पिछले 15 सालों से जिस सत्ता पर ममता बनर्जी और TMC का कब्जा था, वह अब BJP के पास जा चुकी है. सत्ता जाने के बाद ममता बनर्जी का किलकिला अचानक टूटने लगा और झटके लगने लगे. पहले 60 विधायकों का बागी होना, ऋतब्रत बनर्जी का नेता विपक्ष चुना जाएगा और फिर सांसदों के बागी होने के बाद पश्चिम बंगाल में सियासी पारा काफी हाई है. इसी बीच रविवार को बागी सांसद काकोली घोष, सुदीप बंदोपाध्याय समेत कई नेताओं ने लोकसभा स्पीकर को पत्र सौंपकर संसद में अलग बैठने की मांग की है. साथ ही इन 20 बागी सांसदों ने TMC को छोड़ अपने आप को NPCI से जोड़ लिया है.
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लेकिन अब ममता बनर्जी की असली टेंशन शुरू होने वाली है. विधायकों और सांसदों के बागी होने के बाद सवाल उठने लगा है कि क्या वे ममता बनर्जी से TMC का नाम और पार्टी चिह्न भी छीन लेंगे? ऐसा मामला पहले महाराष्ट्र में शिवसेना(उद्धव ठाकरे बनाम एकनाथ शिंदे) और NCP(शरद पवार बनाम अजीत पवार) देखा जा चुका है और ऐसी ही स्थिति में ममता बनर्जी की पार्टी भी खड़ी हो सकती है. आइए विस्तार से जानते है पूरा समीकरण.
TMC के लिए ममता और बागी गुट की लड़ाई!
TMC के 28 में से 20 सांसद बागी हो गए और उन्होंने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से संसद में अलग बिठाने के लिए अनुरोध किया है. वहीं काकोली घोष ने कहा है कि हम NDA को समर्थन देंगे, इसलिए ऐसा कहा जा रहा है कि इन बागियों को NDA के आसपास बैठने को जगह मिल सकती है. वहीं दूसरी ओर ममता बनर्जी TMC पर दावा जता रही है. TMC के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने रविवार को ही लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखा और बागी गुट को मान्यता नहीं देने की मांग की है.
अभी ही क्यों नहीं ठोका दावा?
रविवार को काकोली घोष ने भी ऐलान कर दिया कि 20 सांसदों के साथ वो NCP में विलय कर रही है. ऐसे में एक सवाल उठता है कि जब बागी गुट के पास दो तिहाई से ज्यादा सांसद है, 60 से ज्यादा बागी विधायकों का समर्थन है तो अभी ही TMC के लिए दावा क्यों नहीं ठोका गया? कानून भी कहता है कि अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद वहां से निकल जाए तो वे पार्टी तोड़ सकते हैं और पार्टी पर कब्जा भी कर सकते है.
लेकिन संदीप बंदोपाध्याय ने पहले ही कहा है कि, जब दो-तिहाई सांसदों के साथ अलग होते है तो पहले ही दिन मूल पार्टी पर अपना दावा नहीं कर सकते हैं. इसलिए ही उन्होंने NCPI में विलय किया और अब आगे की लड़ाई जुलाई महीने में होगी, जब TMC के बागी नेता पार्टी का नाम और चिह्म का दावा करेंगे. यानी ऐसा लग रहा है कि अब आगे मामला कोर्ट तक जा सकता है.
क्या ममता के हाथ से छिनी जा सकती हैं TMC?
अब एक बड़ा सवाल आता है कि क्या ममता बनर्जी के हाथों से बागी सांसद TMC छीन सकते हैं? तो इसका सीधा जवाब है 'हां'. तकनीकी और कानूनी रूप से देखा जाएं तो यह मुमकिन है, लेकिन यह इतना आसान नहीं होगा. TMC के बागी सांसदों ने NCPI(नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया) में विलय इसलिए किया ताकि वे दल-बदल विरोधी कानून से बच सकें. इसके साथ ही बागी गुट अब चुनाव आयोग जाकर खुद को 'असली TMC' होने का दावा ठोकने का प्लान कर रहे है.
संदीप बंदोपाध्याय के मुताबिक जुलाई में वो TMC को लेकर अपनी दावेदारी जताएंगे. बागी खेमे का प्लान है कि जुलाई में जब संसद का सत्र शुरू होगा, तब वे बहुमत के आधार पर खुद को 'असली TMC' घोषित करने की मांग करेंगे. फिर बागी नेता चुनाव आयोग के सामने अपना पक्ष रखेंगे और तब जाकर ममता बनर्जी को पार्टी का नाम और सिंबल छोड़ना पड़ सकता है. यह घटनाक्रम कुछ वैसे ही होगा जैसे शरद पवार और उद्धव ठाकरे को छोड़ना पड़ा था.
लीगली कौन कितना सही?
राजनीति में देखा गया है कि जब भी किसी पार्टी के दो गुट बनते हैं तब दोनों ही गुट खुद को 'असली पार्टी' बताते हैं, लेकिन फाइनल फैसला चुनाव आयोग करता है. इससे जुड़ी बातें 'इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968' के पारा 15 में साफ-साफ लिखा हुआ है.
ऐसे स्थिति में चुनाव आयोग यह देखता है कि पार्टी के निर्वाचित जन प्रतिनिधि यानी विधायक और सांसद कितनी संख्या में किस गुट के साथ है. मौजूदा स्थिति की बात करें तो TMC के 28 लोकसभा सांसद में से 20 सांसद बागी हो गए है. इसके अलावा 80 में से 60 से ज्यादा विधायकों के भी बागी होने का दावा है. ऐसे में बागी गुट सदन में आराम से बहुमत साबित कर देगा और अपनी दावेदारी को मजबूत करेगा.
इसके अलावा चुनाव आयोग यह भी देखता है की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, पदाधिकारियों और जिला अध्यक्षों की सूची में किसका पलड़ा कितना भारी है. ऐसे में ममता बनर्जी का पलड़ा भारी है क्योंकि संगठन पर अभी उनकी मजबूत पकड़ है. हालांकि शिवसेना और NCP के मामले में चुनाव आयोग ने संगठन से ज्यादा सांसद और विधायकों की संख्या को ज्यादा तरजीह दी थी.
ममता बनर्जी के पास क्या है उपाय?
चुनाव आयोग के सामने मामला जाने के बाद अगर उन्हें लगता है कि मामला गंभीर, उलझा हुआ है और तुरंत फैसला नहीं लिया जा सकता है तो वो TMC का नाम और सिंबल फ्रीज कर सकते है. फिर दोनों गुटों को ही अस्थायी नाम और सिंबल दिए जाएंगे. ऐसे में आयोग के फैसले के बाद ममता या बागी गुट, सुप्रीम कोर्ट का रुख करेगा. महाराष्ट्र में जब मामला फंसा था तब सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में लंबी चली थी, इसलिए अगर ऐसी स्थिति पैदा हुई तो बंगाल में भी कुछ ऐसा ही हो सकता है.
ममता बनर्जी पार्टी का नाम और सिंबल आसानी से नहीं छोड़ेगी और अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर मांग की है कि बागी गुट को मान्यता ना दी जाएं. अब चुनाव आयोग या लोकसभा स्पीकर के किसी भी फैसले पर जिसकी भी हार होगी, वह गुट तुरंत ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा. यानी साफ है कि आने वाले दिनों में दिल्ली से कोलकाता तक लंबी कानूनी लड़ाई तय है.
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