Pawan Kalyan vs Thalapathy Vijay: थलापति विजय तमिल फिल्मों के सुपर स्टार एक्टर रहे हैं और पवन कल्याण को तेलुगू फिल्मों का पावर स्टार कहा जाता है. दोनों ने कभी किसी फिल्म में एक साथ स्क्रीन स्पेस शेयर नहीं किया लेकिन दोनों के बीच अब कॉमन ये है कि दोनों ने एक्टिंग करियर में पीक पर पहुंचने के बाद राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल किया है. हालांकि दोनों की राजनीतिक कामयाबी का रास्ता बिल्कुल अलग रहा. विजय आते ही तमिलनाडु के सीएम बन गए, जबकि पवन कल्याण ने बरसों तक राजनीति में जूते घिसे और भारी संघर्ष किया, तब जाकर वह चंद्रबाबू नायडू की सरकार में आंध्र प्रदेश के डिप्टी सीएम बने हैं.
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विजय के सीएम बनते ही पवन कल्याण पर बढ़ा प्रेशर!
देश में थलापति विजय की इस फीनॉमिना ग्रोथ की हर तरफ खूब चर्चा हो रही है. इसके साथ ही अब वो सारे फिल्म स्टार भी अचानक चर्चा में आ गए हैं जिन्होंने एक्टिंग से राजनीति में जंप मारा, जिसमें कोई टिक गया तो कोई इसे बीच में ही छोड़ गया. फिलहाल रजनीकांत और विजय को लेकर राजनीतिक गलियारों में खूब बातें हो रही हैं. इस बीच पवन कल्याण पर उनके ही फैंस और समर्थकों का भारी राजनीतिक दबाव बन रहा है. लगातार पवन कल्याण से सवाल किए जा रहे हैं कि अगर विजय राजनीति में आते ही सीधे सीएम बन सकते हैं, तो पवन कल्याण क्यों नहीं? उन्होंने आंध्र प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने के बजाय चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और बीजेपी के साथ गठबंधन का रास्ता क्यों चुना और खुद सीएम क्यों नहीं बने?
मंगलगिरी में जनसेना चीफ ने तोड़ी चुप्पी
आम तौर पर ऐसी तुलनात्मक बातें इंटरनेट और सोशल मीडिया पर होती रहती हैं, जिस पर कभी कोई रिएक्ट करता है तो कोई नहीं. लेकिन इस बार मंगलगिरी में जनसेना पार्टी के मुख्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए खुद पवन कल्याण ने इस प्रेशर पर अपनी चुप्पी तोड़ी है. पवन कल्याण ने इस तुलना को खारिज करने के लिए तेलुगु की एक प्रसिद्ध कहावत का इस्तेमाल किया. उन्होंने इस प्रेशर और तुलना को पड़ोसी की शादी में बिन बुलाए मेहमानों का गैर-जरूरी उत्साह करार दिया. पवन कल्याण ने साफ कहा कि तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की राजनीतिक जमीनी हकीकत पूरी तरह से अलग है. उन्होंने अकेले चुनाव न लड़ने की मजबूरी भी बताई और वो हालात भी याद दिलाए जब जनता ने उन्हें पूरी तरह रिजेक्ट कर दिया था.
चिरंजीवी की पार्टी से हुई थी राजनीतिक शुरुआत
तेलुगु सिनेमा के पावर स्टार पवन कल्याण का फिल्मी पर्दे से लेकर आंध्र प्रदेश के डिप्टी सीएम के पद तक पहुंचने का सफर बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है. वह अपनी शुरुआती नाकामी से घबराए नहीं और लगातार लगे रहने की ललक से उन्होंने वो सब हासिल किया जिसका सपना कभी देखा था, हालांकि उनका अंतिम सपना अभी भी उनके वास्तविक मुकाम से एक कदम दूर है. पवन कल्याण की राजनीति में पहली एंट्री साल 2008 में हुई थी जब उनके बड़े भाई और तेलुगु सिनेमा के मेगास्टार चिरंजीवी ने प्रजा राज्यम पार्टी बनाई थी. उस समय पवन कल्याण को पार्टी की युवा शाखा युवराज्यम का अध्यक्ष बनाया गया था. उन्होंने पार्टी के लिए राज्य भर में आक्रामक चुनाव प्रचार किया और भ्रष्टाचार के खिलाफ तीखी आवाज उठाई, लेकिन 2009 के चुनावों में चिरंजीवी का राजनीति में आना फेलियर साबित हुआ और उन्होंने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया.
2019 में अकेले लड़े थे विधानसभा चुनाव
पवन कल्याण को अपने भाई का कांग्रेस के साथ जाने का यह फैसला मंजूर नहीं हुआ. भाई चिरंजीवी के इस कदम से आहत होकर पवन कल्याण ने राजनीति से दूरी बना ली और दोबारा फिल्म इंडस्ट्री में लौट गए. इसके बाद वह करीब 5 साल तक अपने राजनीतिक भविष्य के लिए प्लान करते रहे. साल 2014 में उन्होंने खुद की नई राजनीतिक पार्टी जनसेना पार्टी लॉन्च की. शुरुआत में उन्होंने खुद चुनाव नहीं लड़ा, बल्कि टीडीपी-बीजेपी गठबंधन को बिना शर्त बाहर से समर्थन दिया. इसके बाद वह 2019 के विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरे और अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. लेकिन यह फैसला पावर स्टार के लिए बैकफायर कर गया. जनसेना पार्टी को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा और वह केवल 1 सीट ही जीत सकी. पवन कल्याण खुद जिन दो सीटों गाजूवाका और भीमावरम से चुनाव लड़े थे, दोनों ही सीटों से चुनाव हार गए. इस करारी हार के बाद विरोधियों ने उन्हें पार्ट-टाइम नेता कहकर पूरी तरह रिजेक्ट कर दिया था.
साल 2024 में किंगमेकर बनकर उभरे पावर स्टार
साल 2019 की उस करारी हार के बाद भी पवन कल्याण डरे नहीं और लगातार जमीन पर डटे रहे. उन्होंने राजनीति के कई दांवपेंच और नए एक्सपेरिमेंट आजमाए. निराश होने के बजाय पवन कल्याण ने जमीन पर रहकर जनता के लिए कड़ा संघर्ष किया. इसके बाद साल 2024 के चुनावों में सत्ता विरोधी वोटों को बिखरने से रोकने के लिए उन्होंने चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और बीजेपी के साथ दोबारा एक मजबूत अलायंस किया. 2024 के आंध्र प्रदेश चुनावों के साथ जहां चंद्रबाबू नायडू ने सत्ता में दमदार वापसी की, वहीं पवन कल्याण भी राज्य की राजनीति में जायंट किलर और किंगमेकर बनकर उभरे. उनकी पार्टी जनसेना ने जिन 21 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा, उन सभी 21 सीटों पर ऐतिहासिक 100% स्ट्राइक रेट के साथ जीत दर्ज की. पवन कल्याण खुद पिथापुरम सीट से भारी मतों से विजयी हुए और इस बंपर जीत के बाद उन्हें आंध्र प्रदेश का उपमुख्यमंत्री बनाया गया, जिसने यह साबित कर दिया कि राजनीति में उनका कद अब एक स्थापित और परिपक्व नेता का हो चुका है.
जब दो सीटों से हारे थे तब कोई साथ नहीं था
पवन कल्याण ने 2019 के आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव को याद करते हुए अफसोस जताया कि जब उन्होंने अकेले दांव लगाया था और जनता ने उन्हें दोनों ही सीटों पर हरा दिया था, तब कोई उनके साथ खड़ा नहीं था और उनके बड़े नेता भी उन्हें अकेला छोड़कर भाग गए थे. उन्होंने अपने समर्थकों को समझाया कि आंध्र प्रदेश में राजनीतिक स्थिरता लाने और सत्ता विरोधी वोटों को बंटने से रोकने के लिए ही उन्होंने 2024 में टीडीपी-बीजेपी के साथ गठबंधन का यह व्यावहारिक रास्ता चुना, न कि सिर्फ सत्ता के लालच में आकर अकेले चुनाव में कूदने का फैसला किया.
तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की राजनीति में बड़ा अंतर
जब थलापति विजय से उनकी लगातार तुलना की जा रही है, तो पवन कल्याण ने यह समझाने और बताने में जरा भी संकोच नहीं किया कि जो विजय कर पाए वो आखिर उनके लिए करने में क्या चैलेंजिंग है. पवन कल्याण ने कहा कि आंध्र प्रदेश की राजनीति पिछले कई दशकों से मुख्य रूप से दो खास जातियों और बड़े परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती रही है, जहां अपनी एक अलग स्वतंत्र जगह बनाना बेहद कठिन और लंबी लड़ाई का काम है. वहीं दूसरी तरफ तमिलनाडु की जनता हमेशा से द्रविड़ विचारधारा के नेताओं जैसे जयललिता, करुणानिधि और स्टालिन को स्वीकार करती आई है, इसलिए उन्होंने जब एक नए विकल्प को चुना तो विजय के लिए वहां राह थोड़ी आसान रही. इस पूरी कहानी का सार यही है कि विजय के जीतने के बाद पवन कल्याण पर इस बात का भारी दबाव है कि वो भी विजय की तरह राज्य के एकमात्र लीडर यानी सीएम के रूप में खुद को स्थापित करें, लेकिन पवन कल्याण किसी के उकसाने पर बहकने के लिए तैयार नहीं हैं. उनके मुताबिक राजनीति में कोई शॉर्टकट नहीं होते और आंध्र प्रदेश के विकास के लिए मौजूदा गठबंधन ही उनका सबसे सही फैसला था.
कभी साथ स्क्रीन शेयर न करने के बाद भी खास ये कनेक्शन
दिलचस्प बात यह है कि साल 2022 में जब विजय राजनीति में उतरे थे, तब तक पवन कल्याण राजनीति में एक फेलियर साबित हो चुके थे. निश्चित रूप से थलापति विजय ने भी आगे बढ़ने से पहले पवन कल्याण की इस राजनीतिक केस स्टडी को जरूर पढ़ा होगा. इसके बाद जहां पवन कल्याण प्रो-बीजेपी बन गए, वहीं विजय ने खुद के लिए एकदम एंटी-बीजेपी वाली राजनीतिक लाइन चुनी. कभी एक साथ स्क्रीन शेयर नहीं करने के बाद भी दोनों के बीच हमेशा से एक अलग किस्म का कनेक्शन रहा है. दोनों ने एक-दूसरे की ब्लॉकबस्टर फिल्मों के रीमेक में काम करके अपने-अपने राज्यों तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में अपने फिल्मी स्टारडम को और मजबूत किया था. रीमेक का यही सुपरहिट कनेक्शन पवन कल्याण और विजय को हमेशा एक-दूसरे से जोड़े रहा.
'खुशी' से लेकर 'जलसा' तक का जलवा
फिल्मी सफर की बात करें तो साल 2000 में विजय की तमिल फिल्म 'खुशी' ब्लॉकबस्टर रही थी. इसके ठीक एक साल बाद 2001 में पवन कल्याण ने इसी फिल्म के तेलुगु रीमेक 'खुशी' में मुख्य भूमिका निभाई, जो पवन कल्याण के करियर की सबसे बड़ी कल्ट क्लासिक फिल्मों में से एक बनी. इसी तरह विजय की ब्लॉकबस्टर तमिल फिल्म 'थुप्पाकी' को तेलुगु में डब करके भी काफी सराहा गया था, वहीं पवन कल्याण की सुपरहिट फिल्म 'जलसा' के गानों और उनके खास स्टाइल को विजय के फैंस भी बेहद पसंद करते हैं. दोनों ही सुपरस्टार्स हमेशा से एक-दूसरे की स्क्रीन प्रेजेंस और मास-अपील के बड़े प्रशंसक रहे हैं.
पवन कल्याण ने दिल से दी थी थलापति विजय को बधाई
पवन कल्याण और थलापति विजय दोनों ही अपनी सादगी और जमीनी स्तर पर जनता के बीच काम करने के अपने खास अंदाज के लिए जाने जाते हैं. दोनों ही नेताओं ने अपनी फिल्मों की इसी जबरदस्त 'मास अपील' को सामाजिक बदलाव के एक बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है. जब विजय ने अपनी राजनीतिक पार्टी 'तमिलगा वेत्री कज़गम' (TVK) लॉन्च की थी, तब पवन कल्याण ने एक सीनियर राजनेता होने के नाते उनका दिल से स्वागत किया था. इसके बाद जब विजय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने, तो पवन कल्याण ने उन्हें "एक ईमानदार और दृढ़निश्चयी नेता" बताते हुए सोशल मीडिया पर दिल से बधाई दी थी. दोनों ही नेता हमेशा से एक-दूसरे की राजनीतिक यात्रा और उनके कड़े संघर्षों का सम्मान करते आए हैं, जो उनके आधिकारिक बयानों में भी साफ झलकता है.
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