कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी भूचाल आ गया है. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता सिद्धारमैया ने घोषणा की है कि वह साल 2028 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे. करीब 80 वर्ष की उम्र पार कर चुके सिद्धारमैया ने मांड्या में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर अपनी बात रखते हुए कहा कि आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह से धनबल और भ्रष्टाचार के आगे घुटने टेक चुकी है. उन्होंने भारी मन से कहा कि एक दौर था जब जनता अपने पसंदीदा उम्मीदवार को चुनाव लड़ाने के लिए चंदा दिया करती थी, लेकिन आज स्थिति यह है कि वोट खरीदने के लिए नोटों की गड्डियां बांटनी पड़ती हैं. इसी प्रदूषित और भ्रष्ट होती राजनीति से दुखी होकर उन्होंने चुनावी मैदान से दूरी बनाने का फैसला लिया है.
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संन्यास का ऐलान या पुराना सियासी यू-टर्न?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सिद्धारमैया के इस बयान को पूरी तरह अंतिम फैसला मान लेना जल्दबाजी होगी, क्योंकि भावुक कार्ड खेलने और फिर यू-टर्न लेने का उनका पुराना इतिहास रहा है. साल 2013 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी सिद्धारमैया ने इसे अपना आखिरी चुनाव बताया था, लेकिन नतीजों के बाद वे पूरे 5 साल मुख्यमंत्री रहे.
इसके बाद 2018 के चुनाव में भी उन्होंने दोबारा आखिरी चुनाव का राग अलापा, लेकिन 2023 आते-आते वे न केवल अपनी पारंपरिक वरुणा सीट से मैदान में उतरे बल्कि कांग्रेस की जीत के बाद दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए. ऐसे में राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह बयान अपनी वरुणा सीट के समर्थकों के दबाव को संतुलित करने और राजनीति के नैतिक धरातल पर खुद को सबसे ऊपर स्थापित करने की एक सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है.
डीके शिवकुमार गुट को काउंटर करने की कोशिश!
सिद्धारमैया के इस ऐलान की टाइमिंग बेहद अहम मानी जा रही है. गौरतलब है कि मई के महीने में कांग्रेस हाईकमान के ढाई-ढाई साल के पावर शेयरिंग फार्मूले के तहत सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था और सत्ता की कमान डीके शिवकुमार के हाथों में सौंप दी गई थी. मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद हाईकमान ने उन्हें दिल्ली बुलाकर एआईसीसी (AICC) में बड़ी जिम्मेदारी देने या राज्यसभा भेजने का प्रस्ताव दिया था, जिसे सिद्धारमैया ने साफ ठुकरा दिया. ऐसे में डीके शिवकुमार गुट के बढ़ते वर्चस्व के बीच खुद को प्रादेशिक राजनीति में 'किंगमेकर' के रूप में बनाए रखने के लिए सिद्धारमैया ने यह इमोशनल कार्ड खेला है.
डीके शिवकुमार के लिए दोधारी तलवार साबित होगा यह फैसला
सिद्धारमैया का चुनावी मैदान से हटना कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के लिए एक दोधारी तलवार की तरह है. एक तरफ जहां सिद्धारमैया के हटने से डीके शिवकुमार निर्विवाद रूप से राज्य में कांग्रेस के सबसे बड़े और इकलौते नेता बन जाएंगे, वहीं दूसरी तरफ 2028 का चुनाव जीतना उनके लिए एक बड़ी अग्निपरीक्षा बन जाएगा.
सिद्धारमैया ने अल्पसंख्यकों, पिछड़ों और दलितों को मिलाकर 'अहिंदा' नाम का जो अभेद्य वोट बैंक तैयार किया है, उसकी काट डीके शिवकुमार के पास नहीं है, क्योंकि डीके मुख्य रूप से वोक्कालिगा समुदाय के नेता माने जाते हैं. सिद्धारमैया के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए डीके शिवकुमार ने बेहद नपा-तुला रुख अपनाया और कहा कि सिद्धारमैया हमारे मार्गदर्शक हैं और पार्टी उनके अनुभवों का सम्मान करती है.
भैंस चराने से लेकर 17 बार बजट पेश करने तक का गौरवशाली सफर
सिद्धारमैया का जीवन संघर्ष और सफलताओं से भरा रहा है. मैसूर के सिदारा मन कुंडी गांव में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे सिद्धारमैया ने आर्थिक तंगी के चलते बचपन में कुछ समय तक भैंसें भी चराई थीं. हालांकि पढ़ाई के प्रति अपने जुनून के चलते उन्होंने मैसूर यूनिवर्सिटी से एलएलबी की डिग्री ली और एक जूनियर वकील के रूप में काम शुरू किया.
1978 में ताल्लुक बोर्ड सदस्य के रूप में जमीनी राजनीति की शुरुआत करने के बाद वह 1983 में चामुंडेश्वरी सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे. जेडीएस में एचडी देवगौड़ा के साथ काम करते हुए वे उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री बने और बाद में 2005-06 में कांग्रेस में शामिल हो गए. उनके नाम कर्नाटक के इतिहास में 17 बार राज्य का बजट पेश करने का अटूट रिकॉर्ड दर्ज है.
पार्टी में मनाने की कवायद शुरू, 2028 तक बना रहेगा सस्पेंस
सिद्धारमैया ने साफ किया है कि भले ही वे 2028 में 82 साल के हो जाएंगे और गिरती सेहत के कारण चुनावी दौड़भाग नहीं कर पाएंगे, लेकिन वे सामाजिक मुद्दों और सार्वजनिक जीवन से दूर नहीं होंगे. उनके इस बयान के तुरंत बाद कांग्रेस खेमे में हलचल तेज हो गई है.
विधायक शिवलिंगे गौड़ा समेत कई वरिष्ठ नेताओं और वरुणा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं ने ऑन-कैमरा कहा है कि सिद्धारमैया ने सिर्फ चुनाव न लड़ने की बात कही है, संन्यास नहीं लिया है. पार्टी के नेता आने वाले दिनों में उन पर फैसला बदलने के लिए भारी दबाव बनाएंगे. ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि क्या 2028 का चुनाव नजदीक आते ही कर्नाटक का यह पुराना दिग्गज एक बार फिर कार्यकर्ताओं की जिद के आगे मैदान में उतरता है या नहीं.
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