उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में एक प्रसिद्ध बड़ागांव मंदिर है. इस मंदिर की कार्यकारिणी समिति ने एक बड़ा फरमान जारी करते हुए महिलाओं और लड़कियों के पहनावे पर पाबंदी लगा दी है. अब मंदिर परिसर में छोटे कपड़े, जींस-टॉप और मिनी स्कर्ट पहनकर आने वालों को प्रवेश नहीं दिया जाएगा.
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मंदिर परिसर में अचानक लगे एक पोस्टर ने पूरे इलाके में हलचल मचा दी है. इस पोस्टर में साफ तौर पर लिखा है कि मंदिर एक पवित्र स्थान है और यहां की मर्यादा बनाए रखना हर श्रद्धालु की जिम्मेदारी है. समिति का कहना है कि भगवान के दर्शन के लिए आने वालों को भारतीय संस्कृति के अनुरूप शालीन और पारंपरिक कपड़ों में ही आना चाहिए.
जींस-टॉप में नो एंट्री
मंदिर कमेटी द्वारा लिए गए इस फैसले के बाद अब मंदिर के गेट पर ही 'ड्रेस चेक' जैसी स्थिति बन गई है. कमेटी ने स्पष्ट किया है कि हाफ पैंट, बरमूडा, मिनी स्कर्ट या फटे हुए जींस जैसे आधुनिक फैशन के कपड़ों में आने वाले श्रद्धालुओं को बाहर से ही वापस लौटना पड़ेगा. मंदिर प्रबंधन का तर्क है कि इस तरह के कपड़े धार्मिक वातावरण की गंभीरता को कम करते हैं.
क्या कहना है मंदिर प्रबंधन का?
मंदिर समिति के प्रबंधक त्रिलोक जैन ने इस फैसले की पुष्टि करते हुए कहा, "हमने यह ड्रेस कोड इसलिए लागू किया है क्योंकि अक्सर देखा जा रहा था कि लड़कियां और महिलाएं हाफ पैंट या बहुत छोटे कपड़े पहनकर मंदिर आ रही थीं. यह मंदिर की मर्यादा के खिलाफ है इसलिए कमेटी ने मिलकर यह बैनर लगाने का फैसला किया है."
वहीं समिति के सदस्य पवन जैन ने अनुशासन पर जोर देते हुए कहा, "मंदिर में सादगी और मर्यादा का पालन होना चाहिए. आजकल महिलाओं का पहनावा मंदिर की परंपराओं के अनुकूल नहीं दिख रहा था. ड्रेस कोड लागू होने से परिसर में एक अनुशासन बना रहेगा."
बढ़ रही है ड्रेस कोड की परंपरा
बागपत का यह मामला नया नहीं है. पिछले कुछ समय में देश के कई बड़े मंदिरों ने इसी तरह के नियमों को लागू किया है. हालांकि, बागपत के बड़ागांव मंदिर में महिलाओं के कपड़ों को लेकर दिए गए सीधे निर्देशों ने स्थानीय स्तर पर बहस छेड़ दी है. जहां कुछ लोग इसे संस्कृति की रक्षा बता रहे हैं, वहीं कुछ इसे व्यक्तिगत आजादी में हस्तक्षेप मान रहे हैं.
फिलहाल, मंदिर कमेटी अपने इस फैसले पर पूरी तरह अडिग है. मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं से अपील की जा रही है कि वे विवाद से बचने के लिए शालीन वस्त्रों का ही चुनाव करें.
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