मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए होने वाली परीक्षा NEET 2026 के परिणाम की चर्चा बूंदी के कापरेन में खूब है. वजह है यहां मेहनत-मजदूरी कर परिवार का पेट पालने वाली महिला का बेटा भी अब डॉक्टर बनने का सपना पूरा कर सकेगा. चूने और रंग से भरी बल्टी लेकर दीवारों पर पुताई करने वाले कंधों से अब बाल्टी कर रस्सी नहीं बल्कि स्टेथेस्कोप लटकेगा. अब चूने और रंग से भीगी हुई कमीज नहीं बल्कि डॉक्टर्स कोट (लैब कोट) होगा. कापरेन कस्बे के सूरज सुमन ने नीट-यूजी 2026 में 583 अंक, 99.1593559 पर्सेंटाइल, ओबीसी कैटेगरी रैंक 7800 और जनरल रैंक 16569 हासिल कर सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश का रास्ता बना लिया है. सूरज की ये सफलता महज परीक्षा पास कर लेने की नहीं बल्कि बल्कि संघर्ष, मेहनत और उम्मीदों की बड़ी जीत मानी जा रही है. ये खबर सुनते ही खुशी के मारे सूरज के मां की आंखें छलक गईं. बहन भी इमोशल हो गई.
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आर्थिक रूप से बेहद कमजोर परिवार में जन्मे सूरज के माता-पिता को क्या पता था कि यही आगे चलकर पीढ़ियों में बड़े बदलाव की इबारत लिखेंगे. सूरज का बचपन बड़े अभाव में बीता. जैसे बड़े हुए उनके कंधे पर परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ आ गया. इन चुनौतियों के बावजूद सूरज का हौसाला कम नहीं हुआ. वे हर अभाव में अपने लिए रास्ता बनाते हुए मेहनत और लगन से पढ़ाई करने लगे. छुटि्टयों में लोगों के घरों की पुताई कर पैसे जुटाते थे ताकि मां के कंधों का बोझ कुछ कम हो सके.
मां और बहन खेतों में करती हैं मजदूरी
घर चलाने और बेटे को पढ़ाने के लिए मां घीसी बाई खेतों में काम करने लगी. चूंकि पारिवारिक कारणों से मां बेटे और बेटी के साथ पति से अलग रहती हैं. आर्थिक समस्याएं बहन गरिमा के कॅरियर में भी बाधा बन गईं और वो पढ़ न सकी. आठवीं की पढ़ाई के बाद वो मां का हाथ बंटाने के लिए मजदूरी करने लगी. मां और बहन को मजदूरी करता देख सूरज के मन में अक्सर खयाल आता था कि क्यों न वो भी मजदूरी कर मां-बहन के कंधे का भार हल्का करे पर कुछ बेहतर करने के जुनूंन ने उसे रोका. उसके अंतरआत्मा ने कहा- आर्थिक तंगी और मजदूरी के जीवन से निकलना है तो कुछ बड़ा करना होगा. तभी समाज में सम्मान मिलेगा और पीढ़ियां भी बदलेंगी. नीट की परीक्षा पास करने के बाद सूरज का कहना है कि अब वो बहन गरिमा की आगे की पढ़ाई दोबारा शुरू कराएंगे.
सूरज को 10वीं-12वीं में मिले थे 80% से ज्यादा अंक
सूरज बचपन से ही मेधावी थे. इनकी इस मेधा शक्ति को परिवार ही नहीं पूरे कस्बे ने 10वीं और 12वीं में भी देखा था. सूरज ने 10 में 87 फीसदी और 12वीं में 85 फीसदी अंक हासिल किए थे. बायोलॉजी उसका पसंदीदा विषय था. वे बचपन से ही डॉक्टर बनने का सपना देख रहे थे, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी का खर्च उठा सके. इसी दौरान वह कोटा में एलन कोचिंग की जानकारी लेने पहुंचे. यहां उन्हें एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट और एलएन माहेश्वरी परमार्थ न्यास द्वारा संचालित 'शिक्षा संबल' कार्यक्रम के बारे में पता चला. प्रवेश परीक्षा में सफल होने के बाद उन्हें नीट की निशुल्क कोचिंग के साथ पूरी तरह निशुल्क भोजन और आवास की सुविधा भी दी गई. यही सहयोग उसके सपनों की उड़ान का सबसे मजबूत आधार बना.
'शिक्षा संबल' बना टर्निंग प्वाइंट- सूरज
सूरज का कहना है कि 'शिक्षा संबल' ने उसके जीवन को वास्तविक संबल दिया. यदि यह अवसर नहीं मिलता तो शायद वह कभी इतनी अच्छी सुविधाओं के साथ कोटा आकर मेडिकल की तैयारी करने की कल्पना भी नहीं कर पाता. पूरे साल उन्हें पढ़ाई के साथ रहने, खाने और हर जरूरत की बेहतर सुविधाएं मिलीं, जिससे वह पूरी तरह अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर पाए और अब उसका सबसे बड़ा सपना पूरा होने जा रहा है.
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