गाजियाबाद ट्रिपल मौत मामले में बड़ा खुलासा... 2015 में पिता के लिव-इन पार्टनर ने ली थी खुद की जान

गाजियाबाद की एक हाईराइज सोसायटी में तीन नाबालिग बहनों के आत्महत्या करने से सनसनी फैल गई है और जांच में मोबाइल फोन, पारिवारिक माहौल व पुराने मामलों समेत कई पहलुओं की पड़ताल हो रही है.

गाजियाबाद
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हिमांशु मिश्रा

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गाजियाबाद के हाईराइज सोसायटी की नौवीं मंजिल से तीन नाबालिग बहनों के कूदकर जान देने की घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. बल्कि जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे- वैसे परिवार से जुड़ी ऐसी बातें सामने आ रही हैं जो इस त्रासदी को और ज्यादा उलझा रही हैं.

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उस रात क्या हुआ?

भारत सिटी सोसायटी में रहने वाले लोगों की मानें तो हादसे वाली रात सब कुछ बिल्कुल सामान्य लग रहा था. किसी को इस बात का जरा सा भी अंदेशा नहीं था कि कुछ ही देर में ऐसा हादसा हो जाएगा. 16, 14 और 12 साल की तीनों बहनें अपने कमरे में थीं. रात के दौरान उन्होंने बिल्डिंग से छलांग लगा दी.

घटना के बाद कमरे से एक सुसाइड नोट और नौ पन्नों की एक पॉकेट डायरी बरामद हुई. पुलिस के अनुसार, नोट में लड़कियों ने अपने पिता को संबोधित किया है. जबकि उसमें मां का जिक्र नहीं मिला. इससे जांच अधिकारियों को लग रहा है कि बच्चियां भावनात्मक रूप से पिता के ज्यादा करीब थीं.

मोबाइल फोन बना तनाव की वजह?

जांच में एक अहम बात मोबाइल फोन से जुड़ी सामने आई है. बताया जा रहा है कि पिता ने कुछ समय पहले बेटियों के फोन ले लिए थे. उन्हें चिंता थी कि बच्चियां कोरियन ऐप्स, ऑनलाइन गेम्स और विदेशी लोगों से ज्यादा जुड़ रही हैं.

इतना ही नहीं बाद में फोन बेच भी दिए गए. घटना वाली रात लड़कियों ने अपनी मां का फोन इस्तेमाल करने की कोशिश की, लेकिन जिन ऐप्स को वे खोलना चाहती थीं, वे उसमें नहीं थे.

डीसीपी निमिष पाटिल के मुताबिक फॉरेंसिक जांच में मां के फोन में ऐसे किसी ऐप का डेटा नहीं मिला है. अब साइबर टीम बेचे गए मोबाइल के IMEI नंबर के जरिए उन्हें खरीदने वालों तक पहुंचने और पुराना डेटा निकालने की कोशिश कर रही है. जांच से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि परिवार के बयानों और डिजिटल गतिविधियों के बीच कुछ अंतर नजर आ रहा है.

2015 का पुराना मामला फिर चर्चा में

इस केस की जांच के दौरान पुलिस रिकॉर्ड खंगालने पर एक पुरानी घटना भी सामने आई. आज तक की रिपोर्ट के अनुसार साल 2015 में लड़कियों के पिता की लिव-इन पार्टनर की मौत हो गई थी. वह साहिबाबाद के राजेंद्र नगर इलाके में एक फ्लैट की छत से गिरी हुई मिली थीं.

ट्रांस हिंडन के डीसीपी निमिष पाटिल ने बताया कि शुरुआत में मामला संदिग्ध लगा था, लेकिन बाद की जांच में इसे आत्महत्या मानकर बंद कर दिया गया था. फिलहाल पुलिस यह नहीं कह रही कि दोनों घटनाओं के बीच कोई सीधा संबंध है, लेकिन परिवार की पृष्ठभूमि समझने के लिए इस मामले को भी देखा जा रहा है.

जटिल पारिवारिक ढांचा भी जांच के दायरे में

पूछताछ में यह भी सामने आया है कि तीनों बहनों के पिता की तीन शादियां हैं, और हैरानी की बात यह है कि तीनों पत्नियां आपस में सगी बहनें हैं. पुलिस अब यह समझने की कोशिश कर रही है कि क्या घर का माहौल, रिश्तों की उलझन या भावनात्मक अस्थिरता का असर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा. एक अधिकारी के मुताबिक, यह देखा जा रहा है कि परिवार का वातावरण बच्चों के लिए सहारा देने वाला था या दबाव बनाने वाला.

सुसाइड नोट और डायरी से क्या संकेत?

बरामद सुसाइड नोट और डायरी फिलहाल फॉरेंसिक लैब में जांच के लिए भेजी गई हैं. हैंडराइटिंग, फिंगरप्रिंट और स्याही की जांच की जा रही है. शुरुआती जानकारी के अनुसार, नोट में तनाव और निराशा जैसी भावनाएं झलकती हैं, लेकिन पूरी बात अभी सार्वजनिक नहीं की गई है.

जांचकर्ता यह भी पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह फैसला अचानक लिया गया या बच्चियां लंबे समय से मानसिक दबाव में थीं.

महिला आयोग ने जताई चिंता

उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. बबीता सिंह ने परिवार से मुलाकात की. उनका कहना है कि मामला सिर्फ मोबाइल या ऐप्स तक सीमित नहीं लगता. शुरुआती संकेत बताते हैं कि पढ़ाई का दबाव और माता-पिता की अनदेखी भी वजह हो सकती है.

उन्होंने कहा कि बच्चों की मानसिक स्थिति को समय रहते समझा नहीं गया. आयोग ने इस मामले में प्रशासन और पुलिस से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है.

हर पहलू से हो रही जांच

फिलहाल पुलिस आत्महत्या के एंगल से जांच कर रही है, लेकिन किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले हर पहलू की बारीकी से पड़ताल की जा रही है. जांच के केंद्र में डिजिटल गतिविधियां, पारिवारिक रिश्ते, घरेलू माहौल, सुसाइड नोट, पुराना केस और सामाजिक दायरा- सब शामिल हैं. डीसीपी पाटिल ने साफ कहा है कि बिना ठोस सबूत के कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जाएगा.

समाज के लिए एक बड़ा सवाल

तीन बहनों की मौत सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि समाज के सामने भी कई सवाल छोड़ गई है. क्या हम बच्चों की खामोशी को समझ पाते हैं? क्या उनके डिजिटल व्यवहार के पीछे छिपी भावनाओं को पहचान रहे हैं? यह घटना एक चेतावनी की तरह है कि बच्चों से बातचीत, उनका मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक जरूरतें शायद पहले से ज्यादा ध्यान मांगती हैं.

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