Sambhal Namaz Controversy: संभल में मस्जिद के भीतर नमाज पढ़ने वालों की संख्या सीमित करने वाले मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कड़ा ऐतराज जताया है. मुनासिर खान याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सिद्धार्थ नंदन और जस्टिस अतुल श्रीधरन की डिवीजन बेंच ने प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यशैली पर ही सवाल उठा दिए. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इबादत पर इस तरह की पाबंदी लगाना उचित नहीं है. काेर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए और क्या क्या कहा चलिए जानते हैं इस खबर में...
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डीएम और एसपी को 'इस्तीफा या ट्रांसफर' की सलाह
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने संभल के जिलाधिकारी (DM) राजेंद्र पिनसिया और पुलिस अधीक्षक (SP) कुलदीप बिश्नोई को सीधे तौर पर निशाने पर लिया. बेंच ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि हर परिस्थिति में कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है. कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि "अगर एसपी और डीएम कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम नहीं हैं, तो उन्हें या तो अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए या फिर वहां से अपना ट्रांसफर मांग लेना चाहिए." कोर्ट ने प्रशासन को उसकी विफलताओं के लिए कड़ी चेतावनी दी है.
निजी संपत्ति पर पूजा के लिए अनुमति की जरूरत नहीं
अदालत ने सुनवाई के दौरान एक पुराने मामले का संदर्भ देते हुए साफ किया कि किसी भी निजी संपत्ति पर पूजा या इबादत करने के लिए प्रशासन से पहले से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है. कोर्ट ने बरेली के एक मामले का जिक्र किया जहां घर में नमाज पढ़ने पर पुलिस ने कार्रवाई की थी. हाई कोर्ट ने दोहराया कि राज्य का कर्तव्य हर हाल में नागरिकों के अधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना है, न कि इबादत पर रोक लगाना.
जमीन के मालिकाना हक पर फंसा पेंच
याचिकाकर्ता मुनासिर खान की दलील थी कि उन्हें गाटा संख्या 291 पर नमाज अदा करने से रोका जा रहा है. उनके वकील ने दावा किया कि उस स्थान पर मस्जिद है. हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से इस जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद बताया गया. सरकारी वकील ने कहा कि राजस्व अभिलेखों में यह जमीन मोहन सिंह और भुराज सिंह के नाम दर्ज है. फिलहाल प्रशासन ने वहां केवल 20 नमाजियों को ही नमाज की अनुमति दी थी. अब इस मामले में 16 मार्च को फ्रेश केस के तौर पर अगली सुनवाई होनी है.
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