Shesh Bharat: राजनीति में कोई भी बयान बेवजह नहीं होता और जब बयान देने वाला नेता बी. एस. येदियुरप्पा जैसा चाणक्य हो, तो समझ लीजिए कि बिसात बहुत दूर की बिछाई जा चुकी है. कर्नाटक में विधानसभा चुनाव 2028 में होने हैं, लेकिन येदियुरप्पा ने अभी से चुनावी घेराबंदी शुरू कर दी है! कोई भी सोचेगा कि जब एचडी कुमारस्वामी मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री बने हुए हैं, जब कर्नाटक विधानसभा में बीजेपी और जेडीएस मिलकर कांग्रेस से भिड़ रहे हैं तो फिर अचानक येदियुरप्पा को यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी कि 'हम फ्यूचर के सारे चुनाव साथ लड़ेंगे?' क्या यह सिर्फ एक बयान है, या इसके पीछे जनता के बीच एक होने का भरोसा जगाने की छटपटाहट है?
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राजनीति का नियम है कि लोहा गर्म हो तभी हथौड़ा मार देना चाहिए. कर्नाटक में डीके शिवकुमार सरकार इस वक्त कई मोर्चों पर घिरी हुई है और इसी का फायदा उठाने के लिए येदियुरप्पा ने 2028 के चुनाव की तैयारी अशुरू कर दी है. उनका यह बयान कोई सामान्य राजनीतिक औपचारिकता नहीं है. यह कर्नाटक की जनता और खासकर दोनों पार्टियों के जमीनी कार्यकर्ताओं को दिया गया सीधा संदेश है कि बीजेपी और जेडीएस दो जिस्म और एक जान हैं. येदियुरप्पा जानते हैं कि कांग्रेस से सीधी टक्कर लेने के लिए जनता के मन में यह साफ होना जरूरी है कि विपक्ष बिखरा हुआ नहीं है, बल्कि एक मजबूत और एकजुट ताकत बनकर खड़ा है.
यही इस कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ है. जब कुमारस्वामी दिल्ली में केंद्र सरकार का हिस्सा हैं और बेंगलुरु में दोनों दल मिलकर विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं, तो फिर इस भरोसे को बार-बार दोहराने की जरूरत क्यों आन पड़ी? दरअसल, दिक्कत दिल्ली या विधानसभा में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच है. दोनों दलों के कैडर दशकों तक एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते आए हैं. स्थानीय नेताओं में अब भी यह डर है कि गठबंधन के चक्कर में उनका राजनीतिक वजूद खत्म न हो जाए. इसी असमंजस को मिटाने और जनता के बीच किसी भी तरह के भ्रम को दूर करने के लिए येदियुरप्पा को खुद सामने आकर यह गारंटी देनी पड़ी.
2028 में गठबंधन की जीत
हालांकि, जब मीडिया ने येदियुरप्पा से सवाल पूछा कि '2028 में गठबंधन की जीत होने पर क्या एचडी कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बनेंगे?', तो येदियुरप्पा ने चालाकी से गेंद को भविष्य के पाले में डाल दिया. कहा कि "मुख्यमंत्री कौन होगा, यह चुनाव जीतने के बाद दोनों पार्टियों के नेता मिलकर तय करेंगे"। जेडीएस ने भी इस लीडरशिप के सवाल पर फिलहाल कोई नया विवाद खड़ा न करते हुए चुप्पी साध ली है, क्योंकि उनका पहला मकसद कांग्रेस के खिलाफ अपने वजूद और वोक्कालिगा वोट बैंक को सुरक्षित रखना है।
येदियुरप्पा का यह बयान सिर्फ हवा में नहीं आया है, बल्कि 23 अक्टूबर को होने जा रहे विधान परिषद (MLC) की 4 सीटों के चुनाव ही इस गठबंधन की एकता का असली लिटमस टेस्ट हैं। ग्रेजुएट्स और टीचर्स के इन चुनावों में बीजेपी और जेडीएस के बीच 'वोट ट्रांसफर' (Vote Transfer) का एक बेहद पेचीदा और बड़ा इम्तिहान होने जा रहा है। इस चुनाव के फॉर्मूले के तहत तीन सीटों (दक्षिण-पूर्व स्नातक, पश्चिम स्नातक और उत्तर-पूर्व शिक्षक) पर जेडीएस समर्थकों को बीजेपी उम्मीदवारों को वोट देना होगा, जबकि बेंगलुरु शिक्षक सीट पर बीजेपी के कैडर को जेडीएस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करना होगा। यह चुनाव दोनों पार्टियों के नेतृत्व के लिए यह देखने का सबसे बड़ा मौका है कि क्या जमीनी स्तर पर उनके पारंपरिक वोट बैंक एक-दूसरे को सहजता से ट्रांसफर हो पाते हैं या नहीं। येदियुरप्पा अच्छी तरह जानते हैं कि अगर इस जमीनी टेस्ट में वोट ट्रांसफर फेल हुआ, तो कांग्रेस को 2028 से पहले ही मनोवैज्ञानिक बढ़त मिल जाएगी। यही वजह है कि उन्होंने ऐन वक्त पर यह बड़ा बयान देकर कार्यकर्ताओं को एकजुट होने का कड़ा संदेश दिया है।
येदियुरप्पा के इस अचानक आए बड़े बयान के पीछे बीजेपी और जेडीएस के बीच तीखा जमीनी टकराव ही असली वजह है. कलबुर्गी, कोलार, मांड्या, चिकमगलूर जैसे कई इलाकों में अलायंस या पार्टी की बैठकों में जमकर झगड़े हो रहे हैं. जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ते इसी अविश्वास और घर्षण को शांत करने के लिए, येदियुरप्पा को खुद डैमेज कंट्रोल मोड में आना पड़ा और ऑल-इज-वेल का संदेश देने के लिए 2028 तक के 'अटूट गठबंधन' का यह बड़ा ऐलान करना पड़ा.
साथ आना विरोधियों के लिए हमेशा 'वोट बैंक का सुनामी'
इतिहास गवाह हैं कि इनका साथ आना विरोधियों के लिए हमेशा 'वोट बैंक का सुनामी' साबित होता है. जब-जब बीजेपी और जेडीएस ने हाथ मिलाया, तब-तब उन्होंने कांग्रेस को चारों खाने चित कर दिया. साल 2006 में जब पहली बार इन दोनों ने हाथ मिलाया, तो दक्षिण भारत में पहली बार बीजेपी के लिए सत्ता का रास्ता खुला और गठबंधन सरकार बनी. 2024 के लोकसभा चुनाव में जब यह जोड़ी दोबारा साथ आई, तो मिलकर कर्नाटक की 28 में से 19 सीटों पर बंपर जीत दर्ज की. बीजेपी ने 17 और जेडीएस ने 2 सीटें जीती. जेडीएस के वोक्कालिगा और बीजेपी के लिंगायत वोट बैंक का ऐसा सटीक ट्रांसफर हुआ कि मजबूत दिख रही कांग्रेस सिर्फ 9 सीटों पर सिमट कर रह गई. इसके बाद भी कि कांग्रेस की सरकार थी और 2023 की जीत के बाद लोकसभा चुनाव हुए थे.
कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही कड़वा है. जब-जब ये दोनों दल अलग-अलग लड़े, इसका सीधा फायदा कांग्रेस की झोली में गया. 2007 में जब 20-20 महीने का पावर-शेयरिंग फॉर्मूला टूटा और दोनों अलग हुए, तो राज्य में अस्थिरता का दौर आया. सबसे बड़ा सबक साल 2023 के विधानसभा चुनाव से मिलता है. तब बीजेपी और जेडीएस अलग-अलग मैदान में उतरे थे. नतीजा यह हुआ कि दोनों के पारंपरिक वोट आपस में ही कट गए. जहां बीजेपी महज 66 सीटों पर सिमट गई, वहीं जेडीएस अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर में पहुंचकर सिर्फ 19 सीटों पर आ टिकी. बिखरे हुए विपक्ष का फायदा उठाकर कांग्रेस 135 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आ गई. येदियुरप्पा इसी कड़वे इतिहास को जानते हैं, इसीलिए वो 2028 में अलग होने का जोखिम किसी भी कीमत पर नहीं उठाना चाहते.
बीजेपी और जेडीएस का इतिहास 2006 के '20-20 महीने' के उस धोखे से भरा हुआ है, जिसे कर्नाटक की जनता भूली नहीं है. तब कुमारस्वामी ने येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने से इनकार कर दिया था. येदियुरप्पा बखूबी जानते हैं कि जनता के दिमाग में आज भी वो पुरानी खटपट घूम सकती है. इसलिए, 2028 में कांग्रेस के 'अहिंदा' अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित कार्ड को फेल करने के लिए, अतीत की उन दरारों को पूरी तरह भरना बेहद जरूरी है. येदियुरप्पा का यह बयान इसी भरोसे की नींव रखने की एक सोची-समझी रणनीति है.
येदियुरप्पा की इस जल्दबाजी और गंभीरता के पीछे कर्नाटक का जातीय गणित भी है. बीजेपी के पास लिंगायत समुदाय का मजबूत आधार है, लेकिन ओल्ड मैसूरु क्षेत्र में बिना जेडीएस के वोक्कालिगा वोट बैंक के कांग्रेस को पटखनी देना नामुमकिन है. कांग्रेस के पास डी.के. शिवकुमार के रूप में बड़ा वोक्कालिगा चेहरा है.
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