राजस्थान में छात्र राजनीति से निकलकर अपनी पहचान बनाने वाले नेता विनोद जाखड़ ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए जातिवाद और संविधान के मुद्दे पर तीखा हमला बोला है. जाखड़ ने न केवल दलितों और पिछड़ों के अधिकारों की वकालत की, बल्कि विरोधियों को चेतावनी देते हुए कहा कि अब समाज जाग चुका है और वह अपने वोट की ताकत को समझता है. उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रतिभा को दरकिनार कर केवल जाति के आधार पर राजनीति करने वाले दौर अब खत्म होने चाहिए.
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संविधान की ताकत ने बदला इतिहास
विनोद जाखड़ ने बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के योगदान को याद करते हुए कहा कि आज समाज जिस सम्मान के साथ मंचों पर बैठा है, वह सिर्फ संविधान की बदौलत है. उन्होंने उस दौर का जिक्र किया जब दलित समाज के लोगों को अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ता था. जाखड़ ने कहा कि एक समय था जब लोग परछाई तक से डरते थे, लेकिन आज संविधान ने सबको बराबरी का हक दिया है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि संविधान खतरे में आता है, तो समाज फिर से उसी अंधकारमय युग में धकेल दिया जाएगा. उन्होंने उन ताकतों पर भी निशाना साधा जो 400 सीटें जीतकर संविधान बदलने की बात कर रहे हैं.
वोट की ताकत और लोकतंत्र का सम्मान
लोकतंत्र में वोट के महत्व को रेखांकित करते हुए विनोद जाखड़ ने कहा कि डॉ. अंबेडकर ने ऐसा ऑपरेशन किया है कि अब राजा रानी के पेट से नहीं, बल्कि मत पेटी (वोट) से पैदा होता है. उन्होंने कहा कि चाहे कोई करोड़ों का मालिक हो या कोई साधारण दूध निकालने वाला किसान, सबके वोट की कीमत एक ही है. जाखड़ ने जनता से अपील की कि वे अपनी इस ताकत को पहचानें क्योंकि यही वह उंगली है जो तय करती है कि कौन अर्श पर रहेगा और कौन फर्श पर. उन्होंने साफ कहा कि अब वो समय बीत गया जब दारू की पेटियां बांटकर वोट लिए जाते थे, अब जनता अपने बच्चों के रोजगार और शिक्षा पर सवाल पूछेगी.
'सब्जी का हरा धनिया नहीं है दलित समाज'
जातिगत भेदभाव और राजनीतिक इस्तेमाल पर कड़ा प्रहार करते हुए विनोद जाखड़ ने एक बेहद मार्मिक उदाहरण दिया. उन्होंने कहा, 'हम सब्जी का हरा धनिया नहीं हैं कि चुनाव के समय हमें स्वाद बढ़ाने के लिए गले लगा लिया जाए और बाद में हमारे कपड़ों से बदबू आने लगे.' उन्होंने स्पष्ट किया कि समाज अब केवल इस्तेमाल होने के लिए तैयार नहीं है. जाखड़ ने भाईचारे का संदेश देते हुए कहा कि जब 36 कौम के लोग मिलकर रहेंगे तभी गांव और प्रदेश तरक्की करेगा. उन्होंने राजनीति से ऊपर उठकर सामाजिक एकता और सम्मान के साथ जीने पर जोर दिया.
शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार
अपने संबोधन के अंत में विनोद जाखड़ ने समाज को तरक्की का मूल मंत्र दिया. उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि भले ही चटनी-रोटी खाकर गुजारा करना पड़े या शरीर पर एक कपड़ा कम पहनना पड़े, लेकिन अपने बच्चों को शिक्षित जरूर बनाएं. उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जिस दिन समाज के बच्चे शिक्षित हो जाएंगे, वे अपने हक और अधिकारों की लड़ाई खुद लड़ने में सक्षम होंगे. जाखड़ ने जोर देकर कहा कि शिक्षा ही वह एकमात्र रास्ता है जिससे सदियों की जिल्लत को सम्मान में बदला जा सकता है.
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