भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक पद छोड़ने के फैसले ने एक बार फिर देश के सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है. महीनों से दबे इस राज से अब धीरे-धीरे पर्दा उठने लगा है. धनखड़ ने खुद एक कार्यक्रम के दौरान यह कहकर सबको चौंका दिया कि जब उन्होंने पद त्यागा था, तब वे बीमार नहीं थे. अब इस मामले में शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत की आने वाली किताब ने आग में घी डालने का काम किया है.
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"मैं बीमार नहीं था..." - जगदीप धनखड़ का बड़ा बयान
हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से जगदीप धनखड़ ने स्पष्ट किया, "मैंने जब कहा कि मैं त्याग रहा हूं, तो मैंने कभी यह नहीं कहा कि मैं बीमार हूं. मैंने बस यह कहा था कि मैं अपने स्वास्थ्य को अहमियत दे रहा हूं." हंसी-मजाक के लहजे में ही सही, लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वे डरे हुए थे. उन्होंने मजाकिया अंदाज में यहां तक कह दिया कि उन्हें 'दाढ़ी वालों' से डर लगता है, जिसे लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं.
संजय राउत की किताब में 'धनखड़ चैप्टर' का धमाका
शिवसेना (उद्धव गुट) के नेता संजय राउत ने दावा किया है कि उनकी किताब के अंग्रेजी संस्करण में एक विशेष अध्याय पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफे के घटनाक्रम पर आधारित है. राउत ने यह किताब तब लिखी थी जब वे जेल में बंद थे.
राउत के दावे के मुख्य बिंदु:
- संजय राउत का आरोप है कि धनखड़ को ED (प्रवर्तन निदेशालय) का डर दिखाकर इस्तीफा देने पर मजबूर किया गया था.
- विपक्ष अब इस मुद्दे को लेकर हमलावर है और जानना चाहता है कि क्या वाकई किसी जांच एजेंसी के दबाव में देश के इतने ऊंचे संवैधानिक पद से इस्तीफा लिया गया?
- राउत की किताब में इस पूरे घटनाक्रम के पीछे के 'अदृश्य' कारणों को उजागर करने का दावा किया गया है.
क्या वाकई कोई डर था?
हालांकि, जगदीप धनखड़ ने अपने डर वाली बात को काफी हल्के-फुल्के अंदाज में कहा था, लेकिन संजय राउत के खुलासे ने इसे एक गंभीर राजनीतिक मोड़ दे दिया है. अब देखना यह होगा कि जब यह किताब सार्वजनिक होगी, तो इसमें दिए गए तथ्यों में कितनी सच्चाई निकलती है. फिलहाल, इस 'दाढ़ी वाले डर' और 'ED के दबाव' वाली थ्योरी ने राजस्थान से लेकर दिल्ली तक की राजनीति को गरमा दिया है.
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