उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या दौरे के दौरान समाजवादी पार्टी पर अब तक का सबसे बड़ा और तीखा हमला बोला है. अयोध्या के बीकापुर विधानसभा इलाके में एक जनसभा को संबोधित करते हुए सीएम योगी ने 23 साल पुराने एक बेहद संवेदनशील मामले को फिर से हवा दे दी है. मुख्यमंत्री ने सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी पर आरोप लगाया कि उन्होंने अयोध्या की पवित्र हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज पढ़वाने का 'पाप' किया था. सीएम योगी के इस बयान के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर आस्था और सांप्रदायिक पिच पर जंग तेज हो गई है.
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अखिलेश यादव के 'सॉफ्ट हिंदुत्व' पर योगी का सीधा वार
अयोध्या में हाल ही में हुए चढ़ावा चोरी कांड के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दूसरी बार यहां पहुंचे थे. हालांकि इस बार उनके निशाने पर सीधे तौर पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव रहे. दरअसल, पिछले कुछ समय से अखिलेश यादव लगातार सॉफ्ट हिंदुत्व का कार्ड खेल रहे हैं, चाहे वह शंकराचार्य की शरण में जाना हो, भगवान शिव का मंदिर बनवाना हो या राम मंदिर दर्शन की तारीखें तय करना हो. वह लगातार बीजेपी को आस्था और चंदे के सवाल पर घेर रहे हैं. इसी का पलटवार करते हुए सीएम योगी ने सपा के पुराने इतिहास को खंगाल डाला और सीधे अखिलेश यादव को चुनौती दे डाली कि क्या समाजवादी पार्टी या कांग्रेस कभी जामा मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ करवा पाएगी? अगर नहीं, तो हनुमानगढ़ी में नमाज पढ़वाने की कोशिश क्यों की गई थी.
अक्टूबर 2003 की वो कहानी, जब आमने-सामने आ गए थे अफसर
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस घटना का जिक्र किया, वह असल में अक्टूबर 2003 की है. अगस्त 2003 में मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे और उनके कार्यकाल के शुरुआती महीनों में ही 'सद्भावना' के नाम पर हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार और नमाज का एक बड़ा प्लान तैयार किया गया था. इस योजना के पीछे तत्कालीन लखनऊ जोन के आईजी वीएन राय का हाथ बताया जाता है, जिन्होंने हनुमानगढ़ी के सबसे बड़े महंत और गद्दीनशीं महंत ज्ञानदास को इसके लिए तैयार कर लिया था. तय यह हुआ था कि हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों और उससे सटे क्षेत्र में रोजा इफ्तार और नमाज का आयोजन किया जाएगा.
एसएसपी राजीव सबरवाल का वो फैसला और साधु-संतों का गुस्सा
जब साल 2003 में इस बात की तैयारी पूरी हो चुकी थी, तब तत्कालीन फैजाबाद (अब अयोध्या) के एसएसपी राजीव सबरवाल ने कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए इस पर पूरी तरह से रोक लगा दी. बताया जाता है कि तत्कालीन आईजी और एसएसपी के बीच इस मुद्दे पर तीखी बहस भी हुई थी, क्योंकि आईजी सीधे मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के संपर्क में थे. वहीं दूसरी तरफ, यह प्लान जैसे ही सामने आया तो अयोध्या के साधु-संत भड़क गए थे. महंत धर्मदास ने तो इस पूरे आयोजन के खिलाफ फैजाबाद की अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद कोर्ट ने इस पर स्टे दे दिया था.
सार्वजनिक तौर पर रुकी, लेकिन बंद कमरे में हुई थी नमाज
भले ही तत्कालीन एसएसपी और अदालती आदेश के बाद हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर सार्वजनिक रूप से नमाज को रोक दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद तत्कालीन सरकार के करीबी माने जाने वाले महंत ज्ञानदास के निजी कमरे में रोजा इफ्तार का आयोजन हुआ. उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी और वर्तमान भाजपा राज्यसभा सांसद बृजलाल ने भी कुछ समय पहले इस घटना की तस्दीक की थी कि हनुमानगढ़ी परिसर के अंदर महंत के कमरे में नमाज अदा की गई थी और रोजा इफ्तार हुआ था. तत्कालीन सांसद के रूप में योगी आदित्यनाथ ने भी तब खुद अयोध्या पहुंचकर हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों से इसका कड़ा विरोध किया था.
आने वाले दिनों में और गरमाएगी उत्तर प्रदेश की सियासत
अयोध्या में ट्रस्ट के कुछ सदस्यों के खिलाफ जांच की तलवार लटकने और एसआईटी की रिपोर्ट आने के बीच सीएम योगी का यह बयान बेहद अहम माना जा रहा है. चुनाव में भले ही अभी कुछ महीनों का वक्त बचा हो, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीतिक पिच अब पूरी तरह से सांप्रदायिक और ध्रुवीकरण की ओर मुड़ती दिख रही है. एक तरफ जहां अखिलेश यादव अपने सॉफ्ट हिंदुत्व के सहारे बीजेपी को घेरने की कोशिश में जुटे हैं, तो वहीं सीएम योगी आदित्यनाथ ने वक्फ, कब्रिस्तान की बाउंड्री और अब हनुमानगढ़ी में नमाज का मुद्दा उठाकर साफ कर दिया है कि वह विपक्ष के हर वार का आक्रामक हिंदुत्व से जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.
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