पायलट का पंजाब कनेक्शन, भाटी का 'मिजाज' और भजनलाल का साइलेंट दांव, राजस्थान में शुरू हुआ असली सियासी खेल!

शरत कुमार

• 06:00 PM • 09 Oct 2026

राजस्थान पंचायत चुनाव में सचिन पायलट, रविंद्र भाटी और नरेश मीणा जैसे युवा चेहरे अपनी साख और जनसमर्थन से नए समीकरण गढ़ रहे हैं. वहीं, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा बड़ी रैलियों के बजाय पर्दे के पीछे से जमीनी व्यूह रचना बनाकर बाजी अपने नाम करने में जुटे हैं.

Rajasthan Panchayat Election
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राजस्थान का सियासी पारा एक बार फिर चढ़ने लगा है. आने वाले स्थानीय और पंचायत चुनावों को लेकर प्रदेश की राजनीति में एक साथ कई नए समीकरण आकार ले रहे हैं. एक तरफ जहां कांग्रेस और बीजेपी अपने पुराने गढ़ बचाने में जुटी हैं, वहीं दूसरी ओर निर्दलीय और क्षेत्रीय युवा चेहरे स्थापित नेताओं के गणित को सीधा बिगाड़ने का माद्दा दिखा रहे हैं.

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सचिन पायलट: राजस्थान ही नहीं, पंजाब में भी बढ़ता कद

कांग्रेस के लिहाज से देखें तो सचिन पायलट पार्टी के लिए एक ऐसा एसेट साबित हो रहे हैं जिनकी साख जाति और क्षेत्र की बंदिशों से परे नजर आती है. हाल ही में पंजाब में बतौर प्रभारी उनकी सक्रियता और अमृतसर दौरे के दौरान उमड़ी जनमेदिनी ने यह साफ कर दिया है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बाद देश भर में उनकी एक अलग राजनीतिक अपील है. आम आदमी पार्टी के गढ़ पंजाब में भी पायलट की लोकप्रियता कांग्रेस को एक नया बढ़त दिला रही है.

रविंद्र सिंह भाटी: बाड़मेर के शिव से उठी भीड़ का सियासी मिजाज

बाड़मेर के शिव विधानसभा क्षेत्र से निकले युवा नेता रविंद्र सिंह भाटी की रैलियों में आ रहा जनसैलाब आज राज्य के राजनीतिक विश्लेषकों के लिए एक पहेली बना हुआ है. नागौर, मकराना और मोलासर जैसी जगहों पर आधी रात को भी भाटी को सुनने के लिए युवाओं का हुजूम उमड़ रहा है.

हालांकि, राजनीति केवल भीड़ से नहीं जीती जाती. जानकारों का मानना है कि इस समर्थन को वोटों में बदलने के लिए भाटी को एक स्पष्ट नीति और विजन के साथ आगे बढ़ना होगा. गरीब सवर्णों और किसानों के मुद्दों पर एक तार्किक स्टैंड लिए बिना इस जनसमर्थन को चुनावी सफलता में बदलना आसान नहीं होगा.

नरेश मीणा का बदला अंदाज और हाड़ौती के समीकरण

हाड़ौती अंचल में नरेश मीणा एक नए कलेवर में ढलते दिखाई दे रहे हैं. गांधी जयंती से शुरू हुआ उनका नया सियासी सफर ज्यादा अनुशासित और संयमित नजर आ रहा है. वे लगातार खाद-बीज की किल्लत और बिजली के मुद्दों को लेकर सरकार के साथ-साथ कृषि मंत्रालय को घेर रहे हैं. सियासी गलियारों में यह भी चर्चा तेज है कि नरेश मीणा आगामी चुनावों के सिलसिले में आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के संपर्क में हैं और पंचायत स्तर पर मजबूत बिसात बिछाने की तैयारी में जुटे हैं.

बेनीवाल का महिला वोट बैंक पर दांव और क्षेत्रीय दलों की गोलबंदी

राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के मुखिया हनुमान बेनीवाल इस बार रैलियों में वक्त गंवाने के बजाय सीधा रणनीतिक चक्रव्यूह रच रहे हैं. बीकानेर, बाड़मेर, नागौर, सीकर और झुंझुनू जैसे अपने पारंपरिक प्रभाव वाले क्षेत्रों में वे टिकट बंटवारे और बूथ मैनेजमेंट पर काम कर रहे हैं. वहीं उनकी पत्नी कनिका बेनीवाल ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के बीच लगातार सक्रिय हैं, जिससे आरएलपी को इस बार महिला वोटर्स का सीधा लाभ मिल सकता है.

दूसरी ओर, बहुजन समाज पार्टी (BSP) भी पूर्वी राजस्थान, धौलपुर और भरतपुर में अपने दलित-मुस्लिम समीकरण को साधने में जुटी है, जबकि बाप (BAP) पार्टी भी ग्रामीण इलाकों में अपनी जमीन मजबूत कर रही है.

भजनलाल शर्मा: पर्दे के पीछे से ‘चाणक्य’ वाली रणनीति

इन सब हंगामे के बीच मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा एक अलग रणनीति पर काम कर रहे हैं. वे बड़ी-बड़ी रैलियों के बजाय जिलों के मजबूत स्थानीय चेहरों को पार्टी से जोड़ने और जमीनी रिपोर्ट के आधार पर गणित बैठाने पर जोर दे रहे हैं. उदयपुर और मेवाड़ अंचल में देवास परियोजना और जनजातीय विकास कार्यों के जरिए वे सीधे जनता से संवाद स्थापित कर रहे हैं.

आगामी 10 से 12 अक्टूबर के बीच प्रत्याशियों के चयन के साथ ही प्रचार की असली जंग शुरू हो जाएगी. कांग्रेस जहां अपने पिछले प्रदर्शन को दोहराना चाहेगी, वहीं बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ अपना वर्चस्व साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाएगी. लेकिन इन दोनों राष्ट्रीय दलों के बीच भाटी, बेनीवाल और नरेश मीणा जैसे क्षेत्रीय ध्रुव किसकी बाजी बिगाड़ेंगे, यह देखने योग्य होगा.

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