1 जुलाई की तारीख नजदीक आ रही हैं. यह वहीं तारीख है, जब देश की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना 'मनरेगा' इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी और उसकी जगह लेगा मोदी सरकार का नया कानून 'VB-G RAM G'. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान और आंध्र प्रदेश के डिप्टी सीएम पवन कल्याण के बीच दिल्ली में हुई बैठक में तय हुआ है कि 1 जुलाई 2026 को पूरे देश में 'VB-G RAM G' कानून की आधिकारिक शुरुआत आंध्र प्रदेश की धरती से ही होगी.
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लेकिन इस नए कानून के लागू होने से ठीक पहले, तेलंगाना सीएम रेवंत रेड्डी ने केंद्र सरकार के खिलाफ खुली जंग का ऐलान कर दिया है. रेवंत रेड्डी एक जुलाई से पहले VB-G RAM G के खिलाफ लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट लेकर जा रहे हैं. 1 जुलाई को कानून लागू होने में महज कुछ ही दिन बचे हैं और रेवंत रेड्डी ने 'मिशन सुप्रीम कोर्ट' (SC Route) को एक्टिव कर दिया है.
संसद में पास हो चुका है 'VB-G RAM G' कानून
यह कहानी सिर्फ एक सरकारी योजना की नहीं, बल्कि कांग्रेस के सबसे बड़े राजनैतिक गौरव की है. साल 2006 में तत्कालीन यूपीए (UPA) अध्यक्ष सोनिया गांधी की और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) के दबाव के बाद ही 'मनरेगा' का जन्म हुआ था. आंध्र के बांदापल्ली गांव से इस ऐतिहासिक योजना की शुरुआत की थी. यह सोनिया गांधी का 'ड्रीम प्रोजेक्ट' था, जिसने देश के करोड़ों गरीबों को 'राइट टू वर्क' यानी काम का कानूनी अधिकार दिया था.
जब मोदी सरकार ने योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाकर इसे 'विकसित भारत (VB)' का नाम दिया तब भी कांग्रेस ने बहुत विरोध किया लेकिन कुछ बदला नहीं. विपक्ष की आवाज संसद में एनडीए की बहुमत के जोर के आगे दम तोड़ गई. सरकार के पास बहुमत था इसलिए मनरेगा कानून बदलकर VB-G RAM G हो गया. उसी के साथ ढेर सारे नियम भी बदल गए.
रेवंत रेड्डी बना रहें एंटी-BJP फ्रंट!
मोदी सरकार के 'VB-G RAM G' एक्ट के खिलाफ रेवंत रेड्डी अब दक्षिण भारत में विपक्ष के सबसे बड़े सेनापति बनकर उभरे हैं. उन्होंने दिल्ली के इस फैसले को चुनौती देने के लिए एक अभेद्य चक्रव्यूह तैयार किया है. जनवरी 2026 के पहले ही हफ्ते में, रेवंत रेड्डी ने तेलंगाना विधानसभा में राजनैतिक गर्मी बढ़ा दी. उन्होंने इस नए कानून के खिलाफ प्रस्ताव पेश सर्वसम्मति से पास करा दिया.
लेकिन रेड्डी यहीं नहीं रुके. रेवंत रेड्डी की सरकार ने सिंचाई मंत्री एन. उत्तम कुमार रेड्डी की अध्यक्षता में कैबिनेट सब-कमेटी बनाई जो कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही है. रेवंत रेड्डी लीड लेते हुए कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, झारखंड और पंजाब की गैर-बीजेपी सरकारों का एक 'फ्रंट' बना रहे हैं, जो सुप्रीम कोर्ट में केंद्र के इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देगा.
क्यों है इस कानून को लेकर दक्षिण में नाराजगी?
रेवंत रेड्डी के इस रूप को देखते हुए सवाल उठने लगा है कि, आखिर इस नए कानून में ऐसा क्या है जिसने दक्षिण भारत की सरकारों की रातों की नींद उड़ा दी है? तो दक्षिण के राज्यों की नाराजगी के 3 बड़े कारण हैं:
पुराने मनरेगा में मजदूरी का 100% पैसा केंद्र देता था. नए नियम में 40% पैसा राज्य सरकारों की जेब से जाएगा, लेकिन योजना का नाम बदलकर 'विकसित भारत (VB)' कर दिया गया है और 'महान नेता महात्मा गांधी' का नाम हटा दिया गया है. इसपर रेवंत रेड्डी का कहना है कि पैसा राज्य दें और ब्रांडिंग केंद्र सरकार अपनी करें, ये Cooperative Federalism यानी सहकारी संघवाद के खिलाफ है.
तेलंगाना में मनरेगा के तहत काम करने वालों में 62% महिलाएं और 90% दलित, आदिवासी व पिछड़े (SC/ST/BC) वर्ग के लोग हैं. नए कानून में कृषि सीजन के दौरान काम पर 60 दिनों का जो 'अनिवार्य ब्रेक' (Holiday) लगाया गया है, उससे इन गरीब महिलाओं के चूल्हे बुझने की नौबत आ जाएगी. रेवंत रेड्डी की कैबिनेट सब-कमेटी का कहना है कि इस 60 दिनों के सन्नाटे में इन गरीब महिलाओं के घरों में चूल्हा कैसे जलेगा, इसका जवाब केंद्र के पास नहीं है.
दावा है कि दक्षिण की बेहतर कार्यप्रणाली की सजा मिल रही है. दक्षिण भारत के राज्य (जैसे तमिलनाडु, आंध्र और तेलंगाना) मनरेगा फंड का इस्तेमाल करने और जमीन सुधारने (Land Development) के काम में देश में सबसे आगे रहे हैं. केंद्र सरकार ने नए नियमों में जमीन सुधार जैसे कामों को सूची से हटा दिया है, जिससे छोटे और सीमांत किसानों को भारी नुकसान होगा.
60:40 के रेशियो से बढ़ेगा आर्थिक दबाव!
पुराने मनरेगा कानून में मजदूरों की 100 फीसदी मजदूरी का खर्च सीधे केंद्र सरकार अपनी जेब से देती थी. लेकिन नए 'VB-G RAM G' कानून में केंद्र ने एक नया फॉर्मूला थोप दिया है- 60:40 का रेशियो! यानी अब 40 फीसदी पैसा राज्य सरकारों को अपने खजाने से देना होगा. जून 2026 के अंतरिम बजट आवंटन को देखें, तो अकेले आंध्र प्रदेश पर 7,707 करोड़ रुपए और तमिलनाडु पर 7,585 करोड़ रुपए का भारी भरकम बोझ पड़ने वाला है. तेलंगाना को भी अपने खजाने से 3,500 करोड़ रुपए से ज्यादा झोंकने होंगे. रेवंत रेड्डी का सबसे बड़ा सवाल यही है- 'जब 40 फीसदी पैसा राज्यों का लगेगा, तो योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाकर 'विकसित भारत' के नाम पर केंद्र अपनी ब्रांडिंग क्यों कर रहा है?'
दक्षिण भारत के राज्यों, विशेषकर तेलंगाना में मनरेगा के तहत काम करने वालों में 62 फीसदी आबादी महिलाओं की है, जिनमें से 90 फीसदी दलित, आदिवासी और पिछड़े (SC/ST/BC) परिवारों से आती हैं. नए कानून में एक बेहद विवादित नियम जोड़ा गया है- कृषि सीजन (बुवाई और कटाई) के दौरान योजना पर 60 दिनों का 'अनिवार्य ब्रेक' या हॉलिडे रहेगा ताकि किसानों को मजदूर मिल सकें.
रेवंत रेड्डी इस लड़ाई को Centre vs South और कॉर्पोरेट वर्सेज गरीब की लड़ाई के रूप में पेश कर रहे हैं. उनका मानना है कि अगर दक्षिण के सभी राज्य एकजुट हो गए, तो मोदी सरकार को इस 60:40 के फॉर्मूले और महात्मा गांधी का नाम हटाने के फैसले पर पीछे हटने के लिए मजबूर होना ही पड़ेगा. लेकिन पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश ही फ्रंट का हिस्सा नहीं.
केंद्र के समर्थन में आंध्र प्रदेश सरकार
आंध्र प्रदेश की एन.डी.ए. (NDA) सरकार का स्टैंड तेलंगाना से बिल्कुल अलग और केंद्र के समर्थन में है. मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश इस नए कानून का न सिर्फ स्वागत कर रहा है, बल्कि 1 जुलाई 2026 को होने वाले इसके नेशनल लॉन्च (National Launch) की मेजबानी भी आंध्र प्रदेश ही करने जा रहा है.
तेलंगाना की तरह आंध्र प्रदेश पर भी 60:40 के नए वित्तीय फॉर्मूले से वित्तीय बोझ पड़ने वाला है. केंद्र सरकार ने नए वित्तीय वर्ष के लिए आंध्र प्रदेश को 7,700 करोड़ रुपए से अधिक का भारी-भरकम बजट अलॉट किया है. आंध्र सरकार की विशेष मांग पर केंद्र ने राज्य के ग्रामीण इलाकों में कॉफी बागान (Coffee Plantation) के कामों को भी VB-G RAM G योजना के तहत शामिल कर लिया है. इससे राज्य के आदिवासी और पहाड़ी क्षेत्रों में कमाई के नए साधन खुलेंगे, जिसके कारण राज्य सरकार इस कानून को लेकर काफी उत्साहित है.
तेलंगाना की मिट्टी से हुई थी मनरेगा की शुरुआत!
कहानी सिर्फ एक कानून के बदलने की नहीं है, यह कहानी है उस मिट्टी की भावना की, जहां से भारत के गरीबों की इस 'लाइफलाइन' का जन्म हुआ था. साल 2006 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने मनरेगा की शुरुआत की थी, तब उन्होंने तेलंगाना के अनंतपुर और महबूबनगर के बांदापल्ली गांव को ही चुना था. यह वही इलाका था जो कभी भीषण सूखे और भूख से तड़पते मजदूरों के पलायन के लिए रोता था. मनरेगा ने यहां के लोगों के हाथों को काम दिया, उनके आत्मसम्मान को जिंदा किया.
तो क्या 1 जुलाई को देश में एक नया कानून लागू हो पाएगा? या फिर सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद केंद्र सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़ेंगे? रेवंत रेड्डी ने इस लड़ाई को अब 'दिल्ली बनाम दक्षिण' और 'कॉर्पोरेट बनाम गरीब' की आर-पार की जंग बना दिया है. देखना दिलचस्प होगा कि देश की सबसे बड़ी अदालत से इस महासंग्राम पर क्या फैसला आता है.
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