राज्यसभा चुनावों में बीजेपी ने कांग्रेस को बार-बार चोट दी. पहले मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द हो गया. फिर झारखंड में कांग्रेस के प्रणव झा बीजेपी समर्थित परिमल नाथवानी से हार गई. जब देश में राज्यसभा चुनाव हो रहे थे तब कर्नाटक में विधान परिषद की सात सीटों पर हुए भी चुनाव हुए. कांग्रेस को चार सीटों पर ही जीतना था. 2 सीटें बीजेपी को मिलनी थी. एक सीट जेडीएस को मिलने का चांस था लेकिन नए-नए सीएम बने डीके शिवकुमार ने ऐसा जादू चलाया कि उनके लिए बीजेपी जैसी पार्टी के विधायक टूट गए. कांग्रेस को चार नहीं पांच सीटों पर जीत मिल गई. राज्यसभा चुनावों का सारा हिसाब किताब डीके ने कर्नाटक में चुका दिया.
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सीएम की कुर्सी संभालते ही चला डीके का जादू!
सीएम की कमान संभालते ही डीके शिवकुमार ने अपने पहले चुनावी इम्तिहान में बीजेपी-जेडीएस को हिला दिया. कर्नाटक MLC चुनाव में वो खेल हो गया है, जिसकी कल्पना बीजेपी और जेडीएस ने सपने में भी नहीं की थी. जब नतीजों का पिटारा खुला, तो हर कोई दंग रह गया. कांग्रेस ने न सिर्फ अपने कोटे की सीटें जीतीं, बल्कि बीजेपी-जेडीएस के जबड़े से पांचवीं सीट भी छीन ली, जिससे जेडीएस उम्मीदवार को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी. जादू कुछ ऐसा हुआ कि जीत के लिए हर उम्मीदवार को 28 वोटों की जरूरत थी. कांग्रेस के पास अपने 135 विधायक थे. नतीजे आए तो कांग्रेस उम्मीदवारों को कुल 151 वोट मिल गए. यानी बीजेपी-जेडीएस गठबंधन के करीब 11 से 16 विधायकों ने पाला बदलकर कांग्रेस के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग कर दी.
विपक्ष अपने विधायकों को रिसॉर्ट में छिपाता रह गया, लेकिन डीके की 'गुप्त रणनीति' ने बंद कमरों के भीतर ही गेम ओवर कर दिया. कांग्रेस के पांचवें उम्मीदवार विनय कार्तिक के पास जीत के लिए नंबर नहीं थे, लेकिन डीके के चुनावी मैनेजमेंट की बदौलत उन्हें सबसे ज्यादा 32 वोट मिले और उन्होंने विपक्ष को चारों खाने चित कर दिया. कांग्रेस के इस मास्टरस्ट्रोक को देश की राजनीति में बीजेपी के खिलाफ 'रिवर्स ऑपरेशन लोटस' कहा जा रहा है.
डीके को क्यों कहा जाता है 'अल्टीमेट क्राइसिस मैनेजर'?
डीके शिवकुमार को भारतीय राजनीति का 'ओरिजिनल रिसॉर्ट मास्टरमाइंड' और कांग्रेस का सबसे बड़ा 'क्राइसिस मैनेजर' यानी संकटमोचक यूं ही नहीं कहा जाता है. पिछले MLC चुनाव 2024 में भी बीजेपी विधायकों एसटी सोमशेखर और शिवराम हेब्बार की क्रॉस वोटिंग से जेडीएस उम्मीदवार हार गए और कांग्रेस ने शान से अपनी तीनों सीटें जीत लीं. बीजेपी के यही दोनों विधायक इस बार 2026 के MLC चुनाव में भी वोटिंग के दिन डीके शिवकुमार के साथ सोफे पर फोटो खिंचवाते दिखे.
डीके शिवकुमार ने बीते दो दशकों में अहमद पटेल की ऐतिहासिक राज्यसभा सीट (2017) से लेकर महाराष्ट्र की विलासराव देशमुख सरकार (2002) को बचाने तक, ऐसे कुल 4 बड़े और हाई-प्रोफाइल चुनावों का रुख अपनी जादुई जोड़तोड़ और 'रिसॉर्ट पॉलिटिक्स' के दम पर कांग्रेस के पक्ष में मोड़ा है. साल 2017 में जब गुजरात के दिग्गज नेता अहमद पटेल की सीट पर बीजेपी ने तगड़ी घेराबंदी की थी, तब डीके शिवकुमार ने ही 44 गुजराती विधायकों को बेंगलुरु के ईगलटन रिसॉर्ट में सुरक्षित रखकर और भारी आईटी छापों के दबाव को झेलकर पटेल को ऐतिहासिक जीत दिलाई थी.
इससे पहले साल 2002 में उन्होंने महाराष्ट्र के कांग्रेसी विधायकों की ऐसी ही किलेबंदी कर विलासराव देशमुख सरकार को गिरने से बचाया था, जबकि साल 2018 में उनकी सख्त बाड़ेबंदी के कारण ही बीएस येदियुरप्पा कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत नहीं जुटा पाए और उन्हें महज 55 घंटे में इस्तीफा देना पड़ा था. चुनावी मैनेजमेंट के इसी बेजोड़ रिकॉर्ड और 1989 से लगातार 8 बार खुद अजेय रहने के करिश्मे की बदौलत ही उन्हें भारतीय राजनीति का 'अल्टीमेट क्राइसिस मैनेजर' कहा जाता है.
कैसे हुआ खेल?
वोट देने वाले विधानसभा सदस्य थे. गुप्त मतदान(Secret Ballot) से वोटिंग हुई. राज्यसभा चुनाव की तरह विधान परिषद चुनावों में वोट डालने वाले विधायकों को अपनी पार्टी के एजेंट को वोट दिखाना अनिवार्य नहीं होता. डीके शिवकुमार इस नियम को अच्छी तरह जानते थे और ये बात बीजेपी-जेडीएस विधायकों को भी पता थी. उन्होंने इसी कानूनी ढाल का इस्तेमाल किया, जिससे बीजेपी और जेडीएस के बागी विधायकों को बिना किसी तात्कालिक डर के कांग्रेस के पक्ष में वोट करने का सुरक्षित मौका मिल गया.
चूंकि यह गुप्त मतदान था, इसलिए पार्टियां यह तुरंत तय नहीं कर सकती थीं कि किस विधायक ने किसे वोट दिया है. ऐसे चुनावों में क्रॉस-वोटिंग करने पर दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत तत्काल अयोग्य ठहराना बेहद जटिल हो जाता है. इसी कानूनी छूट का फायदा उठाकर विरोधी खेमे के विधायकों ने अपनी ही पार्टी के व्हिप की परवाह नहीं की.
वोटिंग के दौरान एक तस्वीर ने मचाई थी हलचल
कर्नाटक MLC चुनाव की वोटिंग के दिन विधानसभा परिसर से आई एक वायरल तस्वीर ने सनसनी मचा दी, जिसमें बीजेपी के दो कद्दावर विधायक एसटी सोमशेखर और शिवराम हेब्बार खुलेआम मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के साथ मुस्कुराते हुए पोज दे रहे थे. वोटिंग जारी रहने के दौरान सामने आई इस फोटो ने उसी वक्त साफ कर दिया था कि विपक्षी खेमे में बहुत बड़ा 'खेला' हो चुका है.
सोमशेखर और हेब्बार काफी समय से अपनी ही पार्टी बीजेपी नाराज चल रहे थे. एसटी सोमशेखर ने इससे पहले राज्यसभा चुनाव में भी बीजेपी के खिलाफ जाकर कांग्रेस के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग की थी. लेकिन खेल केवल दो ने नहीं, कुल 16 विधायकों ने किया जिससे कांग्रेस को एक्स्ट्रा सीट मिल गई. कर्नाटक विधानसभा की कुल 224 सीटों में से बीजेपी के पास 63 विधायक (MLAs) हैं.
JDS को हुआ नुकसान, कांग्रेस में खुशी का माहौल
जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी को सीधी राजनीतिक चुनौती देने के लिए डीके शिवकुमार ने उनके ही विधायकों को टारगेट किया. जेडीएस के पास अपने 18 विधायक थे, और बीजेपी के सहयोग से उनके उम्मीदवार गोविंदराजू की जीत तय मानी जा रही थी. लेकिन अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, जेडीएस के ही करीब 4 विधायकों और बीजेपी के विधायकों ने पाला बदल लिया, जिससे जेडीएस के उम्मीदवार को सिर्फ 14 वोट मिले और वे रेस से बाहर हो गए.
इस ऐतिहासिक जीत के बाद जहां कांग्रेस खेमे में जश्न का माहौल है, वहीं बीजेपी और जेडीएस के भीतर हड़कंप मच गया है. विपक्ष के नेता आर. अशोक और प्रदेश अध्यक्ष विजयेंद्र अब उन 'विभीषणों' की तलाश में जुट गए हैं जिन्होंने अपनी ही पार्टी की लुटिया डुबो दी. डीके शिवकुमार ने इस बड़ी जीत को अपनी सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और पांच गारंटियों पर विधायकों का भरोसा बताया है. इस चुनावी नतीजे ने यह साबित कर दिया है कि कर्नाटक की कमान अब एक ऐसे 'क्राइसिस मैनेजर' के हाथ में है, जिससे पार पाना दिल्ली के बड़े-बड़े रणनीतिकारों के लिए भी आसान नहीं होने वाला है.
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