बरसों तक बीजेपी के मंच पर सिकंदर बख्त, आरिफ बेग, शाहनवाज हुसैन और मुख्तार अब्बास नकवी जैसे चेहरे चमकते लेकिन वक्त के साथ धीरे-धीरे ये सारे चेहरे गायब होते गए. मान लिया गया कि नए दौर की बीजेपी में मुस्लिम नेताओं का दौर खत्म हो गया. लेकिन अब कहानी में एक बार फिर ट्विस्ट आया है. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर की कुर्सी से एक शख्स उठता है और सीधे देश की सबसे बड़ी पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बन जाता है. यह शख्स कोई और नहीं बल्कि प्रोफेसर तारिक मंसूर है.
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ये आज की बीजेपी की वो ब्रैंड-पॉलिटिक्स है, जिसने देश के पूरे राजनीतिक व्याकरण को बदल दिया. बीजेपी ने साबित कर दिया कि वो बिना किसी मुस्लिम वोट बैंक की परवाह किए, बिना किसी मुस्लिम तुष्टिकरण के, अपने दम पर प्रचंड बहुमत की सरकार बना सकती है. लेकिन, राजनीति की इस सबसे बड़ी हकीकत के पीछे एक और गहरा रहस्य छिपा है. जो पार्टी बिना मुस्लिम सांसदों के सरकार चला लेती है, उसे समय-समय पर मुस्लिम चेहरों की जरूरत तो पड़ती है. आखिर क्यों कट्टर हिंदुत्व के इस दौर में भी, बीजेपी में मुस्लिम नाम चमक उठते हैं?
आज ये चर्चा इसलिए क्योंकि चर्चित चेहरा बने हैं प्रोफेसर डॉक्टर तारिक मंसूर और कुंवर बासित अली. नए बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन के लिए नई टीम बन गई है. बीजेपी ने पुरानी टीम में बड़ा बदलाव करते हुए उत्तर प्रदेश के दो मुस्लिम चेहरों को बड़े पदों पर बिठाया है. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के पूर्व वाइस चांसलर प्रोफेसर तारिक मंसूर को उपाध्यक्ष पद पर बरकरार रखा है. मेरठ के नौजवान अग्रेसिव नेता कुंवर बासित अली को बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा का अध्यक्ष बनाया है. आखिर जो पार्टी मुस्लिम सांसदों के बिना भी बार-बार चुनाव जीतकर तीसरी बार सरकार चला रही है, उसने अचानक इन दो मुस्लिम चेहरों को इतना बड़ा प्रमोशन क्यों दिया? क्या है हिंदुत्व की पिच पर बीजेपी का ये मुस्लिम प्रयोग? विस्तार से जानिए पूरी कहानी.
बीजेपी और मुस्लिम समाज से रिश्ता!
जब भी बीजेपी और मुस्लिम समाज के रिश्तों की बात होती है, तो एक खास तरह का नैरेटिव सामने आता है कि बीजेपी तो हिंदुओं की पार्टी है इसलिए शाहनवाज हुसैन, मुख्तार अब्बास नकवी जैसे नेता साइड कर दिए. जब ये हुआ तब पार्टी ने पारंपरिक, भाषणबाज राजनीतिक चेहरों को पीछे छोड़कर एक ऐसे शख्स को अपनी राष्ट्रीय टीम का 'चेहरा' बनाया जो कभी राजनीति में नहीं रहा. प्रोफेसर (डॉ.) तारिक मंसूर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के वाइस चांसलर की कुर्सी से देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने तक का उनका सफर बेहद दिलचस्प और रणनीतिक है.
कौन हैं तारिक मंसूर?
तारिक मंसूर अलीगढ़ के हैं. उनका परिवार अलीगढ़ के पढ़े-लिखे मुस्लिम समाज से ताल्लुक रखता है. तारिक मंसूर की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई अलीगढ़ में ही हुई. बड़े हुए तो उन्होंने मेडिकल करियर चुना. आगे चलकर काबिल सर्जन बने भी. उन्होंने एएमयू के ही 'जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज'(JNMC) से MBBS और फिर एमएस (MS) की डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने इसी कॉलेज के सर्जरी विभाग में प्रोफेसर के तौर पर लंबे समय तक नौकरी की. मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल और चीफ मेडिकल सुपरिटेंडेंट भी रहे.
उनका बड़ा प्रमोशन तब हुआ जब मोदी सरकार के समय उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर नियुक्त किया गया. उनके ही कार्यकाल के दौरान 2019 में सीएए-एनआरसी (CAA-NRC) विरोधी आंदोलन के समय एएमयू में भारी तनाव हुआ. उनके ही कार्यकाल में एएमयू ने स्थापना के 100 साल पूरे किए, जिसके शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए.
पद से इस्तीफा और बीजेपी में एंट्री
अप्रैल 2023 में प्रो. तारिक मंसूर का वाइस चांसलर के रूप में कार्यकाल समाप्त होने में कुछ ही हफ्ते बचे थे, लेकिन उन्होंने समय से पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया. लोग हैरान हुए क्योंकि करियर में इतना कुछ हासिल करने के बाद इस्तीफा देकर न केवल राजनीति में आए बल्कि बीजेपी ज्वाइन की. पार्टी में आते ही कुछ घंटों के भीतर उन्हें यूपी विधान परिषद का MLC बनाया गया. और तीन महीने बाद, जुलाई 2023 में बीजेपी ने उन्हें सीधे पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त कर सबको चौंका दिया. तब जेपी नड्डा बीजेपी अध्यक्ष हुआ करते थे. बीजेपी जैसी पार्टी में इतनी तेज तरक्की सबके नसीब में नहीं होती. नितिन नवीन की टीम बनाने के लिए बहुत सारे पुराने चेहरे हटाकर नए-नए चेहरे लाए गए लेकिन तारिक मंसूर की पोजिशन बनी रही.
क्यों बनी रही तारिक मंसूर की जगह?
प्रो. तारिक मंसूर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए रखने से बीजेपी के बहुत सारे काम आसान होते हैं. तारिक मंसूर जैसे बुद्धिजीवी मुसलमान चेहरे के साथ पसमांदा और बुद्धिजीवी मुस्लिमों के बीच आउटरीच बढ़ती है. AMU जैसी यूनिवर्सिटी का एक्स वाइस चांसलर का होना उनके लिए प्लस प्वाइंट है. कहानी सिर्फ तारिक मंसूर पर आकर नहीं रुकती. बीजेपी की नई मुस्लिम आउटरीच पॉलिसी ही तो है.
बीजेपी ने शुरू से मुसलमानों को रखा अपने साथ!
बीजेपी हिंदू पार्टी की ब्रैंडिंग एक्सीडेंटल नहीं हुई. बरसों तक इस पर काम हुआ. जब पार्टी खुद को हिंदू पार्टी बना रही थी तब भी उसने मुसलमान नेताओं को अपने साथ रखा और टॉप पोजिशन पर बिठाया. इसे फैशन भी कह सकते हैं, दस्तूर और सोची समझी स्ट्रैटजी भी. ये आज की बात नहीं है. अस्सी-नब्बे के दशक में जब जनसंघ से निकलकर बीजेपी का जन्म हुआ, तब सिकंदर बख्त और आरिफ बेग जैसे नाम पार्टी के सबसे बड़े और शुरुआती मुस्लिम चेहरे बने. ये वो दौर था जब बीजेपी पर कट्टर हिंदूवादी होने के ठप्पे को हटाने के लिए इन चेहरों को मंच पर सबसे आगे बिठाया जाता था.
सिकंदर बख्त बीजेपी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद पर रहे. 1996 और 1998 की अटल बिहारी वाजपेयी सरकारों में विमान मंत्री, विदेश मंत्री और राज्यसभा में सदन के नेता भी रहे. अंतिम दिनों में केरल के राज्यपाल भी बने. जनसंघ के दौर से जुड़े आरिफ बेग 1977 की जनता पार्टी सरकार में केंद्रीय वाणिज्य और नागरिक आपूर्ति राज्य मंत्री बने थे. बाद में बीजेपी बनी तो उन्हें राष्ट्रीय सचिव बनाया गया. इन दो मुसलमान चेहरों के दम पर बीजेपी ने हिंदू पार्टी बनते हुए सेक्युलर इमेज भी बनाई. राजनीति का सिम्बॉलिक दौर था, जहां एक या दो चेहरों के दम पर पार्टी सबका साथ, सबका विश्वास की लाइन पर चला करती थी.
इसके बाद आया नया दौर- मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन का. दोनों बरसों तक संसद और वाजपेयी से लेकर मोदी कैबिनेट तक में बीजेपी के मुस्लिम पोस्टर बॉय बने रहे. मुख्तार अब्बास नकवी 1998 में रामपुर से लोकसभा चुनाव जीतकर बीजेपी के पहले मुस्लिम सांसद बने. वाजपेयी सरकार में मंत्री बने. उनकी पूछ का सिलसिला मोदी सरकार तक चला. बिहार से शाहनवाज हुसैन तेजी से बीजेपी में आगे बढ़े. देश की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाली किशनगंज सीट बीजेपी के टिकट पर जीतकर आए. उनकी भी पूछ वाजपेयी से लेकर मोदी सरकार तक रही.
बीजेपी में नहीं है कोई मुस्लिम सांसद
आज बीजेपी का पूरे देश से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है. सरकार में भाजपा कोई मुस्लिम मंत्री नहीं है. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में दानिश आजाद अंसारी एकमात्र मुस्लिम राज्य मंत्री हैं, जो सीधे संगठन से लाए गए थे लेकिन वो भी विधायक नहीं थे. उन्हें MLC बनाकर एडजस्ट किया गया. तारिक और बासित अली नेशनल टीम के मुस्लिम चेहरे बने हैं.
वक्त के साथ ही बदली बीजेपी की रणनीति
लेकिन वक्त बदला, तो बीजेपी की रणनीति भी बदल गई. 2022 आते-आते नकवी का राज्यसभा टिकट कट गया और शाहनवाज हुसैन भी लोकसभा हारने के बाद दिल्ली की राजनीति से दूर बिहार की राजनीति तक सीमित हो गए. राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं आम थीं, क्या बीजेपी में अब मुस्लिम नेताओं का दौर खत्म हो चुका है? लेकिन ऐसा नहीं था. असल में, बीजेपी अपनी रणनीति को 'री-इन्वेंट' कर रही है.
बीजेपी ने पारंपरिक नेताओं की जगह, पढ़े-लिखे और प्रबुद्ध मुसलमानों को तरजीह देना शुरू किया. लगभग एक दशक के सूखे के बाद, जब राष्ट्रीय राजनीति में किसी नए मुस्लिम चेहरे को इतना बड़ा सांगठनिक ओहदा नहीं मिला था, 2023 में बीजेपी ने सबको चौंका दिया. AMU के वाइस चांसलर पद से इस्तीफा देते ही प्रो. तारिक मंसूर बीजेपी में तेजी से ऊपर चढ़ने लगे. नितिन नवीन की नई राष्ट्रीय टीम में भी तारिक मंसूर को दोबारा इस पद पर बनाए रखना ये इशारा है बीजेपी को उनके जरिए कुछ अपना फायदा दिख रहा है.
बीजेपी ने तारिक मंसूर को क्यों दी इतनी तवज्जो?
सवाल ये है कि शाहनवाज हुसैन और मुख्तार अब्बास नकवी जैसे नेताओं के होते हुए बीजेपी ने एक गैर-राजनीतिक प्रोफेसर को इतनी बड़ी तवज्जो क्यों दी? इसके पीछे बीजेपी की गहरी और दूरगामी रणनीति है कि पोस्टर बॉय नहीं, बौद्धिक मुस्लिम चेहरा चाहिए. बीजेपी अब मुस्लिम समाज के सामने सिर्फ वोट मांगने वाले चेहरे को नहीं रखना चाहती. ऐसा चेहरा चाहिए जिसकी स्वीकार्यता एजुकेटेड मुस्लिमों के बीच हो.
बीजेपी के साथ मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए नहीं, संतुष्टिकरण जुड़ रहे हैं. उस नैरेटिव को भी तोड़ना चाहती है कि बीजेपी मुस्लिम विरोधी है. सरकारी योजनाओं के जो करोड़ों मुस्लिम लाभार्थी हैं, उन तक पहुंचने के लिए भी ऐसे चेहरे पुल का काम करेंगे तारिक मंसूर इस पैमाने पर बिल्कुल फिट बैठते हैं. उन्होंने कभी भी भड़काऊ या कट्टरपंथी राजनीति का समर्थन नहीं किया, जो बीजेपी की 'सबका साथ, सबका विकास' की थ्योरी के अनुकूल है.
सिकंदर बख्त और आरिफ बेग के दौर में बीजेपी को मुस्लिम चेहरों की जरूरत सिर्फ खुद को 'धर्मनिरपेक्ष' साबित करने के लिए होती थी. नकवी और शाहनवाज के दौर में यह जरूरत चुनावी प्रतिनिधित्व तक सीमित रही. लेकिन प्रो. तारिक मंसूर का उभार दिखाता है कि बीजेपी अब मुस्लिम समाज के भीतर एक नया वैचारिक नेतृत्व तैयार कर रही है. एक डॉक्टर, एक कुलपति, एक विधायक और अब देश की सबसे बड़ी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, तारिक मंसूर की यह जर्नी आधुनिक राजनीति का एक बेहद दिलचस्प और अनूठा अध्याय बन चुकी है.
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