राजस्थान कांग्रेस के अंदरूनी घटनाक्रम और गुटबाजी ने एक बार फिर राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (PCC Chief) गोविंद सिंह डोटासरा के तल्ख तेवर और हालिया बयानों से यह साफ जाहिर हो रहा है कि वह अब किसी के साए में रहकर राजनीति करने के मूड में नहीं हैं. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बंगले पर लगे ‘चौथी बार गहलोत सरकार’ के नारों पर डोटासरा की तीखी प्रतिक्रिया के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या राजस्थान कांग्रेस में अशोक गहलोत का वर्चस्व कमजोर हो रहा है और डोटासरा अपना अलग सियासी वजूद खड़ा कर रहे हैं?
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1. 'व्यक्तिगत ब्रांडिंग' पर डोटासरा की नसीहत और तीखे बोल
हाल ही में पूर्व मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीय और सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने अशोक गहलोत के सिविल लाइंस स्थित बंगले पर पहुंचकर 'चौथी बार गहलोत सरकार' के नारे लगाए थे. इस घटनाक्रम पर गोविंद सिंह डोटासरा ने सख्त आपत्ति जताई. डोटासरा ने दोटूक अंदाज में कहा कि कांग्रेस राजस्थान में इसलिए रिपीट नहीं हो पाती क्योंकि नेता पार्टी से ऊपर उठकर अपनी व्यक्तिगत ब्रांडिंग करने लगते हैं. उन्होंने नेताओं को हिदायत दी कि बिना प्रदेश अध्यक्ष की सहमति के इस तरह के नारे न लगाए जाएं.
2. 'एक्सीडेंटल प्रेसिडेंट' के ठप्पे से बाहर निकलने की हुंकार
राजनीतिक विश्लेषक मिथिलेश जैमिनी का मानना है कि डोटासरा अब उस धारणा को पूरी तरह तोड़ना चाहते हैं कि वे अशोक गहलोत के आशीर्वाद से ही प्रदेश अध्यक्ष बने थे. डोटासरा ने साफ संदेश दिया है कि वे राहुल गांधी और केंद्रीय आलाकमान के प्रति जवाबदेह हैं.
शेखावाटी का राजनीतिक मिजाज: मारवाड़ी और शेखावाटी की जमीनी राजनीति से निकले डोटासरा अब आंख में आंख डालकर अपनी बात रख रहे हैं. वे यह जता चुके हैं कि वे किसी के राजनीतिक छत्रछाया में दबे रहने वाले नेता नहीं हैं.
3. हनुमान बेनीवाल के प्रति बदला रुख
राजस्थान की राजनीति में शेखावाटी और मारवाड़ के समीकरण बेहद अहम माने जाते हैं. डोटासरा के हालिया बयानों से साफ है कि वे राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल के प्रति थोड़ा नरम रुख अपना रहे हैं.
पेपर लीक मामले में जब बेनीवाल ने नार्को/पॉलीग्राफ टेस्ट की मांग की, तो डोटासरा ने तुरंत खुद को इसके लिए तैयार बताया. कांग्रेस को राज्य में मजबूत करने और जाट वोट बैंक पर अपनी पकड़ बनाने के लिए डोटासरा का यह 'सॉफ्ट कॉर्नर' एक नई रणनीतिक चाल माना जा रहा है.
4. गहलोत की काउंटर-रणनीति और दिल्ली का रुख
दूसरी तरफ, अशोक गहलोत भी राजस्थान की राजनीति से अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देना चाहते. गहलोत सोशल मीडिया, कार्यकर्ता सम्मेलनों और पूर्ववर्ती योजनाओं के सहारे खुद को राजस्थान में कांग्रेस का इकलौता सर्वमान्य चेहरा साबित करने में जुटे हैं. हालांकि, हाल ही में दिल्ली में हुए सांगठनिक कार्यक्रमों और अन्य राज्यों (जैसे छत्तीसगढ़) में सचिन पायलट व अन्य नेताओं की सराहना के बाद गहलोत खेमे में खलबली देखी जा रही है.
राजस्थान कांग्रेस में चल रही यह खींचतान केवल बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य के नेतृत्व की लड़ाई है. एक तरफ जहां अशोक गहलोत अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं गोविंद सिंह डोटासरा अपने आक्रामक अंदाज और फैसलों से उन्हें बैकफुट पर धकेलते दिख रहे हैं.
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