गफरुद्दीन मेवाती जोगी और तगाराम भील कौन हैं, जिनको मिलने जा रहा है पद्म श्री अवर्ड, जानें इनकी कहानी

साल 2025 राजस्थान की लोक कला के लिए गौरवशाली क्षण लेकर आया है. अलवर के भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती जोगी और जैसलमेर के तगाराम भील को पद्म श्री सम्मान से नवाजा जाएगा. इन कलाकारों ने अभावों में रहकर भी विलुप्त होती लोक विधाओं को न केवल जिंदा रखा, बल्कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया है.

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आंचल गुप्ता

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Gafuruddin Mewati Jogi Bhapan: साल 2025 के पद्म श्री पुरस्कारों की घोषणा के साथ ही राजस्थान की लोक कला परंपरा को नई पहचान मिली है. इस साल राज्य के दो दिग्गज लोक कलाकारों, अलवर के गफरुद्दीन मेवाती जोगी और जैसलमेर के तगाराम भील को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म श्री के लिए चुना गया है. गफरुद्दीन मेवाती ने जहां 'भपंग' वादन और मेवाती लोक गीतों को लंदन पेरिस तक पहुंचाया, वहीं तगाराम भील ने मरुस्थल की विषम परिस्थितियों में भील समाज की सांस्कृतिक विरासत को सहेजे रखा.

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कौन हैं गफरुद्दीन मेवाती जोगी?

अलवर के गफरुद्दीन मेवाती जोगी वह नाम है जिन्होंने लोक संगीत को घर की चारदीवारी से निकालकर वैश्विक मंचों पर स्थापित किया. पिछले 60 सालों से वे मेवाती लोक संगीत की सेवा कर रहे हैं. वे देश के एकमात्र कलाकार माने जाते हैं जो 'पांडुन का कड़ा' (महाभारत आधारित 2500 दोहे) का ढाणी शैली में गायन करते हैं. उनकी सबसे बड़ी पहचान 'भपंग' वादन है, जो एक प्राचीन वाद्य यंत्र है. गफरुद्दीन बताते हैं कि उनके पूर्वज भी इसी कला से जुड़े थे. उन्होंने अपनी प्रस्तुति पेरिस, कनाडा और फ्रांस जैसे देशों के अलावा इंग्लैंड की महारानी के सामने भी दी है. उन्हें पहले संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है. गफरुद्दीन मेवाती की 8वीं पीढ़ी के वंशज शाहरुख खान भी इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.

भपंग: कमंडल से बना जादुई वाद्य यंत्र

गफरुद्दीन ने भपंग की बनावट के बारे में रोचक जानकारी दी. उन्होंने बताया कि यह एक 'तूबी' (सूखी लौकी) से बनता है, जिसे साधु लोग पानी पीने के लिए कमंडल की तरह उपयोग करते थे. इसके एक सिरे पर बकरे का चमड़ा मढ़ा जाता है और तार के जरिए अद्भुत ध्वनियां निकाली जाती हैं. मेवाती क्षेत्र में इसे भपंग, चौंड का या बगल बच्चू जैसे नामों से भी जाना जाता है.

कौन हैं तगाराम भील?

जैसलमेर के मूल सागर के निवासी तगाराम भील ने भील समाज की लुप्त होती लोक परंपराओं को जीवन भर सहेजा. रेगिस्तान की कठोर धूप और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी कला को मरने नहीं दिया. उनके गीतों और अभिव्यक्तियों में राजस्थान की सांस्कृतिक आत्मा बसती है. केंद्र सरकार ने उनकी इसी अटूट तपस्या को स्वीकार करते हुए उन्हें पद्म श्री से सम्मानित करने का निर्णय लिया है.

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