उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर अभी से बिसात बिछनी शुरू हो गई है. इंडिया गठबंधन के दो बड़े स्तंभ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच आगामी चुनावों को लेकर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. वरिष्ठ पत्रकार कुमार अभिषेक की रिपोर्ट के मुताबिक, सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने अपने कार्यकर्ताओं की एक अहम बैठक में कुछ ऐसा कह दिया है जिसने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है. अखिलेश यादव ने कार्यकर्ताओं से दोटूक कहा, "हमारे लिए जीत अहम है, सीट नहीं... सभी 403 विधानसभा सीटों पर तैयारी रखें." सपा मुखिया का यह एक वाक्य यह साफ संकेत दे रहा है कि वह सूबे में कांग्रेस के भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं.
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सपा और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व यानी राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव के बीच भले ही आपसी केमिस्ट्री अच्छी दिखाई देती हो, लेकिन जमीनी हकीकत और प्रादेशिक स्तर के नेताओं के बीच अविश्वास की खाई लगातार चौड़ी हो रही है. यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय, प्रदेश प्रभारी और पश्चिमी यूपी के कद्दावर नेता इमरान मसूद जैसे चेहरे कैमरे के सामने या कैमरे के पीछे समाजवादी पार्टी के साथ इस गठबंधन को लेकर पूरी तरह सहज नजर नहीं आ रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ, अखिलेश यादव इस बात से भी भली-भांति वाकिफ हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस अपने सहयोगियों को बदलने में देर नहीं लगाती. हाल ही में डीएमके का साथ छोड़कर दूसरी पार्टी से हाथ मिलाने जैसे घटनाक्रमों ने क्षेत्रीय दलों को सतर्क कर दिया है, जिसके चलते सपा नेतृत्व भी अब फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है.
कांग्रेस का 'मायावती कार्ड' और 'प्लान-बी'
इस सियासी असहजता के पीछे एक बड़ी वजह कांग्रेस का 'मायावती कार्ड' और 'प्लान-बी' भी है. कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश, खासकर पश्चिमी यूपी में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए छटपटा रही है. कांग्रेस रणनीतिकारों को मालूम है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का जनाधार उतना मजबूत नहीं है. ऐसे में कांग्रेस वहां दलित-मुस्लिम समीकरण साधने के लिए मायावती की बसपा या फिर चंद्रशेखर आजाद के साथ जाने की संभावनाएं तलाश रही है, जहां यह वोट बैंक मिलकर करीब 40 से 45 फीसदी बैठता है. हाल ही में कांग्रेस के दो बड़े दलित चेहरों का बिना बुलाए मायावती के दरवाजे पर दस्तक देना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. भले ही मायावती ने अभी कांग्रेस को कोई भाव न दिया हो, लेकिन कांग्रेस ने अखिलेश यादव को यह साफ संदेश दे दिया है कि उनके पास अन्य विकल्प भी मौजूद हैं.
कांग्रेस नेताओं की आक्रामक बयानबाजी
गठबंधन में दरार की एक और तत्कालीन और गंभीर वजह कांग्रेस नेताओं की आक्रामक बयानबाजी भी है. हाल ही में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय द्वारा कथित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ इस्तेमाल किए गए अपशब्दों और राहुल गांधी के तीखे हमलों ने अखिलेश यादव को बेहद असहज कर दिया है. अखिलेश यादव यूपी में एक ऐसी नपी-तुली राजनीति कर रहे हैं जहां वह प्रधानमंत्री मोदी पर व्यक्तिगत हमला करने के बजाय भारतीय जनता पार्टी की नीतियों और कानून व्यवस्था को घेरना चाहते हैं. अखिलेश को डर है कि कांग्रेस की इस अमर्यादित भाषा का सीधा नुकसान और एंटी-इंकंबेंसी का विपरीत असर समाजवादी पार्टी के कोर वोट बैंक पर भी पड़ सकता है. जानकारों का मानना है कि कांग्रेस जानबूझकर ऐसा माहौल बना रही है ताकि टिकटों के बंटवारे के वक्त सपा पर दबाव बनाया जा सके.
फिलहाल, 2027 के महामुकाबले में अभी वक्त है और दोनों पार्टियों के बीच आधिकारिक तौर पर सीटों के बंटवारे को लेकर कोई वार्ताकार तय नहीं हुआ है. चुनाव से चार-छह महीने पहले ही गठबंधन की वास्तविक तस्वीर साफ होगी, लेकिन मौजूदा हालात को देखकर यह साफ है कि दोनों दल एक-दूसरे की सियासी मजबूरी तो हैं, पर दिल अभी भी नहीं मिले हैं. अखिलेश यादव का सभी 403 सीटों पर तैयारी रखने का निर्देश देना कांग्रेस के लिए एक कड़ा अल्टीमेटम है कि सपा बैकफुट पर रहकर चुनाव नहीं लड़ेगी. अब देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले महीनों में यह प्रेशर पॉलिटिक्स गठबंधन को मजबूती देती है या फिर यूपी में 'यूपी के दो लड़कों' की यह राहें एक बार फिर जुदा हो जाती हैं.
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