तबके के मुफ्त केस लड़ते थे, जिससे उनके बचपन की कर्मभूमि कलबुरागी ही उनकी राजनीति का सबसे मजबूत लॉन्चपैड बनी. कभी संसद में अपने पास्ट और प्रेजेंट के बारे में कहा था कि मैं उस पृष्ठभूमि से आता हूं जहां लोगों के फटे जूते सिलने पड़ते थे, और आज भगवान की कृपा और मेरी मेहनत है कि मैं देश की संसद में यहां तक पहुंचा हूं.
लाइमलाइट से दूर रहा खरगे का परिवार!
1968 में मल्लिकार्जुन की शादी राधाबाई से हुई. ये वो दौर था जब खरगे वकालत की पढ़ाई पूरी कर मजदूर संगठनों के हक की लड़ाई लड़ रहे थे और राजनीति में आ रहे थे. पिछले 58 सालों के सफर में खरगे कर्नाटक और देश के टॉप नेता बने लेकिन राधाबाई को लाइमलाइट, मीडिया कवरेज छू भी नहीं पाया. खरगे और राधाबाई तीन बेटे और दो बेटियां हैं. बस एक बेटे प्रियांक कांग्रेस की राजनीति में आए लेकिन बरसों तक जूते घिसने के बाद. दूसरे बेटे राहुल खरगे IIT, USC से पढ़कर बिजनेसमैन बने. राजनीति से कोसों दूरी बनाए रखी. तीसरे बेटे मिलिंद खरगे ने डॉक्टरी का प्रोफेशन चुना.
राजनीति में एंट्री और बढ़ता कद!
खरगे की जवानी के दिनों में कांग्रेस ही कर्नाटक की सबसे प्रभावशाली पार्टी हुआ करती थी. 1960 के दशक में उन्होंने कलबुर्गी के सरकारी कॉलेज में छात्र संघ का चुनाव जीतकर राजनीति में पहला कदम रखा. 1969 में पहली बार गुलबर्गा सिटी कांग्रेस के अध्यक्ष नियुक्त किए गए. फिर बढ़ते ही गए. 1972 में पहली बार गुरमितकल सीट से विधायक बने. उसके बाद बिना हारे 1972 से लेकर 2018 तक लगातार 9 बार विधानसभा चुनाव जीतकर रिकॉर्ड बना दिया. हालांकि 2008 के परिसीमन के बाद चित्तापुर सीट से 9वीं बार रिकॉर्ड विधायक बने.
47 साल में कर्नाटक की राजनीति में कई बड़े तूफान आए, देवगौड़ा की लहर आई, येदियुरप्पा का दौर आया और देश में मोदी लहर आई, लेकिन खरगे अपनी सीट पर कभी नहीं हारे. वे जब भी चुनावी मैदान में उतरते, उनकी जीत पहले से तय मानी जाती थी. उनके इसी 'अजेय रिकॉर्ड' को सम्मान देते हुए कर्नाटक में उन्हें 'सोलिल्लादा सरदारा' यानी 'कभी न हारने वाला योद्धा' कहा जाने लगा. 50 साल की अजेय राजनीति के बाद पहला चुनाव 2019 में तब हारे जब मोदी लहर में लोकसभा चुनाव लड़े.
मुख्यमंत्री पद के दावेदर लेकिन नहीं मिला पद!
मल्लिकार्जुन खरगे का राजनीतिक कद जितना बड़ा है, उनका दर्द भी उतना ही गहरा है. कर्नाटक की राजनीति में एक नहीं, बल्कि तीन बार- 1999, 2004 और 2013 में मुख्यमंत्री पद की रेस में सबसे आगे थे. 1999 की कसक उन्हें आज भी सबसे ज्यादा खलती है. उस वक्त उन्होंने विपक्ष के नेता के तौर पर पांच साल खून-पसीना बहाकर कांग्रेस की सत्ता में वापसी कराई थी, लेकिन ऐन वक्त पर हाईकमान ने महज चार महीने पहले पार्टी में आए एस. एम. कृष्णा को मुख्यमंत्री बना दिया.
2004 में जेडीएस के साथ कांग्रेस की अलायंस सरकार बनी. खरगे एक बार फिर मुख्यमंत्री के सबसे स्वाभाविक दावेदार थे. तब एच. डी. देवेगौड़ा ने शर्त रख दी कि खरगे बहुत मजबूत नेता हैं, इसलिए वो किसी और को सीएम चाहते हैं. गठबंधन बचाने के लिए कांग्रेस ने खरगे के ही सबसे करीबी राजपूत समाज के धरम सिंह को सीएम बना दिया. खरगे ने पार्टी हित में बगावत नहीं की और धरम सिंह कैबिनेट में नंबर-2 (गृह मंत्री) बनकर काम किया.
खरगे दर्द को छिपाते नहीं कैसे बार-बार सीएम बनने से चूके. हालांकि उन्होंने कभी उफ नहीं की, बगावत नहीं की. ऐसे नेता बने जो कांग्रेस के पांच-पांच सीएम गुंडू राव, वीरेंद्र पाटिल, एस. बांगरप्पा, एम. वीरप्पा मोइली और धरम सिंह की सरकारों में मंत्री बने. उनके सामने जेडीएस से कांग्रेस में आए सिद्धारमैया दो-दो बार और उनके सामने राजनीति शुरू करने वाले डीके शिवकुमार भी सीएम बन गए.
खरगे के सीएम नहीं बनने के पीछे की वजह
ये माना जाता रहा कि कर्नाटक की जातिगत राजनीति के चलते ही खरगे बार-बार चूके. कर्नाटक की राजनीति पर बरसों से लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों का वर्चस्व रहा. दलितों की आबादी 18%+, लिंगायत 11% और वोक्कालिगा 10% से कहीं ज्यादा है. इसके बावजूद मल्लिकार्जुन खरगे तीन बार मुख्यमंत्री बनने से इसलिए चूक गए क्योंकि पावर सेंटर लिंगायत और वोक्कालिगा के हाथों में रहा. पार्टियों ने दो प्रभुत्वशाली जातियों को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाया. जब भी खरगे का नाम सीएम पद के लिए आगे बढ़ा, तब लिंगायत या वोक्कालिगा गुटों ने बगावत या वोट खिसकने का डर दिखाकर अपने नेताओं वोक्कालिगा एस.एम. कृष्णा या ओबीसी सिद्धारमैया को आगे करवा दिया.
खरगे के कांग्रेस अध्यक्ष बनने की वो कहानी
मल्लिकार्जुन खरगे पैराशूट से कर्नाटक से दिल्ली लैंड करके अध्यक्ष नहीं बने. बरसों-बरस तक गांधी परिवार, कांग्रेस के लिए वफादारी कर्नाटक से दिल्ली लाई. इंदिरा गांधी के जमाने के नेता खरगे राजीव गांधी के लिए उतने ही निष्ठावान रहे. 2009 में Quiet Loyalty ने सोनिया गांधी का ध्यान खींचा. सोनिया गांधी ने दिल्ली की राजनीति में एंट्री कराई.
2009 में पहली बार गुलबर्गा सीट से लोकसभा सांसद चुने गए और मनमोहन सिंह की यूपीए-2 सरकार में श्रम और रोजगार, बाद में रेल मंत्री बनाए गए. 2022 में जब गांधी परिवार ने ठान लिया कि आगे कोई गांधी कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनेगा तब ऐसे वफादार की तलाश खरगे पर खत्म हुई जिन पर कभी कोई दाग नहीं लगा. जिस दलित होने से बार-बार सीएम बनने से चूके उसी दलित फैक्टर और वफादारी से खरगे कांग्रेस अध्यक्ष बन गए. इस पोजिशन में आकर आज सीधे पीएम मोदी से डील और हैंडल करते हैं खरगे.
हल्द्वानी कांड और राहुल का स्टैंड!
हल्द्वानी में मल्लिकार्जुन खरगे के विवाद पर राहुल गांधी का गुस्सा सिर्फ बीजेपी को घेरने की कोई राजनीति नहीं. पिछले कुछ सालों में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के बीच एक ऐसी पर्सनल केमिस्ट्री दिखी जो राजनीतिक नफे-नुकसान से परे है. राहुल गांधी सार्वजनिक मंचों से लेकर निजी मुलाकातों तक खरगे जी को सिर्फ कांग्रेस अध्यक्ष नहीं, बल्कि पिता समान दर्जा देकर रखा. जूते ठीक करने से लेकर पानी पिलाने तक-राहुल ने अक्सर अपने खरगे जी का हाथ थामे रखा. उनकी बातें ध्यान से सुनी और उनके अनुभव का सम्मान किया. हल्द्वानी कांड राहुल के लिए बर्दाश्त के काबिल नहीं था. उनके लिए ये पार्टी के अध्यक्ष के साथ-साथ परिवार के सबसे बुजुर्ग सदस्य के आत्मसम्मान पर चोट थी, और इसी निजी जुड़ाव ने राहुल के गुस्से को नेशन वाइड आंदोलन बना रही है. जितना ये मुद्दा बढ़ेगा, बीजेपी को अशांत करेगा.
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 'खरगे का दलित अपमान' विपक्ष के हाथ लगा वो ब्रह्मास्त्र है, जो ठीक वैसा ही असर दिखाएगा जैसा 2024 के लोकसभा चुनाव में दिखा? 2024 में राहुल गांधी ने लीड लेकर पिछड़ों और दलितों को एकजुट कर बीजेपी के 400 पार के नारे को रोक दिया था. अब इस शुद्धिकरण विवाद को ढाल बनाकर राहुल गांधी की कांग्रेस एक बार फिर देश के बड़े दलित वोट बैंक को बीजेपी के खिलाफ इमोशनली चार्ज करके अपने पाल में खींचने की कोशिश है.
यहां देखें वीडियो
राहुल गांधी पर हल्द्वानी में दर्ज हुई FIR, जानिए क्या-क्या लगाए गए हैं आरोप!
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