"महिला सिलेंडर नहीं उठा पाएगी"...इसे सुप्रीम कोर्ट ने नारीत्व का बताया अपमान, अब महिला को मिलेगा 12 लाख का मुआवजा

संजय शर्मा

17 Sep 2026 (अपडेटेड: Sep 17 2026 8:33 PM)

सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) को एक महिला को 12 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है. कोर्ट ने "महिला सिलेंडर नहीं उठा पाएगी" कहकर नौकरी खारिज करने पर सख्त आपत्ति जताते हुए इसे नारीत्व का अपमान बताय. जानिए क्या है पूरा मामला.

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फाइल फोटो: इंंडिया टुडे.
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एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड को आदेश दिया है कि वो महिला को 12 लाख रुपए का मुआवजा दे. साथ सर्वोच्च अदालत ने योग्य उम्मीदवार को खारिज करने वाले आधार पर आपत्ति जताते हुए इस नारित्व का अपमान बताया है. तो चलिए बताते हैं कि ये पूरा मामला क्या है और इसमें महिला सुमित्रा को सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहते हुए बड़ी राहत दी है. 

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दरअसल सुमित्रा आईओसीएल के एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में रीफिलिंग हेल्पर की नौकरी के लिए गई थीं. इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने यह कहकर उन्हें नौकरी देने से इनकार किया था कि "महिला सिलेंडर नहीं उठा पाएगी".  सुप्रीम कोर्ट ने आईओसीएल के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताया. अदालत ने कहा कि चूंकि महिला अब रिटायरमेंट तक पहुंच चुकी हैं इसलिए उसे नौकरी देने की बजाय एकमुश्त 12 लाख रुपए दिया जाए. 

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कॉर्पोरेशन की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि केवल महिला होने के आधार पर नौकरी न देना "नारीत्व का अपमान" है. इंडियन ऑयल के वकील ने दलील दी थी कि इस काम में भारी LPG सिलेंडर उठाने पड़ते हैं और रात की शिफ्ट होती है, इसलिए शायद अधिकारियों ने महिला को उपयुक्त नहीं माना. इसपर कोर्ट ने टिप्पणी की कि महिलाएं दिन-रात अपने घरों में खुद गैस सिलेंडर उठाती और बदलती हैं. नौकरी की बजाय मुआवजा मुद्दे पर कहा गया कि याचिकाकर्ता महिला अब रिटायरमेंट की उम्र पार कर चुकी है. 

कौन है याचिकाकर्ता सुमित्रा और क्या है पूरा मामला ?  

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक याचिकाकर्ता पंजाब के गुड़ा गांव की रहने वाली है. डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली पीठ ने IOC के एलपीजी बाटलिंग प्लांट में रोजगार के लिए 49 लोगों के नाम सुझाए थे. सुमित्रा भी उन लोगों में शामिल थीं.  सुमित्रा ने इंटरव्यू दिया पर उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया. महिला मामले को लेकर अदालत पहुंची. ट्रायल कोर्ट ने माना कि महिला होने के नाते सुमित्रा को नौकरी नहीं दी गई जबकि वो योग्य उम्मीदवार थीं. तब ट्रायल कोर्ट ने सुमित्रा को कैजुआल कर्मचारी/प्रशासनिक पद/चपरासी के पद पर समायोजित करने का आदेश दिया. 

चली लंबी लड़ाई 

मामला प्रथम अपीलीय अदालत तक पहुंचा. यहां अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया. अदालत का कहना था कि महिला का नाम केवल सिफारिश के तौर पर दिया गया था. साल 2025 में मामला पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा. वहां हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखा. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए महिला को नियुक्ति देने की बजाय लंबी कानूनी लड़ाई और उम्र को देखते हुए 12 लाख रुपए मुआवजा देने को कहा. 

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