देश भर में पश्चिम बंगला विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई है. चुनाव भले भी अभी दूर जरूर है, लेकिन राजनीति के पहिए पूरी रफ्तार में घूमने लगे हैं. यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के उस सामाजिक मॉडल की अग्निपरीक्षा है, जिसने एक दशक से अधिक समय तक बंगाल की राजनीति को दिशा दी है. मार्च-अप्रैल में संभावित चुनाव और 7 मई 2026 को विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के साथ ही राज्य की राजनीति दो स्पष्ट ध्रुवों-TMC और BJP- में सिमटती जा रही है.
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महिला वोट: सत्ता की असली चाबी
ममता बनर्जी की राजनीति का सबसे स्थायी आधार महिलाएं रही हैं. लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री, रूपश्री, आनंदधारा और सबला जैसी योजनाओं ने सरकार और महिला मतदाता के बीच सीधा संबंध बनाया है. 2024 के लोकसभा चुनावों में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों के लगभग बराबर रही और यही वह सामाजिक सच्चाई है जिसने ममता को लगातार बढ़त दिलाई.
लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाएं अब कल्याण नहीं, चुनावी सुरक्षा कवच बन चुकी हैं. बंगाल में आज चुनावी गणित नहीं, महिला मनोविज्ञान सत्ता तय करता है. यही कारण है कि चुनाव से पहले महिलाओं के लिए किसी नई या संशोधित योजना की संभावना को नजर-अंदाज नहीं किया जा सकता.
नीतीश मॉडल का बंगाल संस्करण
महिला सशक्तीकरण के जरिये सत्ता का सामाजिक आधार मजबूत करने की यह रणनीति बिहार में नीतीश कुमार ने अपनाई थी. जीविका दीदियां, आरक्षण और छात्रवृत्तियों ने वहां सत्ता को स्थायित्व दिया. बंगाल में ममता बनर्जी ने इसी मॉडल को स्थानीय जरूरतों के मुताबिक ढालते हुए आधी आबादी को अपना कोर वोट बैंक बना लिया.
भाजपा के पास मजबूत नैरेटिव लेकिन कमजोर स्थानीय चेहरा
2021 में 77 सीटें जीतकर भाजपा ने यह साफ कर दिया कि बंगाल अब एकतरफा मैदान नहीं रहा. नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, हिंदुत्व का एजेंडा, बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और SIR जैसे मुद्दों ने भाजपा को वैचारिक ऊर्जा दी है. हालिया विधानसभा चुनावों में मिली सफलता से उसका आत्मविश्वास और बढ़ा है. लेकिन भाजपा की चुनौती यही है कि बंगाल में उसका चेहरा अब भी राष्ट्रीय है, स्थानीय नहीं. यह अंतर चुनावी मोड़ पर निर्णायक बन सकता है.
अल्पसंख्यक वोट: भरोसे से असंतोष तक
अल्पसंख्यक राजनीति में ममता बनर्जी की स्थिति अब पहले जैसी सहज नहीं रही. वक्फ कानून पर बदला हुआ रुख, SIR को लेकर असहजता और पार्टी के भीतर से उठती आवाजों ने मुस्लिम मतदाताओं के मन में सवाल खड़े किए हैं. यह पहली बार है जब मुस्लिम वोटर ममता को 'अनिवार्य विकल्प' की बजाय 'एक विकल्प' के तौर पर देखने लगा है. करीब 90 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाने वाला यह वोट बैंक यदि बंटा, तो उसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा.
SIR: सबसे संवेदनशील मोर्चा
गहन मतदाता पुनरीक्षण ने TMC को सबसे अधिक परेशान किया है. सीमावर्ती जिलों में घुसपैठ का सवाल नया नहीं है, लेकिन इस पर बदला हुआ राजनीतिक रुख ममता बनर्जी के लिए चुनौती बन गया है. चुनाव आयोग का आगे बढ़ना इस बात का संकेत है कि यह मुद्दा चुनावी बहस के केंद्र में रहेगा.
फैसला किसके हाथ?
बंगाल 2026 अब केवल सरकार बनाम विपक्ष की लड़ाई नहीं रह गई है. यह कल्याण बनाम पहचान, महिला वोट बनाम ध्रुवीकरण और भरोसे बनाम असंतोष की निर्णायक जंग है. ममता बनर्जी अब भी सबसे बड़ी पार्टी बनने की स्थिति में हैं, लेकिन यह उनकी अब तक की सबसे कठिन लड़ाई होगी. वहीं भाजपा के लिए सत्ता का दरवाजा पहली बार सचमुच खुलता दिख रहा है. आखिरकार फैसला इस बात पर होगा कि बंगाल का मतदाता डर से वोट करता है या भरोसे से.
लेखक- प्रियदर्शी रंजन(राजनीतिक विश्लेषक)
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