Shesh Bharat: क्या एक मुख्यमंत्री का 'प्रायश्चित' देश के संविधान के खिलाफ हो सकता है? क्या 41 परिवारों के आंसुओं को पोंछने के लिए दी गई सरकारी नौकरियां सिर्फ चुनावी 'खैरात' थीं? मद्रास हाई कोर्ट की चौखट पर जिस इंसाफ ने दम तोड़ दिया था, उसे सुप्रीम कोर्ट ने जिंदा कर दिया है. जब हाई कोर्ट ने कहा कि नौकरियां रद्द होंगी, तो विरोधी जश्न मना रहे थे कि मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय का राजनीतिक करियर अब घुटनों पर आ जाएगा. लेकिन सुप्रीम कोर्ट से निकली सिर्फ एक लाइन ने तमिलनाडु की पूरी बिसात को पलट कर रख दिया है, 'सरकार की नीति पर सवाल उठाने वाले आप कौन होते हैं?' हाई कोर्ट का जो आदेश विजय के गले की फांस बना था, सुप्रीम कोर्ट के उसी स्टे ऑर्डर ने आज उन्हें राजनीति का सबसे बड़ा 'बाजीगर' बना दिया है! सुप्रीम कोर्ट के सिर्फ एक फैसले ने मुख्यमंत्री विजय की राजनीति को 'विलेन' से सीधे 'मसीहा' बना दिया है.
ADVERTISEMENT
विजय सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत
सुप्रीम कोर्ट से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय और उनकी सरकार को बहुत बड़ी राहत मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसने करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के मुख्यमंत्री विजय के फैसले को रद्द कर दिया था. यह मुख्यमंत्री विजय के लिए एक बड़ी राजनीतिक और नैतिक जीत मानी जा रही है. सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका (PIL) दाखिल करने वाले याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाते हुए सीधे शब्दों में पूछा- सरकार की नीति पर सवाल उठाने वाले आप कौन होते हैं?
कोर्ट ने सरकार की नीति पर उठाए सवाल
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए साफ कहा कि अगर किसी परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य किसी हादसे में मारा जाता है, तो क्या सरकार का यह फर्ज नहीं है कि वह उसके बेटे, बेटी या पत्नी को योग्यता के अनुसार नौकरी देकर सहारा दे? कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर नाराजगी जताते हुए कहा कि इस मानवीय और नीतिगत फैसले में राजनीति नहीं लाई जानी चाहिए. यह आदेश सीधे तौर पर मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर है, जिसे उनकी सरकार के लिए एक बहुत बड़े बूस्टर डोज के रूप में देखा जा रहा है.
अभिषेक सिंघवी और मुकुल रोहतगी ने संभाला मोर्चा
देश के सबसे महंगे और दिग्गज कानूनी महारथियों को सुप्रीम कोर्ट के मैदान में उतारकर मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने यह महामुकाबला सीधे अपने नाम कर लिया है. मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ जब तमिलनाडु सरकार की ओर से देश के नामचीन सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी ने देश की सबसे बड़ी अदालत में पैरवी शुरू की, तो कोर्ट रूम का पूरा रुख ही बदल गया. इन दिग्गज वकीलों ने बेहद आक्रामक और अकाट्य दलीलें देते हुए सीधे संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत सरकार की नीतिगत और कार्यकारी शक्तियों (Executive Powers) का पुरजोर बचाव किया और साबित किया कि किसी त्रासदी के पीड़ितों का पुनर्वास करना लोक-कल्याणकारी राज्य का बुनियादी कर्तव्य है. देश के इन शीर्ष वकीलों की धारदार दलीलों के आगे याचिकाकर्ताओं का केस पूरी तरह ढह गया.
27 सितंबर 2025 की वो काली तारीख
इस पूरी कानूनी लड़ाई के पीछे 27 सितंबर 2025 की वो काली तारीख है, जिसने तमिलनाडु को हिलाकर रख दिया था. करूर में अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कज़गम (TVK) की एक रैली के दौरान अचानक भारी अव्यवस्था के चलते भगदड़ मच गई, जिसमें 41 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई और 100 से अधिक लोग घायल हो गए थे. इस हादसे ने विजय की नई-नवेली राजनीतिक पारी पर शुरुआत में ही गहरा दाग लगा दिया था. विपक्ष ने उन पर तीखे हमले किए, जिसके बाद विजय ने इस त्रासदी की पूरी नैतिक जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली. उन्होंने राजनीति में शुचिता और 'प्रायश्चित' का रास्ता चुना. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने पुलिस प्रशासन की विफलता पर भी सवाल उठाए और पीड़ितों के प्रति अपनी जवाबदेही तय करते हुए 10 जुलाई को खुद अपने हाथों से पीड़ित परिवारों के सदस्यों को सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र सौंपे थे, ताकि उनके घावों पर मरहम लगाया जा सके.
सरकारी नौकरियों पर हाई कोर्ट का फैसला
विजय सरकार का यह मानवीय कदम तब कानूनी पचड़े में फंस गया जब कुछ लोगों ने इसके खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट में जनहित याचिकाएं (PIL) दायर कर दीं. 27 जुलाई को मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने विजय सरकार को बड़ा झटका देते हुए इन सरकारी नौकरियों (GO) को रद्द कर दिया था. हाई कोर्ट का तर्क था कि किसी राजनीतिक रैली या हादसे में मारे गए लोगों के परिजनों को इस तरह सीधे सरकारी नौकरी देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है. कोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक रोजगार को सरकार 'दान या खैरात' की तरह नहीं बांट सकती. हाई कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि इससे ऐसे ही अन्य मामलों के लिए मांगों का एक 'बाढ़ का रास्ता' (Floodgates) खुल जाएगा और पहले से अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) का इंतजार कर रहे अन्य सरकारी कर्मियों के आश्रितों के साथ अन्याय होगा.
41 परिवारों को योग्यता के आधार पर मिली नौकरी
विजय ने संवेदनशीलता दिखाते हुए करूर हादसे के 41 पीड़ित परिवारों को उनकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर सीधे सरकारी सेवा में शामिल किया है. इनमें से अच्छे पढ़े-लिखे आश्रितों को जूनियर असिस्टेंट और टाइपिस्ट जैसे पदों पर नियुक्त किया गया है, जबकि अन्य सदस्यों को विलेज असिस्टेंट और ऑफिस असिस्टेंट के पदों पर नौकरी दी गई है. इन पदों के लिए पे-मैट्रिक्स लेवल-1 से लेकर लेवल-8 के तहत वेतन तय है, जिसके मुताबिक इन परिवारों को हाथ में करीब ₹22,000 से ₹32,000 तक की सुरक्षित इन-हैंड सैलरी आ रही है और इसी आजीविका पर मद्रास हाई कोर्ट के आदेश से खतरा पैदा हुआ था.
करूर हादसे की जांच को लेकर भी विवाद
यह पहला मौका नहीं है जब करूर भगदड़ मामले या तमिलनाडु सरकार की नीतियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में घमासान मचा हो. हादसे की जांच को लेकर भी कई याचिकाएं चल रही हैं. मद्रास हाई कोर्ट ने पहले इस मामले की जांच के लिए राज्य पुलिस अधिकारियों की एक विशेष जांच टीम (SIT) बनाई थी, जिस पर विजय की पार्टी TVK ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. पार्टी का आरोप था कि हाई कोर्ट ने मुख्यमंत्री विजय के खिलाफ पक्षपातपूर्ण टिप्पणियां की थीं. सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में भी हाई कोर्ट के रुख पर सवाल उठाए थे और इस संवेदनशील मामले की निष्पक्ष जांच के लिए सीबीआई (CBI) जांच की निगरानी के आदेश दिए हैं. राज्य में राजनीतिक रैलियों के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) और कानून-व्यवस्था को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई लंबित है.
41 परिवारों के घर फिर जगी उम्मीद
सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले के बाद अब उन 41 पीड़ित परिवारों के घरों में दोबारा उम्मीद का दीया जल गया है, जिनकी नौकरियां हाई कोर्ट के फैसले से छिनने की कगार पर थीं. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि फिलहाल हाई कोर्ट का आदेश प्रभावी नहीं रहेगा, जिसका मतलब है कि विजय सरकार की दी गई नौकरियां सुरक्षित रहेंगी. राजनीतिक रूप से, इस फैसले ने मुख्यमंत्री विजय को डीएमके, AIADMK के उन हमलों से बचा लिया है जो उन्हें 'असंवेदनशील' साबित करने पर तुले थे.
राहुल गांधी ने PM मोदी के 'गले लगाने' पर कसा तंज, BJP ने इंदिरा गांधी के फोटो से दिया जवाब
ADVERTISEMENT


