Harish Rana Case: हरीश राणा को आखिरी तिलक करने वाली रुपा दीदी ने कैमरे पर बताई अंतिम विदाई की भावुक करने वाली कहानी

13 साल तक कोमा में रहने वाले हरीश राणा अब इस दुनिया में नहीं रहे. उनके अंतिम सफर और उस आखिरी तिलक की पूरी कहानी ब्रह्माकुमारी रूपा दीदी ने बताई है. परिवार के संघर्ष और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हरीश को आखिरकार वो मुक्ति मिल गई जिसका सबको इंतजार था.

Harish Rana death news
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गौरव कुमार पांडेय

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Harish Rana death news:13 साल तक बिस्तर पर बेजान पड़े रहे हरीश राणा अब पंचतत्व में विलीन हो चुके हैं. बुधवार को दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित मुक्ति धाम में उनका अंतिम संस्कार किया गया. इस दौरान हरिश के  अंतिम संस्कार में शामिल ब्रह्माकुमारी रूपा दीदी ने इस भावुक पल की पूरी कहानी बयां की है. उनहोंने हमारे सहयोगी यूपी तक से बातचीत करते हुए कहा कि हरीश राणा की आत्मा पिछले 13 वर्षों से शरीर रूपी पिंजरे में कैद थी. उन्होंने बताया कि  उन्हाेंने  तिलक लगाकर हरीश को अंतिम विदाई दी.

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पिंजरे से पंछी के उड़ जाने की कहानी

रूपा दीदी ने बताया कि हरीश राणा पिछले 13 सालों से एक ऐसे शरीर में कैद थे जो किसी पिंजरे जैसा था. वह न कुछ बोल सकते थे और न ही कोई प्रतिक्रिया दे सकते थे. जब सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया, तो दीदी ने हरीश के पास बैठकर 20 मिनट तक ध्यान लगाया. उन्होंने हरीश को तिलक लगाया और उनसे कहा कि अब उड़ जाने का समय आ गया है. इसका मतलब था कि अब वह इस पुराने शरीर को छोड़कर नई यात्रा पर निकलें.

माफी और कार्मिक हिसाब किताब का अंत

अंतिम विदाई के समय रूपा दीदी ने हरीश से कहा कि वह सबको माफ कर दें और जिनसे भी अनजाने में कोई गलती हुई हो, उनसे माफी मांग लें. उन्होंने समझाया कि तिलक आत्मा का निवास स्थान होता है और वहीं से विदाई का संदेश दिया गया ताकि हरीश अपना कार्मिक हिसाब पूरा कर सकें. यह पल बेहद भावुक था क्योंकि एक बहन अपने भाई को इस तरह विदा नहीं करना चाहती, लेकिन हरीश के कल्याण के लिए यह जरूरी था.माता-पिता का महान संकल्प और भाई का त्याग
इस पूरे संघर्ष में हरीश के माता-पिता ने जो धैर्य दिखाया, उसे रूपा दीदी ने 'मोहजीत' बताया है. यानी जिन्होंने अपने मोह पर जीत हासिल कर ली हो. उन्होंने कहा कि धन्य है वह मां जिसने अपने बेटे को कष्ट से मुक्त करने के लिए इतना बड़ा फैसला लिया. वहीं हरीश के छोटे भाई आशीष ने लक्ष्मण की तरह अपने बड़े भाई की सेवा की. परिवार के हर सदस्य ने, चाहे वह बहन हो या दामाद, गुप्त रूप से हरीश की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी.

शरीर की हालत और मां का वो फैसला

रूपा दीदी ने बताया कि पिछले कुछ सालों में हरीश की स्थिति बहुत खराब हो गई थी. शरीर बहुत कमजोर हो चुका था और जगह-जगह जख्म हो गए थे. हालांकि उनका चेहरा चमकता था, लेकिन आंखों में कोई रोशनी नहीं थी और वह सुन भी नहीं पाते थे. माता-पिता को अक्सर लगता था कि वह कुछ बोलना चाहते हैं, लेकिन असल में वह सिर्फ शारीरिक हलचल थी. इसी पीड़ा को देखते हुए मां ने उन्हें मुक्त करने का साहसी कदम उठाया.

अंतिम सफर और माउंट आबू में विशेष प्रार्थना

हरीश की विदाई में समाज के हर वर्ग, वकीलों, डॉक्टरों और सरकार का सहयोग रहा. परिवार अब हरीश की आत्मा की शांति के लिए ब्रह्माकुमारीज के मुख्यालय माउंट आबू जाएगा. वहां उनके निमित्त विशेष भोग लगाया जाएगा और परमात्मा से प्रार्थना की जाएगी. रूपा दीदी का मानना है कि हरीश की आत्मा अब ऊपर बैठकर सबको दुआएं दे रही है क्योंकि उसे आखिरकार 13 साल के लंबे दर्द से आजादी मिल गई है.

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