Charchit Chehra: 2020 में BJP से तोड़ा 24 साल पुराना गठबंधन, अब PM मोदी से वन-टू-वन मीटिंग! जानिए कौन हैं सुखबीर सिंह बादल

रूपक प्रियदर्शी

• 12:35 PM • 11 Aug 2026

Sukhbir Singh Badal: सुखबीर सिंह बादल एक बार फिर पंजाब की राजनीति के केंद्र में हैं. 2020 में तीन कृषि कानूनों के विरोध के बीच 24 साल पुराना BJP-अकाली दल गठबंधन तोड़ने वाले सुखबीर बादल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वन-टू-वन मुलाकात ने सियासी हलचल बढ़ा दी है. जानिए कौन हैं सुखबीर सिंह बादल, कैसे उन्होंने राजनीति में एंट्री की, प्रकाश सिंह बादल की राजनीतिक विरासत संभाली और हाल में हो रही चर्चा की पूरी कहानी.

Sukhbir Singh Badal PM Modi Meeting
Sukhbir Singh Badal PM Modi Meeting
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कैप्टन अमरिंदर सिंह केवल कांग्रेस नेता थे इसलिए गांधी परिवार से रिश्ते नहीं थे. दून स्कूल में राजीव गांधी के बैचमेट हुआ करते थे. राजीव ही आर्मी मैन कैप्टन को कांग्रेस की राजनीति में लाए. इस रिश्ते से कैप्टन अमरिंदर राहुल के अंकल ही हुए लेकिन उन्होंने ऐसे कभी कहा नहीं जैसे अब कहा. 

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राहुल के अंकल अमरिंदर पुकारते ही पंजाब की राजनीति में भारी सनसनी मची है. अरसे से ये अटकलें तो थी कि अकाली और बीजेपी अपने-अपने सरवाइल के साथ फिर साथ आ सकते हैं लेकिन राहुल के अंकल अमरिंदर बोलते ही फौरन एक्शन तेज हुआ. सुखबीर बादल और पीएम मोदी की मीटिंग हो गई और फिर पलट गई है चुनाव से पहले पूरी पंजाब की राजनीति. सुखबीर बादल एक और मास्टर स्ट्रोक के साथ बन गए चर्चित चेहरा. विस्तार से जानिए पूरी कहानी.

सुखबीर बादल ने 2020 में तोड़ा था बीजेपी से अलायंस!

राजनीति में जब रिश्ते बनते हैं, तो वफादारी की कसमें खाई जाती हैं. जब टूटते हैं, तो इतिहास बदल जाता है. भारतीय राजनीति में एक दौर ऐसा था जब दो पार्टियों शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी के गठबंधन को राजनीतिक मजबूरी नहीं, बल्कि नहूं-मास यानी नाखून-मांस का अटूट रिश्ता कहा जाता था. अगर 2020 का किसान आंदोलन बीजेपी के खिलाफ नहीं गया होता तो शायद ही ये रिश्ता टूटता. 

कांग्रेस के बाद शिरोमणि अकाली दल दूसरी सबसे पुरानी पार्टी है जो 1920 से चल रही है. प्रकाश सिंह बादल ने इसे इतना बड़ा बनाया. 2020 में मोदी सरकार एग्रीकल्चर रिफॉर्म के नाम पर तीन नए कृषि कानून लेकर आई, तो प्रकाश सिंह बादल के जीतेजी सुखबीर सिंह बादल ने सरकार को हिला दिया. अच्छा-भला सत्ता सुख भोग रहे थे. हरसिमरत कौर मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री हुआ करती थीं. किसानों के हितों में सुखबीर बादल ने बीजेपी से अलायंस तोड़ने का साहस दिखाया. 

बादल की बगावत ने किसान आंदोलन की आग में घी का काम किया. सरकार इतनी प्रेशर में आई कि पहली बार अपने बनाए किसी कानून को रद्द करने पर मजबूर हुई. हालांकि इससे मोदी सरकार या बीजेपी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा. शिरोमणि अकाली दल जरूर पंजाब की राजनीति में एकदम बैंक बेंचर बन गई. 2023 में प्रकाश सिंह बादल के जाने के बाद पूरी पार्टी अब सिर्फ सुखबीर बादल और उनकी पत्नी हरसिमरत कौर के भरोसे चल रही है.

कौन हैं सुखबीर बादल?

प्रकाश सिंह बादल के घर 9 जुलाई 1962 को फरीदकोट में एक ऐसे बच्चे का जन्म हुआ, जिसकी रगों में राजनीति और पंजाब की मिट्टी का रसूख पहले दिन से दौड़ रहा था. नाम रखा गया 'सुखबीर'. पिता प्रकाश सिंह बादल देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रच रहे थे. घर में हर वक्त राजनीति और अकाली दल के नेताओं का मजमा लगा रहता था, जिसने अनजाने में ही सुखबीर के भीतर राजनीति की जड़ें जमानी शुरू कर दी लेकिन सुखबीर को राजनीति नहीं करनी थी. 

बादल परिवार ठेठ ग्रामीण पंजाब से जुड़ा था, लेकिन सुखबीर का एजुकेशन एकदम हाईफाई रहा. बचपन में ही हिमाचल प्रदेश के कसौली के मशहूर सनावर स्कूल पढ़ने भेजे गए. हायर एजुकेशन के लिए चंडीगढ़ के पंजाब यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में एमए किया. सुखबीर की उड़ान यहीं नहीं रुकी. आगे बिजनेस मैनेजमेंट सीखने-समझने के लिए अमेरिका गए. ऐसी एजुकेशन ने उन्हें मॉडर्न और कॉरपोरेट विजन दिया. उस जमाने में जब पंजाब में उनका परिवार उस वक्त भी अकूत जमीन और दौलत का मालिक था उन्होंने अपने खर्चे निकालने के लिए कैलिफोर्निया की पिज्जा शॉप में पार्ट-टाइम डिलीवरी बॉय की भी नौकरी की. अमेरिका से एमबीए की डिग्री लेकर लौटने के बाद भी सुखबीर सिंह बादल का राजनीति में आने का कोई इरादा नहीं था. परिवार के होटल, ट्रांसपोर्ट, खेती-किसानी के बड़े कारोबार को संभालना चाहते थे. 

सुखबीर और हरसिमरत की मुलाकात!

1991 में उनकी जिंदगी में आई दिल्ली की हरसिमरत कौर मजीठिया. दिल्ली के लोरिटो कॉन्वेंट स्कूल और साउथ दिल्ली पॉलिटेक्निक से टेक्सटाइल डिजाइनिंग की पढ़ाई करने वाली एक आधुनिक लड़की, जिसका नाम था हरसिमरत कौर मजीठिया. दिल्ली की इस सिख लड़की को धाराप्रवाह पंजाबी बोलना भी नहीं आता था. उसे अपना करियर बनाना था. दोनों की पहली फैमिली फंक्शन में मुलाकात अरेंज्ड मैरिज की शुरुआत बनी. परिवार दिल्ली में रसूख वाला था तभी तो शादी के लिए बादल जैसे राजनीतिक घराने में रिश्ता गया लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था.  

हरसिमरत को राजनीति पसंद नहीं थी. जब 1991 में जब शादी हुई तो दोनों के बीच आपसी समझ थी कि सुखबीर कभी भी सक्रिय राजनीति में कदम नहीं रखेंगे. तब उन्हें ये ख्याल न रहा कि उनकी शादी किस घराने में किससे हो रही है. शादी के दो-तीन साल के अंदर चीजें कुछ ऐसे बदली कि न केवल सुखबीर बादल राजनीति में आए बल्कि बहू हरसिमरत को भी राजनीति में उतरना पड़ा. 

सुखबीर की राजनीति में एंट्री कैसे हुई?

सुखबीर राजनीति में आए क्योंकि ऐसा पिता प्रकाश सिंह बादल चाहते थे. प्रकाश सिंह ने खुद पंजाब की कमान संभाले रखी. 1996 में सुखबीर सिंह बादल के जीवन में वो यू-टर्न आया जिसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी. पॉलिटिकल ट्रेनिंग लेने सुखबीर को दिल्ली की राजनीति करने भेज दिया. 1996 के लोकसभा चुनावों में सुखबीर अकाली दल के टिकट पर पहला चुनाव जीतकर सांसद बने. आगे 1998 और 2004 में भी फरीदकोट से लोकसभा सांसद चुने गए. वाजपेयी सरकार के दौरान अकाली कोटे से सुखबीर MOS इंडस्ट्री बनाए गए. 

2008 में प्रकाश सिंह बादल 81 साल के हो चुके थे. एक ही बेटा था सुखबीर. 2008 में प्रकाश सिंह बादल ने धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक विरासत सुखबीर को सौंपते हुए शिरोमणि अकाली दल का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया. 2009 में पंजाब बुलाकर डिप्टी सीएम बना दिया. भारतीय राजनीति में सीएम का बेटा केवल डिप्टी सीएम या मंत्री नहीं हुआ करता. उन्हें सुपर सीएम  पुकारा जाने लगा. प रकाश सिंह के रहते सुखबीर पंजाब की सरकार चलाने लगे. 2007 से 2017 तक अकाली-बीजेपी सरकार बनाने के पीछे सुखबीर की चुनावी रणनीति, माइक्रो-मैनेजमेंट और कॉर्पोरेट स्टाइल की कैंपेनिंग का बड़ा हाथ माना गया. बिजनेसमैन बनने का सपना देखने वाला लड़का, पंजाब का सबसे पावरफुल चेहरा बन गया. 2007 से 2017 तक अकाली-बीजेपी की सरकारें चलती रहीं. 

हरसिमरत की राजनीतिक एंट्री की कहानी!

2009 में हरसिमरत कौर बादल की राजनीति में एंट्री किसी सोची-समझी प्लानिंग के तहत नहीं, बल्कि बादल परिवार के वजूद को बचाने के लिए इमरजेंसी लैंडिंग की तरह हुई. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बादल परिवार के गढ़ बठिंडा को ढहाने के लिए अपने बेटे रानिंदर सिंह को मैदान में उतार दिया. यह सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं था, बल्कि बादल परिवार की साख और सम्मान की सीधी लड़ाई थी. 

प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल को बठिंडा में कैप्टन के बेटे को मात देने के लिए एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी, जो करिश्मा कर सके. फिर हुआ घर की बहू हरसिमरत कौर बादल को राजनीति में लाने और चुनाव लड़ाने का फैसला. हरसिमरत के लिए ये सब हैरान और डराने वाला था क्योंकि उन्हें न राजनीति न पसंद थी, न ललक. 

बठिंडा की कड़कती धूप में जब दिल्ली की पढ़ी-लिखी बहू चूड़ीदार सूट पहनकर और सिर पर पल्लू रखकर गांवों में उतरी, तो पंजाब की महिलाओं ने उन्हें हाथों-हाथ लिया. राजनीति में आने से पहले उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ सामाजिक आंदोलन 'नन्हीं छांव' शुरू किया था. आंदोलन के तहत वो गांवों में जाती थीं और जिस घर में बेटी पैदा होती थी, वहां जाकर एक तुलसी या नीम का पौधा दान करती थीं. हरसिमरत की इस लड़ाई ने आगे पंजाब की लाखों ग्रामीण महिलाओं को बादल परिवार से भावनात्मक रूप से जोड़ दिया. 'नन्हीं छांव' की महिला ब्रिगेड हरसिमरत का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बन गई. उन्होंने कैप्टन अमरिंदर सिंह के बेटे को 1 लाख 20 हजार से ज्यादा वोटों के भारी अंतर से धूल चटा दी. 

मोदी सरकार में बनी मंत्री, लेकिन तभी टूटा अकाली-बीजेपी का अलायंस!

बठिंडा की इस ऐतिहासिक जीत ने हरसिमरत की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी. इसके बाद वे सिर्फ बठिंडा तक सीमित नहीं रहीं. 2014 और 2019 में दोबारा सांसद चुनी गईं. अकाली दल को दिल्ली की राजनीति में हरसिमरत में ही वो चेहरा दिखा जो नेशनल फेस बन सके. अकाली कोटे से मोदी सरकार में हरसिमरत कौर Food Processing मंत्री संभाल रही थी जब अकाली-बीजेपी का अलायंस टूटा. 

भारतीय राजनीति में शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी के गठबंधन को 'नहूं-मास' का रिश्ता कहे जाने की शुरुआत 1996 में हुई थी, जब प्रकाश सिंह बादल और अटल बिहारी वाजपेयी ने बिना किसी शर्त के इस गठबंधन की नींव रखी थी. नाखून और मांस का मुहावरा खुद प्रकाश सिंह बादल ने दिया था, जिसका मतलब था कि जिस तरह नाखून को मांस से अलग नहीं किया जा सकता, ठीक उसी तरह अकाली दल और बीजेपी को अलग नहीं किया जा सकता. 

दोनों पार्टियों को एक मंच पर लाने का सबसे बड़ा कारण कांग्रेस का अंध विरोध बना था. पंजाब को कांग्रेस से मिले घावों को भरने के लिए पंजाब में हिंदू-सिख भाईचारे और सांप्रदायिक शांति के नारे के प्रतीक बन गए बादल और बीजेपी. 1996 से 2020 तक बादल और बीजेपी ने मिलकर दिल्ली और पंजाब की सरकारें चलाईं, जहां अकाली दल हमेशा बड़े भाई की भूमिका में रहा.

2017 में हार के बाद सुखबीर के शुरू हुए बुरे दिन!

सुखबीर बादल और अकाली दल के लिए चीजें तब बदलने लगी जब 2017 में अलायंस की हार गई. प्रचंड मोदी लहर के बाद भी कांग्रेस के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पंजाब जीत लिया. 2022 में कांग्रेस से आप ने सत्ता छीन ली. अकाली दल की हैसियत तीसरे-चौथे नंबर की पार्टी हो गई. दिन इतने बुरे आए कि अकाल तख्त ने धार्मिक कदाचार का दोषी यानी 'तनखैया' घोषित कर दिया. उन्होंने सजा मिली 2007 से 2017 के बीच पंजाब की अकाली-बीजेपी सरकार के दौरान विवादित फैसलों की. उन्होंने स्वर्ण मंदिर में पैर में फ्रैक्चर होने के बावजूद व्हीलचेयर पर बैठकर, गले में तख्ती लटकाकर सेवादार के रूप में बर्तन मांजने और जूते साफ करने जैसी कड़ी धार्मिक सजा (तनखाह) भुगतकर प्रायश्चित किया.

तनखैया घोषित होने के बाद कोई भी सिख किसी भी सार्वजनिक या राजनीतिक नेतृत्व के योग्य नहीं माना जाता. नवंबर 2024 को सुखबीर सिंह बादल ने अकाली दल के अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा सौंप दिया, ताकि पार्टी के नए चुनाव का रास्ता साफ हो सके. धार्मिक सजा पूरी करने के बाद ही अप्रैल 2025 में सुखबीर सिंह बादल फिर शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष बन पाए.

क्यों टूटा था बीजेपी और अकाली दल का अलायंस?

2020 में ऐसा मोड़ आया जिसने 24 साल पुराने रिश्ते को एक झटके में तोड़ दिया. केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब के किसानों ने देश का सबसे बड़ा आंदोलन शुरू कर दिया. किसानों की आवाज बने रहने के लिए सुखबीर बादल ने बीजेपी से अलायंस तोड़ दिया. गठबंधन का टूटना अकाली दल के लिए एक बड़ा जुआ था, जिसके बाद 2022 के पंजाब चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव दोनों पार्टियों ने अकेले लड़े. अकेले लड़ने पर बीजेपी को भी नुकसान हुआ और अकाली दल भी बिखर गया.

क्या फिर होगा अलायंस? 

राजनीति का पहिया एक बार फिर घूम चुका है. पंजाब के भीतर समीकरण तेजी से बदल रहे हैं. सुखबीर सिंह बादल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संसद भवन में हुई वन-टू-वन मुलाकात ने पंजाब की सियासत में हलचल पैदा कर दी है. सवाल है कि किसान आंदोलन के जख्मों के बाद भी ये दोनों दल दोबारा हाथ मिलाने को मजबूर क्यों हो रहे हैं?

अकेले चुनाव लड़ने के कारण अकाली दल और बीजेपी दोनों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है. पंजाब में इस समय आम आदमी पार्टी की सरकार है और कांग्रेस भी मजबूत स्थिति में है. यदि अकाली दल का पंथक और ग्रामीण वोट बैंक, बीजेपी के शहरी और हिंदू वोट बैंक के साथ मिल जाता है, तो यह संयुक्त वोट शेयर करीब 40-45% तक पहुंच सकता है, जो उन्हें दोबारा सत्ता में ला सकता है. हालांकि, इस बार गठबंधन पहले जैसा नहीं होगा. पहले बीजेपी पंजाब में 'जूनियर पार्टनर' बनकर सिर्फ 23 सीटों पर लड़ती थी. लेकिन अब अपना वोट बेस बढ़ने के बाद बीजेपी बराबरी के आधार पर सम्मानजनक सीट शेयरिंग चाहती है, जिसे लेकर बातचीत के दरवाजे खुल चुके हैं.

प्रकाश सिंह बादल के जाने के बाद और किसान आंदोलन के बाद बिखरे अकाली दल को दोबारा खड़ा करने के लिए सुखबीर सिंह बादल के पास अब ज्यादा रास्ते नहीं बचे हैं. बीजेपी को भी पंजाब फतह करने के लिए एक मजबूत क्षेत्रीय और सिख चेहरे की जरूरत है. हरसिमरत कौर बादल और सुखबीर बादल का मास्टरस्ट्रोक अकाली दल की किस्मत 2027 के चुनावों में पलटने वाला भी साबित हो सकता है.

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Punjab Politics: ''ना-ना करते प्यार...'', अकाली-BJP के एक होने से AAP परेशान क्यों?