उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब-जब लोगों को लगता है कि मायावती अपना फैसला लॉक कर चुकी हैं तब-तब वो ऐसा फैसला लेती हैं जिसमें ये फर्क करना मुश्किल होता है कि फैसला आत्मघाती होगा या मास्टर स्ट्रोक? बीएसपी में मायावती के उत्तराधिकारी को लेकर सस्पेंस खत्म होने का नाम नहीं ले रहा. सस्पेंस बनाने या उसे खत्म करने का खेल कोई और नहीं, मायावती ही खेल रही हैं. पहले आकाश आनंद को 'अपरिपक्व' बताकर हटाया. फिर उनके छोटे भाई ईशान आनंद को भी रेस में लाकर बाहर फेंक दिया. कोई कुछ समझ पाए उससे पहले उन्होंने एक और मास्टरकार्ड चल दिया 22 साल की भतीजी दीपिका आनंद का.
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बीएसपी और मायावती के परिवार में जो हो रहा है उससे किसी के भी मन में सवाल उठेगा कि मायावती का मन बार-बार क्यों बदल रहा है? वो अपनी ही परछाई यानी भतीजों से क्यों डरने लगी हैं? और अब सबसे बड़ा और नया सवाल कि अपने भाइयों आकाश और ईशान आनंद का हश्र देखकर क्या लंदन से लॉ पढ़ रही दीपिका आनंद बुआ के कहने पर सब छोड़कर क्या लखनऊ आकर कांटों भरे सिंहासन पर बैठने को तैयार होंगी? इसी से बुआ की उत्तराधिकार की रेस में आईं दीपिका आनंद बनी हैं चर्चित चेहरा. आइए विस्तार से जानते हैं उनकी पूरी कहानी.
कौन हैं दीपिका आनंद?
दीपिका आनंद मायावती की सगी भतीजी, आनंद कुमार की बेटी हैं. निष्कासित भतीजों- आकाश आनंद और ईशान आनंद की सगी बहन हैं. उम्र केवल 22 साल है. लंदन में रहकर लॉ की डिग्री ले रही हैं. आज तक सक्रिय राजनीति और मीडिया लाइमलाइट से दीपिका दूर रहीं है. कहा जाता है कि दीपिका को बहनजी बहुत मानती हैं. उन्होंने लकी चॉर्म मानती हैं क्योंकि जिस साल 2007 में दीपिका का जन्म हुआ उसी साल बीएसपी ने पूरे बहुमत के साथ न केवल सरकार बनाई बल्कि पूरे 5 साल तक सरकार चलाई भी.
कैसे चर्चा में आई दीपिका?
दीपिका का नाम तब चर्चित हुआ जब खुद मायावती ने आकाश और ईशान के लिए बीएसपी के दरवाजे हमेशा के लिए बंद करते हुए ऐलान किया. आनंद कुमार के दोनों बेटों को पार्टी के किसी भी पद से हमेशा के लिए दूर रखने का 'अंतिम संकल्प' ले लिया. ट्विस्ट ये है कि बेटों के लिए नो-एंट्री का बोर्ड लगाने के बाद मायावती ने लंदन में पढ़ रही भतीजी दीपिका आनंद के लिए राजनीति के दरवाजे खोल दिए. कहा कि भविष्य में संगठन के काम में भाई आनंद कुमार की मदद के लिए दीपिका आनंद की वफादारी और योग्यता परखने के बाद उन्हें जिम्मेदारी दी जा सकती है. आकाश और ईशान का नाम लेते समय मायावती ने उनके पदों के नाम घोषित किए थे. फिलहाल दीपिका को कोई पद देने का ऐलान नहीं किया.
क्यों साइडलाइन हुए आकाश-ईशान?
कोई भी हैरान होगा कि जो बुआ कल तक आकाश आनंद पर अपनी विरासत सौंपने के लिए तैयार थीं, उन्होंने अचानक इतना कठोर कदम क्यों उठाया? पूरे विवाद के पीछे बीएसपी की अंदरूनी कलह और परिवारवाद का ठप्पा है. मायावती का आरोप है कि आकाश आनंद ने बहुजन मूवमेंट से ऊपर अपनी पारिवारिक वफादारियों को रखा. आकाश के ससुर और पूर्व सांसद अशोक सिद्धार्थ के दखल और पार्टी के भीतर गुटबाजी से मायावती इस कदर नाराज हुईं कि उन्होंने अशोक सिद्धार्थ को राजनीति से संन्यास लेने पर मजबूर कर दिया. इसके बाद भी बात नहीं बनी और मायावती ने आकाश आनंद को 'अपरिपक्व' बताते हुए नेशनल कोऑर्डिनेटर के पद से हटाकर पार्टी से पूरी तरह मुक्त कर दिया.
आकाश को सजा देने की मायावती ने ढेर सारी वजहें गिनाई लेकिन ईशान आनंद को न जाने क्यों 48 घंटे में चलता कर दिया. तर्क दिया कि जैसे ही उन्होंने ईशान को पद दिया तो विपक्षी पार्टियों और जातिवादी मीडिया ने बीएसपी पर नेपोटिज्म का आरोप लगाकर जहरीला और साजिशी दुष्प्रचार शुरू कर दिया. वो नहीं चाहतीं कि उनके किसी कदम से पार्टी पर परिवारवाद का कलंक लगे, जो बाबा साहेब और कांशीराम के सिद्धांतों के खिलाफ है. उन्होंने लॉजिक दिया कि बीएसपी को नेपोटिज्म से हमेशा के लिए मुक्त करने के लिए उन्होंने यह 'अंतिम संकल्प' लिया है कि भाई आनंद कुमार के दोनों बेटों आकाश और ईशान और आगे चलकर उनके बच्चों को भी संगठन या भविष्य की सरकार में कोई राजनीतिक लाभ का पद नहीं दिया जाएगा.
अब इनके बच्चों के शादीशुदा होने पर मुझे काफी कुछ झेलना पड़ रहा है, लेकिन मैं किसी के भी मोह में न पड़कर पार्टी को कोई नुकसान नहीं पहुंचने दूंगी.
आनंद कुमार पर भरोसा बरकरार!
मायावती ने अपने भतीजों को भले ही बेदखल कर दिया हो, लेकिन अपने सबसे भरोसेमंद भाई आनंद कुमार को लेकर उनका रुख बेहद भावुक और रणनीतिक है. मायावती ने साफ कहा है कि एक महिला होने के नाते सुरक्षा और संगठनात्मक जिम्मेदारियों के लिए उन्हें अपने भाई आनंद कुमार की जरूरत हमेशा रहती है. लेकिन चूंकि अकेले आनंद कुमार पर काम का भारी बोझ है, इसलिए भविष्य में उनकी मदद के लिए उनकी बेटी दीपिका आनंद की ईमानदारी, वफादारी और योग्यता को देखते हुए उन्हें जिम्मेदारी दी जा सकती है. हालांकि मायावती ने एक बैकअप प्लान भी रखा है- अगर दीपिका राजनीति में नहीं आना चाहतीं, तो आनंद कुमार दलित समाज के ही किसी समर्पित 'मिशनरी कार्यकर्ता' को यह काम सौंपेंगे, लेकिन बेटों को कोई पावर नहीं मिलेगी.
आनंद कुमार मायावती के सबसे छोटे और इकलौते ऐसे भाई हैं जिन्होंने हर मुश्किल दौर में मायावती का साथ निभाया, जिसके चलते वह मायावती के लिए indispensable बन चुके हैं. मायावती ने कहा कि अविवाहित महिला नेता होने के नाते उन्हें सुरक्षा, निजी देखभाल और पार्टी के गोपनीय वित्तीय व संगठनात्मक प्रबंधन के लिए केवल अपने भाई आनंद कुमार पर अटूट भरोसा है. यही वजह है कि दोनों भतीजों आकाश और ईशान को पूरी तरह बाहर करने के बावजूद उन्होंने आनंद कुमार को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद पर बरकरार रखा. उनकी मदद के लिए भविष्य में केवल उनकी बेटी दीपिका आनंद का विकल्प खुला छोड़ा है. अब तक आकाश आनंद और ईशान आनंद को मायावती के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा था लेकिन दीपिका आनंद का नाम लेते हुए मायावती ने ये इशारा कर दिया कि अगर वो आएंगी तो पिता आनंद कुमार की जगह भरने के लिए.
आनंद कुमार को क्यों साथ रखती है मायावती?
मायावती ने अपने इस भावुक और बेहद ईमानदार बयान से साफ कर दिया है कि उनका यह फैसला किसी राजनीतिक स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि उनकी निजी जिंदगी की मजबूरियों से जुड़ा है. उन्होंने कहा, 'यदि मैं लड़की नहीं होती, तो भाई-बहनों में से किसी को भी अपने साथ नहीं रखती. मेरे अविवाहित होने के नाते, मुझे मजबूरी में अपने छोटे भाई आनंद कुमार को साथ रखना पड़ा, जो पिछले कई सालों से न सिर्फ मेरी सुरक्षा और निजी देखभाल की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, बल्कि पार्टी के अति-महत्वपूर्ण और गोपनीय संगठनात्मक कार्यों को भी पूरी ईमानदारी से निभा रहे हैं.
मायावती के इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने आनंद कुमार को किसी राजनीतिक 'परिवारवाद' के तहत आगे नहीं बढ़ाया, बल्कि एक अकेले संघर्ष कर रही महिला नेता के रूप में अपनी निजी सुरक्षा और पार्टी की निजता बनाए रखने के लिए उन्हें अपनी सबसे मजबूत बैसाखी बनाया.
मायावती की आखिरी उम्मीद दीपिका?
मायावती मानती हैं कि भाई आनंद कुमार की छाया और उनके बच्चों की वफादारी के बिना बीएसपी की कमान ऐसे हाथों में जा सकती है जो कांशीराम के मूवमेंट के बजाय पार्टी को कॉर्पोरेट कंपनी की तरह चलाएं, इसलिए नो-नेपोटिज्म की सख्त पॉलिसी अपनाई है. दीपिका भी हैं तो नेपो किड ही हैं लेकिन न जाने अपनी नो-नेपोटिज्म पॉलिसी के किस क्लॉज की तरह उन्हें कमांड देने के लिए शॉर्ट लिस्ट किया है. परिवार में से किसी को बीएसपी की कमान देने के लिए मायावती के पास दीपिका अब आखिरी उम्मीद भी हैं और आखिरी कैंडिडेट भी.
बीएसपी के भीतर चल रहे इस 'ग्रेट रीबूट' की असली वजह साल 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव है. मायावती ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि बीएसपी 2027 का चुनाव बिना किसी गठबंधन के अकेले लड़ेगी. लगातार गिरते जनाधार और दलित वोटबैंक में हो रही सेंधमारी से परेशान मायावती अपनी पार्टी को परिवारवाद के कलंक से पूरी तरह मुक्त करना चाहती हैं, जो विपक्ष का सबसे बड़ा हथियार था. युवाओं (खासकर Gen Z) और महिलाओं को आकर्षित करने के लिए एक बिल्कुल साफ-सुथरी और नई लीडरशिप लाइन तैयार कर रही हैं. ये किसी के भी समझ से परेशान हैं आकाश, ईशान में क्या खूबियां या खराबियां थी कि मायावती ने चुनकर छांट दिया. अब न जाने किस काबिलियत से उन्हें दीपिका में बीएसपी का दीपक दिख रहा है.
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