संसद में घेरने के लिए खड़गे लाए Rule 267 का 'ब्रह्मास्त्र', इससे क्यों बचती दिख रही सरकार ?

रूपक प्रियदर्शी

• 01:45 PM • 28 Jul 2026

संसद में NEET पेपर लीक पर घमासान! जानिए क्या है राज्यसभा का नियम 267, जिसके तहत चर्चा पर अड़े मल्लिकार्जुन खड़गे. इससे क्यों बच रही केंद्र सरकार ?

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विपक्ष नियम 267 के तहत राज्यसभा में पेपर लीक मुद्दे पर चर्चा के लिए क्यों अड़ा ?
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दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट (NEET) पेपर लीक को लेकर चल रहा छात्रों का बड़ा धरना और प्रोटेस्ट भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन छात्रों के गुस्से की यह चिंगारी अब देश की संसद में पहुंच चुकी है. सड़कों पर आंदोलन थमा है, तो संसद में नियमों की किताब को लेकर सरकार और कांग्रेस के बीच 'महाभारत' छिड़ गई है. कांग्रेस और पूरा विपक्ष NEET-UG पेपर लीक विवाद को लेकर राज्यसभा के नियम 267 के तहत ही चर्चा कराने की जिद पर अड़ा है. 

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सरकार कहती है कि वो नियम 176 के तहत ढाई घंटे की शॉर्ट-ड्यूरेशन चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन कांग्रेस इस पर राजी नहीं है. असल में इसके पीछे कांग्रेस की एक बहुत बड़ी संसदीय और राजनीतिक चाल है. कांग्रेस चाहती है कि सरकार को सिर्फ घेरा न जाए, बल्कि उसे पूरी तरह बैकफुट पर धकेला जाए.

क्या है नियम 267 ?

सीधे शब्दों में कहें तो, नियम 267 लागू होने का मतलब है कि देश में इस मुद्दे से बड़ा उस दिन कोई दूसरा सरकारी काम नहीं है. कांग्रेस की इस रणनीति के पीछे तीन बड़ी वजह हैं. 

  1. पहली वजह है 'वक्त की ताकत' :  नियम 176 में चर्चा की सीमा सिर्फ ढाई घंटे होती है, जबकि नियम 267 लागू होने का मतलब है कि पूरे दिन का सारा सरकारी कामकाज ठप हो जाएगा और सिर्फ पेपर लीक पर बहस होगी.
  2. दूसरी वजह है 'प्रधानमंत्री और मंत्रियों की सीधी जवाबदेही : नियम 267 के तहत चर्चा के बाद खुद संबंधित मंत्री या प्रधानमंत्री को सदन में खड़े होकर ऑन-रिकॉर्ड जवाब देना पड़ता है, जिससे कांग्रेस सरकार को कटघरे में खड़ा करना चाहती है.
  3. तीसरी सबसे बड़ी वजह छात्रों को सीधा संदेश : दरअसल कांग्रेस चाहती है कि देश के 24 लाख छात्रों को यह संदेश जाए कि उनके भविष्य से बड़ा देश में कोई दूसरा सरकारी काम नहीं है. 

तब से लेकर आज तक, यानी पिछले 10 सालों में, किसी भी सभापति ने विपक्ष के सैकड़ों नोटिसों के बावजूद इस नियम को हरी झंडी नहीं दिखाई है. चूंकि राज्यसभा में 'काम रोको प्रस्ताव' (Adjournment Motion) का कोई दूसरा विकल्प नहीं होता, इसलिए विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का यह इकलौता और सबसे धारदार हथियार है. पिछले कुछ सालों में कांग्रेस ने पूरा जोर लगा दिया कि मणिपुर हिंसा, एसआईआर, अदाणी पर चर्चा इसके तहत हो पर सरकार नहीं मानी. चेयरमैन ऐसी सारी याचिकाएं खारिज करते रहे. 

नियम 267 की मांग पर सरकार का क्या है तर्क ?

सरकार का रुख रहा है कि पेपर लीक जैसे मुद्दों के लिए जब नियम 176 मौजूद है, तो पूरे सदन का कामकाज ठप करने की जरूरत नहीं है. लेकिन कांग्रेस जानती है कि नियम 267 के जरिए जो हेडलाइंस और राजनीतिक माइलेज मिलेगा, वो किसी अन्य नियम से मुमकिन नहीं है. सरकार जहां सख्त एंटी-पेपर लीक कानून का हवाला देकर अपनी पीठ थपथपा रही है, वहीं विपक्ष इसे 'सिस्टेमिक फेलियर' बताकर संसद से सड़क तक संग्राम पर आमादा है.  

किसके पास होती है  267 को लागू करने की चाबी ? 

नियम 267 को लागू करने की पूरी चाबी राज्यसभा के सभापति यानी उपराष्ट्रपति के पास होती है. बिना उनकी लिखित अनुमति और सहमति के इस नियम के तहत एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता. सभापति अक्सर इन नोटिसों को यह कहकर खारिज कर देते हैं कि इसके लिए नियम 176 (अल्पकालिक चर्चा) जैसे नियम हैं, जिसमें सदन की कार्यवाही को पूरी तरह रोकना नहीं पड़ता, लेकिन विपक्ष का तर्क है कि पेपर लीक जैसे गंभीर मामलों पर छोटी चर्चा काफी नहीं है. यही वजह है कि ट्रेजरी बेंच सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच नियम 267 को लेकर रार हो रही है. 

कब-कब मिली इस नियम को मंजूरी ?

1952 में जब राज्यसभा की नियमावली बनी, तब इस प्रावधान को जोड़ा गया था, ताकि देश के सामने अचानक आए किसी महासंकट पर तुरंत बात हो सके, लेकिन इतिहास गवाह है कि यह नियम हमेशा से बेहद दुर्लभ रहा है. पिछले 36 सालों में 1990 से लेकर अब तक केवल 11 बार ही नियम 267 के तहत चर्चा को मंजूरी मिली है. आखिरी बार नवंबर 2016 में तत्कालीन सभापति हामिद अंसारी के समय नोटबंदी (Demonetisation) पर बहस के लिए इसे मंजूरी दी गई थी.  

अप्रैल 2015 में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि के कारण कृषि संकट और किसानों की आत्महत्या के गंभीर मुद्दे पर चर्चा के लिए तत्कालीन सभापति ने नियम 267 को मंजूरी दी थी. अगस्त 2013 में 267 के तहत चर्चा हुई जब दिल्ली में हुए निर्भया कांड के बाद देश भर में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों और उनकी सुरक्षा की स्थिति पर बेहद गंभीर बहस इस नियम के तहत कराई गई थी. अगस्त 2012 विदेशों में काला धन के सवाल पर बहस हुई. विपक्ष के भारी हंगामे के बाद विदेशी बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन को वापस लाने के मुद्दे पर चर्चा के लिए संसद का नियमित कार्य सस्पेंड किया गया था. दिसंबर 2004 में तत्कालीन सभापति भैरों सिंह शेखावत के समय में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और खाद्य तेल आयात में कथित अनियमितताओं को लेकर नियम 267 के तहत विस्तृत बहस हुई थी. 1990-1991 में खाड़ी युद्ध (Gulf War) के समय उत्पन्न वैश्विक संकट और खाड़ी देशों में फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा व कच्चे तेल की आपूर्ति के आपातकालीन मुद्दे पर चर्चा के लिए इसका उपयोग किया गया था.

विपक्ष ने लोकसभा में भी चला नियम 56 का दांव

संसद के इस संग्राम में कहानी सिर्फ राज्यसभा के नियम 267 तक ही सीमित नहीं है, बल्कि लोकसभा में भी विपक्ष ने सरकार की घेराबंदी के लिए नियम 56 का सबसे बड़ा दांव चल दिया है. लोकसभा की नियम पुस्तिका का नियम 56, जिसे 'स्थगन प्रस्ताव' (Adjournment Motion) कहा जाता है, राज्यसभा के नियम से भी कहीं ज्यादा तीखा और आक्रामक संसदीय हथियार है. वजह साफ है- नियम 267 में मुख्य रूप से चर्चा और सरकार का जवाब होता है, लेकिन नियम 56 के तहत चर्चा खत्म होने के बाद सदन में अनिवार्य रूप से वोटिंग यानी मतविभाजन कराना पड़ता है. 

चूंकि मौजूदा सरकार सीधे लोकसभा के प्रति जवाबदेह है, इसलिए इस नियम के तहत होने वाली वोटिंग में सरकार के खिलाफ 'निंदा का तत्व' (Element of Censure) छिपा होता है. यही कारण है कि विपक्ष संसद के दोनों सदनों में सरकार को केवल घेरना नहीं, बल्कि नंबर गेम की अग्निपरीक्षा में भी खींचना चाहता है और नियमों की इस रार से संसद का तापमान चरम पर पहुंच चुका है. 

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