राजस्थान की राजधानी जयपुर से परंपराओं को तोड़ने और बेटियों की ताकत को दर्शाने वाली एक भावुक तस्वीर सामने आई है. आमतौर पर समाज में परिवार के मुखिया के निधन के बाद 'पगड़ी' की रस्म बेटों द्वारा निभाई जाती है, लेकिन 7 साल की मासूम भव्या चौधरी ने इस रस्म को निभाकर समाज को एक नया संदेश दिया है. भव्या अब अपने परिवार की आधिकारिक उत्तराधिकारी बन गई है. आइए विस्तार से जानते हैं इसकी पूरी कहानी.
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पिता और दादा के बाद अब भव्या पर जिम्मेदारी
भव्या चौधरी के परिवार में अब कोई पुरुष सदस्य नहीं बचा है. भव्या के सिर से पिता का साया तब उठ गया था जब वह महज 6 महीने की थी. उसके पिता हनुमान सहाय चौधरी राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल थे, जिनका 2019 में ड्यूटी के दौरान निधन हो गया था. हाल ही में भव्या के दादा रामराखा चौधरी का भी देहांत हो गया. परिवार में कोई भाई न होने के कारण सामाजिक परंपराओं के तहत मासूम भव्या को पगड़ी पहनाकर परिवार की जिम्मेदारी सौंपी गई.
पुलिस विभाग में तैनात मां बनीं ढाल
भव्या फिलहाल तीसरी कक्षा की छात्रा है और उसे शायद इस रस्म की पूरी गहराई का अंदाजा भी न हो, लेकिन पगड़ी पहनते समय उसके चेहरे की गंभीरता बहुत कुछ बयां कर रही थी. भव्या अब अपनी मां सीमा चौधरी और दादी हगमा देवी के साथ रहती है. उसकी मां सीमा चौधरी भी राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल हैं और फिलहाल जयपुर के साइबर पुलिस थाने में तैनात हैं.
समाज की बदलती सोच का प्रतीक
राजस्थान जैसे राज्य में जहां पगड़ी को सम्मान और उत्तराधिकार का प्रतीक माना जाता है, वहां एक बेटी का इस रस्म को निभाना समाज की बदलती सोच को दर्शाता है. भव्या की यह कहानी यह संदेश देती है कि जिम्मेदारी का कोई जेंडर नहीं होता और बेटियां भी परिवार की विरासत को आगे बढ़ाने में पूरी तरह सक्षम हैं. जयपुर के इस परिवार ने शोक की घड़ी में भी एक मिसाल पेश की है जो अब पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बनी हुई है.
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