राजस्थान की चर्चित बाल साध्वी प्रेम बाईसा की रहस्यमयी मौत के बाद उनके पैतृक गांव में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया. इस सभा में न केवल बाड़मेर, बल्कि राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों से हजारों की संख्या में भक्त और साधु-संत पहुंचे. श्रद्धांजलि देने आए लोगों की आंखों में आंसू थे और दिलों में आक्रोश, विशेषकर उन लोगों के प्रति जो सोशल मीडिया पर साध्वी की मौत को लेकर तरह-तरह की 'थ्योरी' और भद्दे कमेंट्स कर रहे हैं.
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'बाप की गोद में गई बेटी की जान'- समर्थकों का फूटा गुस्सा
श्रद्धांजलि सभा में पहुंचे स्थानीय सरपंचों और प्रतिनिधियों ने उन लोगों को जमकर लताड़ा जो साध्वी के पिता वीरमनाथ जी पर सवाल उठा रहे हैं. समर्थकों ने कहा, 'जिस पिता की गोद में उसकी जवान बेटी के प्राण निकले हों, उस पर शक करना सबसे बड़ा पाप है. मर्यादा मत भूलिए, एक पिता के लिए इससे बड़ा दुख और क्या होगा कि उसे अपनी बेटी को समाधि देनी पड़ रही है. उन्होंने बताया कि बेटी के जाने के गम में वीरमनाथ जी ने अन्न-जल तक त्याग दिया था.
सोशल मीडिया ट्रोलर्स को चेतावनी
समाधि स्थल पर जुटे लोगों ने युवाओं और सोशल मीडिया यूजर्स से अपील की कि वे बिना तथ्यों के कमेंटबाजी न करें. उन्होंने कहा कि मामला अभी जांच के अधीन है और प्रशासन पर भरोसा रखना चाहिए. समर्थकों का मानना है कि जो लोग सोशल मीडिया पर भ्रामक प्रचार कर रहे हैं, वे असामाजिक तत्व हैं और वे एक साध्वी की पवित्र छवि को धूमिल करने की कोशिश कर रहे हैं.
बाल साध्वी नहीं, 'मां दुर्गा' की प्रतिमा थीं प्रेम बाईसा
श्रद्धांजलि सभा में पहुंचे लोगों ने प्रेम बाईसा को याद करते हुए कहा कि वे केवल एक कथावाचिका नहीं थीं, बल्कि साक्षात मां दुर्गा का रूप थीं. मात्र 22-23 साल की उम्र में उन्होंने जो नाम और सम्मान कमाया, वह बड़े-बड़े संतों के लिए भी मुमकिन नहीं होता. उन्हें पूरी गीता और भागवत कंठस्थ याद थी. वे जहां भी कथा करती थीं, वहां से मिलने वाला दान शिक्षा और समाज सेवा में लगा देती थीं.
'न्याय न मिला तो करेंगे आंदोलन'
सभा में मौजूद साधु-संतों ने एक प्रस्ताव पारित कर सरकार से निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की है. संतों का कहना है कि वे अभी संयम बरत रहे हैं और उन्हें पुलिस की जांच पर भरोसा है. लेकिन यदि जल्द ही विसरा रिपोर्ट और जांच के जरिए सच सामने नहीं आया, तो आने वाले दिनों में बड़ा आंदोलन किया जा सकता है.
गांव में पसरा सन्नाटा, हर आंख नम
कुंभलिया गांव और आसपास के क्षेत्रों में अभी भी शोक की लहर है. श्रद्धांजलि देने पहुंची महिलाओं ने बताया कि प्रेम बाईसा उनके लिए प्रेरणास्रोत थीं, जिन्होंने बेटियों को पढ़ने और सनातन धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया. गांव के लोगों का कहना है कि ऐसी बेटी बार-बार जन्म नहीं लेती और उनके जाने से इलाके में एक ऐसा खालीपन आ गया है जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा.
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