Charchit Chehra: कौन हैं आकृति चौधरी जिनपर लगा था NSA? अब नोएडा DM मेधा रूपम और इन लोगों को देना होगा 5 लाख का मुआवजा

न्यूज तक डेस्क

• 12:00 PM • 09 Sep 2026

Charchit Chehra Akriti Chaudhary: नोएडा की डीएम मेधा रूपम और सोशल एक्टिविस्ट आकृति चौधरी का मामला हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद चर्चा में है. आकृति पर NSA लगाए जाने से लेकर कोर्ट द्वारा 5 लाख रुपये के मुआवजे का आदेश देने तक, इस पूरे मामले में डीएम की भूमिका सवालों के घेरे में आई. जानिए कौन हैं आकृति चौधरी, क्या है पूरा मामला और कौन हैं मेधा रूपम.

Akriti Chaudhary Profile
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मेधा रूपम, ये  एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसके पास बचपन से सब कुछ रहा. एक प्रभावशाली परिवार, निशानेबाजी में सटीक निशाना लगाने का टैलेंट, पहले ही अटेम्ट में UPSC की सिविल सर्विसेज एक्जाम में ऑल इंडिया 10वीं रैंक हासिल करने की काबिलियत. लेकिन जिंदगी में हमेशा सब कुछ अच्छा-अच्छा नहीं होता. मेधा रूपम आज बड़ी अफसर बन चुकी हैं, लेकिन उनके हाथ से हुए एक सरकारी दस्तखत ने उन्हें ऐसी कानूनी और राजनीतिक जंग के चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां उनकी क्रेडिबिलिटी और करियर दोनों दांव पर लगे हैं. मेधा रूपम जिस फैमिली बैकग्राउंड से आती हैं, जिस पावरफुल पोजिशन पर बैठी हैं, ऐसे में उनके खिलाफ कोर्ट की कठोर टिप्पणी और सैलरी से 5 लाख काटने की सजा ने चर्चित चेहरा बना दिया है. 

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मेधा रूपम की कहानी में एक और लड़की की भी कहानी जुड़ती है. दो ऐसी लड़कियों की कहानी जिनके रास्ते कभी नहीं मिलते अगर बीच में व्यवस्था का घमंड न आता. एक तरफ हैं मेधा रूपम जो हैं दिल्ली से सटे नोएडा की पहली महिला डीएम. दूसरी तरफ 25 साल की एक आम लड़की सोशल एक्टिविस्ट आकृति चौधरी. आइए विस्तार से जानते हैं पूरी कहानी.

कौन हैं आकृति चौधरी?

आकृति चौधरी की कहानी व्यवस्था की क्रूरता और आम नागरिक के धैर्य की मिसाल बन चुकी है. पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर के रहने वाले एक मिडिल क्लास परिवार की बेटी आकृति ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से हिस्ट्री में मास्टर्स की पढ़ाई पूरी की और नेट भी क्वालिफाइड की. कानून और नागरिक अधिकारों की समझ रखने वाली आकृति हमेशा गरीबों और बेसहारा लोगों की आवाज बनने के लिए जानी जाती रहीं.

जब अप्रैल 2026 में नोएडा की सड़कों पर मजदूरों का गुस्सा फूटा, तो दोनों लड़कियों मेधा रूपम और आकृति की दुनिया आपस में टकरा गई. अप्रैल 2026 में जब नोएडा में करीब 40 हजार कर्मचारियों ने बेहतर वेतन के लिए आंदोलन शुरू किया, तो मजदूरों के दर्द को देखकर आकृति भी उनकी जायज मांगों का समर्थन करने मैदान में कूद पड़ीं. लेकिन प्रशासन ने आंदोलन को कुचलने के लिए 11 अप्रैल को आकृति को हिरासत में ले लिया और बाद में उनके खिलाफ दंगा भड़काने का केस दर्ज कर देश का सबसे खतरनाक कानून यानी NSA थोप दिया, जिसके कारण वे 5 महीनों तक ग्रेटर नोएडा की जेल में बंद रहीं. 18 जुलाई को जेल में ही उनका जन्मदिन बीता. 

आकृति के मामले में मेधा रूपम की कैसे हुई एंट्री?

सवाल उठना लाजिमी है कि धाराएं लगाने का काम तो पुलिस का होता है. इसमें डीएम मेधा रूपम कहां से आईं. नियम है NSA जैसा कड़ा कानून लगाने की अंतिम और सबसे बड़ी ताकत डीएम के पास होती है. एसएचओ से लेकर पुलिस कमिश्नर तक ये केस बनाते हैं कि अमुक व्यक्ति समाज या देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुका है और उसे जेल में रखना जरूरी है. पुलिस से ये फाइनल डीएम के अप्रूवल के लिए जाती है. नियम-कानून है कि डीएम का काम पुलिस की बात पर आंख मूंदकर भरोसा करना नहीं, बल्कि जज की तरह अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए खुद देखना होता है कि क्या वाकई उस आरोपी पर देश का सबसे क्रूर कानून लगाना सही है या नहीं. यहीं गलती कर गईं मेधा रूपम. 

आईएएस मेधा रूपम ने डीएम के तौर पर मिली एक्ट्रिम पावर का इस्तेमाल करते हुए आकृति पर NSA यानी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसे कड़े कानून का हंटर चला दिया जो देश के दुश्मनों पर चलता है. पुलिस प्रशासन के दबाव में आकर डीएम मेधा रूपम ने बिना ज्यादा सोचे-समझे पुलिस की फाइल पर दस्तखत कर दिए और आकृति पर देश का सबसे सख्त कानून यानी NSA थोप दिया. पुलिस की मिलीभगत में शामिल होकर 25 साल की एक निर्दोष छात्रा आकृति चौधरी को पांच महीने तक जेल की सलाखों के पीछे सिर्फ इसलिए सड़ाया क्योंकि वह मजदूरों के हक की बात कर रही थी.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लगाई फटकार!

जब यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा, तो जस्टिस अतुल श्रीधन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने मामले की फाइलें देखकर माथा पकड़ लिया. कोर्ट ने पाया कि जब नोएडा की सड़कों पर गाड़ियां जलाई जा रही थीं, तब आकृति पहले से ही पुलिस कस्टडी में थी. जजों ने पुलिस और प्रशासन की देशद्रोह की थ्योरी को सरासर मनगढ़ंत और फर्जी करार दिया. 

1949 में लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने किताब लिखी थी- '1984'. उन्होंने एक ऐसी डरावनी दुनिया की कल्पना की थी जहां सरकार आम नागरिकों की सोच, आजादी और बोलने पर सख्त पहरा बिठा देती है. इसे साहित्य की भाषा में 'ऑरवेलियन डिस्टोपिया' (Orwellian Dystopia) कहा जाता है. आकृति चौधरी का केस सुनते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जजों ने ऑरवेलियन डिस्टोपिया फ्रेज का इस्तेमाल करते हुए नोएडा डीएम मेधा रूपम को भयंकर रगड़ दिया. कोर्ट ने तुरंत आकृति पर से NSA हटाने का हुक्म दिया.

पहली बार आदेश सुनाया कि पीड़ित छात्रा को 5 लाख का जो मुआवजा दिया जाएगा, वो सरकारी फंड से नहीं बल्कि सीधे डीएम मेधा रूपम और संबंधित थानेदार की सैलरी से काटा जाएगा. आकृति चौधरी की तारीफ हो रही है कि एक आम लड़की ने, एक वीआईपी पिता की आईएएस बेटी के प्रशासनिक अहंकार को घुटनों पर ला दिया.

मेधा रूपम को लेकर क्यों इतनी चर्चा?

कोर्ट से किसी आईएएस, आईपीएस को झाड़ पड़ना कोई नई या अनोखी बात नहीं है लेकिन मेधा रूपम का नाम होने से ये मामला नेशनल हेडलाइन बनी है. इलाहाबाद हाई कोर्ट में जस्टिस अतुल श्रीधन और जस्टिस अचल सचदेव ने जैसे ही मेधा रूपम के छात्रा पर लगाए गए NSA को 'तानाशाही और मनगढ़ंत' बताया, वैसे ही दिल्ली से लेकर लखनऊ तक भूचाल आ गया. अगर मेधा कोई आम अफसर होतीं, तो शायद ये खबर जिला स्तर पर दब जाती. लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी होने के कारण विपक्ष की तेज-तर्रार सांसद महुआ मोइत्रा से लेकर सोशल मीडिया के लाखों लोगों ने उनके पिता के संवैधानिक पद को ही कटघरे में खड़ा कर दिया. 

लोग सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से टॉन्ट करते हुए लिख रहे हैं कि पिता देश में और बेटी नोएडा में लोकतंत्र का गला घोंट रही है. आज 5 लाख का जुर्माना शायद मेधा रूपम के लिए बड़ी बात न हो, लेकिन पिता और बेटी की क्रेडिटिबिलिटी पर लगने वाला बट्टे का नुकसान उससे कहीं ज्यादा नुकसान है. मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी होने के कारण उनके इस एक गलत फैसले की देशव्यापी आलोचना हो रही है.

कौन हैं मेधा रूपम?

मेधा रूपम की इस कहानी की शुरुआत होती है आगरा में ज्ञानेश कुमार के घर में जन्म लेने के साथ. ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस हुआ करते थे. तब ज्ञानेश कुमार किसी आम आईएएस जैसे थे. रिटायर होने तक भी इतने चर्चित नहीं थे. उनकी चर्चा तो तब होना शुरू हुई जब मुख्य चुनाव आयुक्त बने और राहुल गांधी के सीधे निशाने पर आ गए. केरल कैडर के होने के कारण ज्ञानेश कुमार की ज्यादातर पोस्टिंग केरल में हुई. 

मेधा रूपम का बचपन केरल में ब्यूरोक्रेसी के साए में बीता. मेधा की शुरुआती स्कूलिंग एर्नाकुलम के नेवल पब्लिक स्कूल और फिर तिरुवनंतपुरम के सेंट थॉमस स्कूल से हुई. बचपन से सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि स्पोर्ट्स में हाथ आजमाते हुए नेशनल लेवल की राइफल शूटर बनीं और केरल स्टेट शूटिंग चैंपियनशिप में तीन गोल्ड मेडल अपने नाम किए. हायर एजुकेशन के लिए दिल्ली आईं, जहां दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया. 

ज्ञानेश कुमार और मेधा रूपम का पूरा परिवार देश के सबसे पावरफुल ब्यूरोक्रेट्स का परिवार है.ऑल-अफसर फैमिली ट्री में कुल 7 बड़े अफसर शामिल हैं, जिनमें 4 आईएएस, 2 आईआरएस, 1 आईपीएस अधिकारी हैं. ज्ञानेश कुमार खुद आईएएस से रिटायर होकर देश के मुख्य चुनाव आयुक्त बने हैं. 

नोएडा का डीएम बनते ही आई चर्चा में!

पिता और परिवार की देखादेखी मेधा रूपम ने भी अफसर बनने की ठानी. डीयू से ग्रेजुएशन करते ही 2013 के सिविल सर्विसेज एक्जाम में बैठी और फर्स्ट अटेम्प्ट में ऑल इंडिया 10वीं रैंक हासिल करके आईएएस बन गईं. 2014 बैच की उत्तर प्रदेश कैडर की आईएएस अधिकारी के रूप में उन्होंने बरेली, हापुड़ और कासगंज जैसे जिलों में पोस्टिंग रही. तब तक मेधा रूपम की इतनी चर्चा नहीं थी.

चर्चा तो तब हुई जब उन्हें नोएडा यानी गौतम बुद्ध नगर जिले की डीएम बनाया गया. यहीं से शुरू हुई ये डिबेट कि ज्ञानेश कुमार की बेटी होने के कारण मेधा रूपम Privileged हुईं या उन्हें खुद आईएएस होने के बाद भी Disadvantage उठाना पड़ रहा है. ऐसे लोग हैं जिनकी आंखें फटी हैं कि मेधा रूपम को नोएडा की डीएम कैसे क्यों बनाया गया. इस विवाद का दूसरा सिरा ये है कि मेधा जब आगरा की डीएम हैं तो उनके पति मनीष बंसल दिल्ली-नोएडा के पास आगरा के डीएम भी क्यों और कैसे बने. 

मेधा रूपम क्यों बनी यूपी कैडर की अधिकारी?

आईएएस बनने के बाद मेधा की जिंदगी में एक नया मोड़ आया मसूरी की लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी में. वहीं सारे आईएएस ट्रेनिंग के लिए जुटते हैं. ट्रेनिंग के दौरान उनकी मुलाकात बैचमेट आईएएस अधिकारी मनीष बंसल से हुई. पंजाब के संगरूर के रहने वाले मनीष बंसल बैंक कर्मचारी के बेटे हैं. पढ़ने-लिखने में हमेशा इतने अच्छे रहे कि उन्होंने आईआईटी दिल्ली से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक और एमटेक की डबल डिग्री हासिल की. चाहते तो टेक वर्ल्ड में अपना शानदार करियर बना सकते थे लेकिन उन्होंने भी चुना आईएएस बनना. 2013 की सिविल सर्विसेज परीक्षा में ऑल इंडिया 53वीं रैंक लाकर 2014 बैच के यूपी कैडर के ही आईएएस अधिकारी बने. 

मनीष और मेधा रूपम की मुलाकात मसूरी में लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी (LBSNAA) में ट्रेनिंग के दौरान हुई थी. ट्रेनिंग के दौरान दोनों की दोस्ती हुई, जो जल्द ही प्यार में बदल गई. दोनों ने 2015 में शादी कर ली. दिलचस्प बात यह है कि शादी के बाद मेधा रूपम ने स्पाउस ग्राउंड यानी पति-पत्नी के एक ही राज्य में रहने का नियम के आधार पर अपना कैडर बदलकर उत्तर प्रदेश चुना ताकि वे दोनों साथ रह सकें. आज ये पावरफुल कपल यूपी ब्यूरोक्रेसी का सबसे हाई-प्रोफाइल पावर कपल माना जाता है. संभल के डीएम रहते हुए मनीष बंसल ने 40 साल से सूखी पड़ी सोत नदी को पुनर्जीवित किया था, जिसकी तारीफ खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में की थी.

हाई कोर्ट के फैसले ने लिखी नई नजीर!

हाई कोर्ट ने इस मामले में जो फैसला दिया, उसने देश की अफसरशाही के इतिहास में एक नई नजीर लिख दी है. जजों ने साफ कहा कि 'अफसरों ने देश के संविधान के प्रति अपनी वफादारी भूलकर, अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए तानाशाही रवैया अपना लिया है'. अदालत ने साफ कर दिया कि सरकारी तंत्र के इस घमंड की कीमत देश का टैक्सपेयर नहीं चुकाएगा. यही वजह है कि कोर्ट ने आदेश दिया कि आकृति को मिलने वाला 5 लाख का हर्जाना डीएम मेधा रूपम, SHO से लेकर पूरी जांच चेन में शामिल अधिकारियों की सैलरी से वसूल की जाएगी.

IAS Academy की ट्रेनिंग में टॉप करने वाली, अपने आईएएस पति मनीष बंसल के साथ वीआईपी लाइफ जीने वाली मेधा रूपम के शानदार सर्विस रिकॉर्ड पर कोर्ट का यह आदेश एक ऐसा काला धब्बा बन गया है, जो आने वाले समय में उनके हर प्रमोशन का रास्ता रोक देगा. यह कहानी सबक है हर उस अफसर के लिए जो समझता है कि सत्ता की कलम से किसी की भी जिंदगी मिटाई जा सकती है.

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