साल 2025 ने राजस्थान की राजनीति को अच्छे-खासे झटके दिए. कहीं सत्ता बचाने की जंग चली तो कहीं दिग्गज नेता अपने ही घर में उलझे रहे. अब 2026 पर सबकी नजर है, क्योंकि इसी साल निकाय और पंचायत चुनाव होने हैं और यही चुनाव 2028 के विधानसभा रण की पटकथा भी लिखेंगे.
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सबसे पहले बात करते हैं मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा की. उन्हें अक्सर 'पर्ची से बने सीएम' कहकर घेरा गया, लेकिन 2025 में उन्होंने साबित कर दिया कि कुर्सी इतनी आसानी से नहीं जाती. भले ही अंता उपचुनाव में बीजेपी को करारी हार झेलनी पड़ी, लेकिन तमाम चर्चाओं और अंदरूनी खींचतान के बावजूद वे दिसंबर 2025 में अपने दो साल पूरे करने में सफल रहे. विरोधी चाहे जितना पर्ची बदलने की बात करते रहें, फिलहाल सत्ता उनके हाथ में ही है. अब असली इम्तिहान 2028 में होगा, जब जनता सीधे तौर पर उनके काम का हिसाब मांगेगी.
शीर्ष नेतृत्व से दूर नहीं रहीं वसुंधरा
बीजेपी की दूसरा बड़ा चेहरा हैं वसुंधरा राजे. 2025 उनके लिए आसान नहीं रहा. प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकातों की खबरें जरूर आईं, लेकिन इससे यह साबित नहीं हो पाया कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से उनकी दूरी कम हो गई है. अंता उपचुनाव में उनके गढ़ में मिली हार ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं. हालांकि वे लगातार मंदिरों के दर्शन, जनसंपर्क और दौरे करती दिख रही हैं, मगर पार्टी आलाकमान से उनकी ठंडी जंग अभी भी चर्चा में है.
पहले जैसा नहीं है अशोक गहलोत का ग्राफ
कांग्रेस के पाले में भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का ग्राफ अब पहले जैसा नहीं दिख रहा. वे कांग्रेस की बड़ी बैठकों से दूर हैं और सोशल मीडिया के जरिए ही अपनी आवाज रख रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि उनका सियासी असर धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है.
वहीं सचिन पायलट ने 2025 में अलग ही चाल चली. इस बार वे खुले टकराव से दूर रहे और “अहंकार त्याग” का संदेश देते हुए सभी नेताओं से मिलते नजर आए. माना जा रहा है कि वे किसी बड़े मौके की तलाश में हैं, ताकि सही समय पर राज्य की राजनीति में दमदार वापसी कर सकें.
दिल्ली में बढ़ा गोविंद सिंह डोटासरा का कद
इसी बीच गोविंद सिंह डोटासरा का कद दिल्ली में बढ़ा है. पार्टी संगठन को फिर से खड़ा करने में उनकी भूमिका अहम मानी जा रही है और कांग्रेस के भीतर उनका प्रभाव साफ नजर आने लगा है.
विपक्ष की नई ताकत के तौर पर हनुमान बेनीवाल और नरेश मीणा का नाम तेजी से उभरा है. हनुमान बेनीवाल की आरएलपी इस साल कांग्रेस से भी ज्यादा एक्टिव दिखी. सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा रद्द कराने का श्रेय भी काफी हद तक उन्हें मिला. दूसरी ओर नरेश मीणा ने अंता उपचुनाव में निर्दलीय लड़कर बीजेपी के बराबर वोट हासिल किए और यह दिखा दिया कि वे भविष्य में बड़ा खेल बिगाड़ सकते हैं.
अब बात 2026 की. यह साल बेहद अहम है क्योंकि इसी साल निकाय और पंचायत चुनाव होंगे. यही चुनाव बताएंगे कि नरेश मीणा और राजकुमार रोत जैसे नेता अपने समर्थकों को असली वोट में बदल पाते हैं या नहीं. साथ ही यह भी साफ होगा कि किरोड़ी लाल मीणा सरकार में रहते हुए अपनी बागी पहचान बचा पाते हैं या नहीं.
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