Charchit Chehra: मायावती ने फिर क्यों याद किए अपने 'चाणक्य' सतीश चंद्र मिश्रा? 2027 से पहले कमबैक के पीछे क्या है बड़ी रणनीति

रूपक प्रियदर्शी

• 12:08 PM • 20 Aug 2026

Satish Chandra Mishra Profile: मायावती ने 2027 यूपी विधानसभा चुनाव से पहले सतीश चंद्र मिश्रा को फिर बड़ी जिम्मेदारी दी है. BSP के राष्ट्रीय महासचिव रहे मिश्रा को चुनाव आयोग और लीगल विंग का मुख्य प्रभारी बनाया गया है. जानिए मायावती के इस फैसले के पीछे की रणनीति, सतीश मिश्रा का राजनीतिक सफर और 2027 विधानसभा चुनाव में पहले मायावती के फैसले की क्यों हो रही इतनी चर्चा.

Satish Chandra Mishra
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी किसी किंगमेकर या संकटमोचक की बात होती है, तो एक नाम सबसे ऊपर उभरकर आता है, सतीश चंद्र मिश्रा. जिस बहुजन समाज पार्टी की पहचान कभी सवर्ण विरोधी नारों से शुरू हुई थी, उसी हाथी की पीठ पर बैठकर एक ब्राह्मण नेता ने दो दशकों तक यूपी की सत्ता की दिशा तय की. पिछले कुछ दिनों से अटकलें थीं कि सतीश चंद्र मिश्रा का दौर खत्म हो गया है. मायावती ने सबसे पुराने वफादार  को किनारे लगा दिया है.

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लेकिन हमेशा चौंकाने वाली राजनीति करने वाली मायावती ने फिर चौंकाया है. उनके फैसले ने तमाम अटकलों पर फुल स्टॉप लगा दिया है. चर्चित चेहरा के इस खास एपिसोड में आज जानेंगे बीएसपी सुप्रीमो मायावती के उस चाणक्य सतीश चंद्र मिश्रा की कहानी, जिसने बहुजन को सर्वजन बनाया, जो बार-बार साइडलाइन हुआ लेकिन हर बार और ताकतवर होकर उभरा. 

लॉ की पढ़ाई और वकील बनकर जमाया धाक!

सतीश चंद्र मिश्रा को भी राजनीति में आना नहीं था. न फैमिली बैकग्राउंड था, न करियर एंबिशन लेकिन हालात सतीश चंद्र मिश्रा को न केवल राजनीति में लाई बल्कि धाकड़ भी बनाया. 9 नवंबर 1953 को कानपुर के जिस परिवार में जन्म हुआ वो तो कोर्ट-कचहरी की दुनिया था. पिता जस्टिस त्रिवेणी सहाय मिश्रा गुवाहाटी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे. फैमिली प्रोफेशन की तरह सतीश मिश्रा ने भी लॉ की पढ़ाई की. लखनऊ यूनिवर्सिटी से वकालत की डिग्री लेने के बाद सतीश मिश्रा फुल टाइम वकील बने और धाक जमाते गए. 

सतीश चंद्र मिश्रा की राजनीतिक एंट्री!

मई 2002 में जब मायावती बीजेपी के समर्थन से तीसरी बार यूपी की सीएम बनीं, तो यूपी की राजनीति पलट रही थी. तीसरे कार्यकाल तक मायावती कई तरह के कानूनी विवादों से घिरी हुई थीं. उन्हें ऐसे एक मजबूत और अचूक कानूनी ढाल की जरूरत थी जो उन्हें कोर्ट-कचहरी के पचड़ों से बाहर निकाले. उसी खोज के दौरान उनकी नजर लखनऊ के दिग्गज और ब्राह्मण वकील सतीश चंद्र मिश्रा पर पड़ी. 

तब मायावती दलितों की मसीहा की राजनीति कर रही थीं. ब्राह्मण समेत सवर्णों से लड़कर ही उन्होंने बीएसपी को दलितों की मजबूत पार्टी बनाई. मायावती का हैरान करने वाला फैसला था जब उन्होंने एक ब्राह्मण सतीश चंद्र मिश्रा को न केवल उत्तर प्रदेश का एडवोकेट जनरल(Advocate General) नियुक्त किया बल्कि कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दे दिया. किसी इंटरव्यू में सतीश मिश्रा ने जिक्र किया कि जब मायावती ने उन्हें पद ऑफर किया, तो उन्होंने कहा था कि आप मुझे नहीं जानतीं, मैं एक ब्राह्मण हूं. मायावती ने मुस्कुराते हुए कहा था कि ये सिर्फ एक गलतफहमी है कि मैं ब्राह्मणों या सवर्णों के खिलाफ हूं. 

उस एक नियुक्ति ने आगे चलकर न केवल सतीश चंद्र मिश्रा की जिंदगी बदली बल्कि मायावती की राजनीति भी स्थाई रूप से बदल दी. सतीश मिश्रा ने न केवल बहनजी को ताज कॉरिडोर जैसे लीगल झंझटों में बड़ी राहत दिलाई, बल्कि गहरा भरोसा हासिल करते रहे. भरोसा और समझ इतना गहराता गया कि मायावती सतीश मिश्रा को राजनीति में ले आईं. 

2004 से राजनीति में एक्टिव हुए सतीश!

अगस्त 2003 में मायावती की सरकार गिर गई और मुलायम सिंह यादव नए मुख्यमंत्री बन गए. सतीश मिश्रा ने नैतिकता के आधार पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने कहा कि, 'बहनजी से मुलाकात हुई तो मैंने महाधिवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया. वापस अपनी प्राइवेट वकालत और कोर्टरूम की दुनिया में लौट रहा हूं.' मायावती ने मुस्कुराते हुए ऐसा जवाब दिया जिसने सतीश मिश्रा की पूरी जिंदगी का रुख बदल दिया. कहा-मिश्रा जी, मुझे आपकी वकालत का इस्तीफा नहीं चाहिए. मुझे तो आपका पूरा समय चाहिए. मैं चाहती हूं कि आप अपनी वकालत का काला कोट हमेशा के लिए उतार दें और बीएसपी में शामिल हो जाएं. 

बहनजी का कहा टाल नहीं सके और 2004 में सतीश मिश्रा वकालत छोड़कर पूरी तरह राजनीति में कूद गए. मायावती ने राष्ट्रीय महासचिव बनाकर बीएसपी का नंबर 2 बना दिया. नए रोल में सतीश मिश्रा जुट गए मायावती के लिए सर्वजन सोशल इंजीनियरिंग की कहानी लिखने में. 

BSP को कैसे बदला सतीश चंद्र मिश्रा ने?

बहुजन समाज पार्टी BSP, जिसकी बुनियाद  कांशीराम ने शोषित, वंचित और पिछड़ों को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने के लिए रखी थी. उस मिशन को विस्तार दिया मायावती ने लेकिन बीएसपी का चाल चरित्र चेहरा बदलने का क्रेडिट सतीश चंद्र मिश्रा को गया. एक ब्राह्मण सतीश चंद्र मिश्रा का नंबर-2 बनना भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी टर्न अराउंड स्टोरी है. दलित-दलित करने वाली पार्टी में एक सवर्ण नेता ने न सिर्फ अपनी जगह बनाई, बल्कि पार्टी के आंतरिक समीकरणों को पूरी तरह बदल कर रख दिया. 

मायावती को समझाने में समझ रहे कि केवल दलित वोटों के दम पर पूर्ण बहुमत पाना नामुमकिन है. मायावती से सिग्नल मिलने पर सतीश मिश्रा ने बीएसपी में वो ट्रांसफॉर्मेशन किया जो किसी पार्टी में किसी नेता ने नहीं किया. सतीश चंद्र मिश्रा ने बीएसपी की विचारधारा भी बदली, वोट बैंक का विस्तार भी किया. सोशल इंजीनियरिंग का तड़का लगाते हुए नारा दिया- हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है. 

बहुजन से सर्वजन की विचारधारा

सतीश मिश्रा ने पूरे उत्तर प्रदेश में घूम-घूमकर दलित पार्टी के ब्राह्मण सम्मेलन किए. पार्टी की मूल विचारधारा बहुजन से बदलकर सर्वजन यानी सबका साथ की ओर मुड़ गई. उन्होंने मायावती को पूर्ण बहुमत से राजपाट दिलाने के लिए दलित-ब्राह्मण का एक ऐसा अभेद्य किला तैयार किया, जिसने 2007 में पहली बार करिश्मा कर दिखाया. 2007 में मायावती ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. इस एक मास्टरस्ट्रोक ने साबित किया कि सतीश चंद्र मिश्रा पर खेला गया दांव गलत नहीं था. 

टिकटों के बंटवारे के समीकरण पूरी तरह बदल गए. 2007 के चुनाव में बीएसपी ने रिकॉर्ड संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया. नतीजा ये हुआ कि 62 ब्राह्मण विधायक जीतकर आए. सरकार बनने के बाद भी सतीश मिश्रा के प्रभाव से शासन और प्रशासन में बड़े पदों पर ब्राह्मण अधिकारियों और चेहरों को प्रमुखता मिली जिसने बीएसपी की दलित-ओनली इमेज को पूरी तरह बदल दिया. हालांकि ये वन टाइम मास्टरस्ट्रोक से आगे नहीं बढ़ पाया. 

जब सतीश मिश्रा बन गए थे पार्टी के पावर सेंटर!

सतीश मिश्रा ने पार्टी के आंतरिक समीकरणों को पूरी तरह हिलाया. बीएसपी एक ऐसी पार्टी थी जहां नेता आंदोलन से तपकर, गरीबी और संघर्ष झेलकर बड़े पद पर पहुंचते थे लेकिन सतीश मिश्रा सीधे एडवोकेट जनरल के पद से आकर सीधे मायावती के बगल में बैठ गए. इससे कैडर के पुराने नेताओं में अंदरूनी असंतोष पैदा हुआ. 

सतीश मिश्रा के आने के बाद पार्टी में मायावती के बाद केवल उन्हीं की बात सुनी जाने लगी. मायावती के अटूट विश्वास के आगे किसी की नहीं चली. समय के साथ नसीमुद्दीन सिद्दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्य, बाबू सिंह कुशवाहा जैसे बड़े ओबीसी, मुस्लिम चेहरे पार्टी से बाहर होते गए, और पूरी पार्टी का पावर सेंटर सतीश मिश्रा के इर्द-गिर्द सिमट गया. दलित कैडर ने भी उन्हें अपना लिया क्योंकि उसे दिखा कि सतीश मिश्रा ने जो किया वो कोई नहीं कर पाया. 

BSP का बुरा दौर लेकिन मायावती का सतीश मिश्रा का बरकरार भरोसा

2007 से 2012 तक बीएसपी और मायावती और सतीश चंद्र मिश्रा की राजनीति पीक पर रही लेकिन एक बार आजमाया हुआ फॉर्मूला बार-बार नहीं चलता. 2012 में मायावती की शिकस्त हो गई. सरकार समाजवादी पार्टी की बन गई. वहीं से बीएसपी और मायावती की राजनीति का बुरा दौर शुरू हो गया. 

सरकार जाने के बाद, पार्टी में सतीश चंद्र मिश्रा के ग्राफ में कई उतार-चढ़ाव आए. 2014, 2017, 2019...जब-जब बीएसपी की हार हुई तब आवाज उठी कि ब्राह्मण कार्ड अब काम नहीं कर रहा है. पार्टी को फिर से अपने मूल दलित-मुस्लिम वोटबैंक पर लौटना चाहिए. हद तो तब हो गई जब 2022 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी सिर्फ 1 सीट पर सिमट गई. फिर भी मिश्रा जी ने मायावती का भरोसा नहीं खोया. वो साइलेंट, इनविजिबल होते हुए बीएसपी के थिंक-टैंक और सबसे वफादार बने रहे. 

हालांकि इस दौर में मायावती ने एक और चाल चली. भतीजे आकाश आनंद अचानक पार्टी का चेहरा बनने लगे. सतीश मिश्रा दिखना बंद हो गए. 6 दिन पहले जब उनके भांजे अंटू मिश्रा को पार्टी से निकाला गया, जिससे लगा कि सतीश मिश्रा का दौर खत्म हो गया लेकिन मायावती ने कुछ बचा रखा था जिसकी किसी को भनक नहीं थी. 

सतीश मिश्रा का जबरदस्त 'कमबैक'!

सतीश मिश्रा 'कमबैक' यानी वापसी के सबसे बड़े उस्ताद निकले. मायावती को पार्टी के राष्ट्रीय दर्जे को बचाने, कानूनी मुकदमों और चुनाव आयोग के तकनीकी दांव-पेंचों को संभालने के लिए सतीश मिश्रा से बेहतर कोई नहीं मिला. यही वजह है कि मायावती ने उन्हें चुनाव आयोग और लीगल विंग का मुख्य प्रभारी बनाकर फिर से मुख्यधारा में ला दिया. सतीश मिश्रा की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) है- उनकी कानूनी समझ, जातीय समीकरणों को साधने का हुनर और मायावती का उन पर दो दशकों का अटूट भरोसा. बीएसपी एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है. सतीश चंद्र मिश्रा की सबसे बड़ी ताकत यह है कि पार्टी उन्हें चाहकर भी नजरअंदाज नहीं कर पाती.

BSP के पास कोई ना कोई सांसद ना कोई विधायक

मायावती की राजनीति इस समय अपने इतिहास के सबसे कठिन और अस्तित्व के संकट से गुजर रही है. कभी देश की तीसरी सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी और उत्तर प्रदेश की सत्ता पर राज करने वाली पार्टी आज चुनावी मैदान से धीरे-धीरे बाहर हो रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी का खाता तक नहीं खुला. पहला मौका है जब संसद के दोनों सदनों में पार्टी के सांसद नहीं हैं. यूपी के एकमात्र विधायक की भी मौत हो चुकी है. 2007 में जिस पार्टी के पास 30% से अधिक वोट शेयर था, वह 2024 के लोकसभा चुनाव में गिरकर महज 9.3% रह गया. इस बीच पार्टी का पारंपरिक 'जाटव दलित' वोटबैंक भी अब पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहा. चंद्रशेखर आजाद (आजाद समाज पार्टी), समाजवादी पार्टी और बीजेपी ने बीएसपी के कोर वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा दी है.

मायावती की कार्यशैली और रणनीतियों ने ही पार्टी को इस मोड़ पर खड़ा किया है. मायावती ने पिछले कुछ सालों से रैलियां और जमीनी आंदोलन बेहद सीमित कर दिए. किसी से अलायंस करना बंद कर दिया. पार्टी केवल सोशल मीडिया बयानों और प्रेस रिलीज तक सीमित होकर रह गई. मायावती पर लगातार बीजेपी की 'बी-टीम' होने का नैरेटिव सेट किया गया. ये आरोप भी लगे कि केंद्रीय एजेंसियों के डर से मायावती आक्रामक राजनीति नहीं कर रहीं, जिससे मुस्लिम और युवा वोटर पूरी तरह छिटक गए. 

2027 के चुनाव के लिए BSP का मास्टरस्ट्रोक!

ये भी मायावती का एक प्रयोग ही है कि उन्होंने भतीजे आकाश आनंद को 'चीफ नेशनल कोऑर्डिनेटर' बनाकर जमीन पर युवाओं को जोड़ने की जिम्मेदारी दी गई है, वहीं दूसरी तरफ पर्दे के पीछे की रणनीतिक, कानूनी और प्रशासनिक कमान सतीश मिश्रा को सौंपी गई है. यह बीएसपी की 'युवा जोश और तजुर्बे' की नई जुगलबंदी है, जिसके सहारे मायावती 2027 के विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करने की कोशिश कर रही हैं. अब देखना यह है कि 'अनुभव और युवा जोश' की यह जुगलबंदी 2027 में डूबती हुई बसपा की नैया पार लगा पाती है या नहीं.

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