Kidney Racket Kanpur Case: उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक बड़े किडनी रैकेट गिरोह का खुलासा हुआ है. बताया जा रहा है इस शातिर गिरोह का जाल विदेशों तक फैला हुआ था. दावा है कि ये पूरा गिरोह एक टेलीग्राम से संचालित होता था. इस ग्रुप से किडनी डोनर और किडनी रिसीपेंट के बीच बातचीत होती थी. इसके बाद आगे का प्रोसेस शुरू हाेता था. पुलिस जांच पता चला है कि ये गिरोह अब तक 50 से 60 से ज्यादा लोगों की किडनी अवैध रूप से निकाल चुका है. इस काले धंधे में शामिल लोग डोनर को चंद लाख रुपये देकर रिसीपेंट (रिसीवर) से 60 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपये तक वसूलते थे. पुलिस ने इस मामले में अस्पताल संचालकों और बिचौलियों समेत कई लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है. ऐसे में चलिए जानते हैं इस पूरे मामले की इनसाइड स्टोरी..
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8वीं पास एम्बुलेंस ड्राइवर बना फर्जी डॉक्टर
इस पूरे रैकेट का सबसे हैरान करने वाली ये है कि इस पूरे गिरोह का संचालन एक 8वीं पास शिवम अग्रवाल उर्फ कान्हा कर रहा था. बताया जा रहा है कि आरोपी शिवम पहले एम्बुलेंस का ड्राइवर था. लेकिन पैसों के लालच के चक्कर में वो किडनी रैकेट का काम करने लगा. इसके लिए आरोपी ने पूरा डॉक्टर वाला गेटअप घारण किया हुआ था. वो स्टेथोस्कोप को गले में डालकर फर्जी डॉक्टर बनकर घूमता था और मरीजों को झांसे में लेकर उनका भरोसा जीतता था. इसके बाद वो डोनर और रिसीपेंट को जाल में फंसाता था. इसके लिए वो खुद को डाॅक्टर बताकर मेरठ और बिहार जैसे राज्यों में डोनर और रिसीवर का इंतजाम करता था. आरोपी ने पुलिस के सामने कबूल किया है वो इस गिरोह में लाेकल चीजों को अरेंजमेंट देखता था और मरीजों की देखरेख का काम संभालता था.
टेलीग्राम से ऐसे संचालित होता था गिरोह
पुलिस जांच में इस गिरोह का सबसे अहम गवाह बना वो टेलीग्राम ग्रुप, जिसका इस्तेमाल इस रैकेट को चलाने के लिए किया जाता था. जांच एजेंसियों के मुताबिक मेरठ का डॉक्टर अफजाल इस नेटवर्क का हेड था. आरोप है कि टेलीग्राम ग्रुप बनाने के पीछे अफजाल का ही हाथ था. इसी नेटवर्क के जरिए आरोपियों ने बिहार के समस्तीपुर के आयुष चौधरी नामक एक MBA के स्टूडेंट को पैसों का लालच देकर झांसे में फंसाया और फिर उसे कानपुर बुलाया. यहां उसकी किडनी निकाल ली गई. अपने क्लाइंट को ढूंढने के लिए गिरोह के सदस्यों की नजरें डायलिसिस सेंटरों पर रहती थी. वे यहां आने वाले किडनी के पेशेंट्स को अपना निशाना बनाते थे.
अस्पताल में फिल्मी स्टाइल में होता था ऑपरेशन
एक बार अगर डोनर और रिसीपेंट मिल जाए तो इसके बाद कानपुर के आहूजा और आरोही जैसे अस्पतालों में इन ऑपरेशनों कर किडनी ट्रांसप्लांट की जाती थी. इस पूरे प्रोसेस को बेहत सीक्रेट तरीके से अंजाम दिया जाता था. बताया जाता है कि अस्पताल में मरीज के किडनी ट्रांसप्लांट के दिन वहां के स्टाफ को छुट्टी दे दी जाती थी. इसके बाद बाहर से डॉक्टरों की एक टीम बुलाई जाती थी. इस टीम को डॉक्टर रोहित नाम का एक व्यक्ति लीड करता था. इस दौरान स्पताल के किसी भी रिकॉर्ड या रजिस्टर में इन मरीजों की एंट्री नहीं की जाती थी.
80 लाख खर्च करने के बाद भी जिंदगी खतरे में
इस घटना की लापवाही का ताजा शिकार बनीं मेरठ की रहने वाली पारुल तोमर. पारुल की दोनों किडनियां खराब हो चुकी थी. ऐसे में उन्हें भी इस ग्रुप में जोड़ा गया. उनके लिए बिहार के आयुष चौधरी काे डोनर के रूप में सामने आए थे. अपने किडनी ट्रांसप्लांट के पूरे प्रोसेस में पारुल ने करीब 80 लाख रुपये खर्च किए. लेकिन अस्पताल की लापरवाही के चलते उन्हें इन्फेक्शन हो गया. ट्रांसप्लांट के बाद उनकी हालत बिगड़ गई. हीमोग्लोबिन गिरकर 6.3 पर आ गया. इसके बाद उन्हें लखनऊ के पीजीआई अस्पताल में भर्ती करना पड़ा. फिलहाल वे अब जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही हैं.
पुलिस की छापेमारी और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन
इस पूरे मामले में कानपुर पुलिस कमिश्नर और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने आहूजा हॉस्पिटल में छापेमारी की. पुलिस ने यहां से हॉस्पिटल के संचालक डॉक्टर प्रीति आहूजा और उनके पति सुरजीत सिंह आहूजा को गिरफ्तार किया है. जांच के दौरान पुलिस को इस रैकेट के अंतरराष्ट्रीय तार जुड़ने के भी संकेत मिले हैं. मामले में एक विदेशी महिला के ट्रांसप्लांट की बात भी सामने आई है. अब पुलिस गिरोह के फोन से डाटा रिकवर करने की कोशिश कर रही है और साथ ही फरार आरोपियों की तलाश में जुटी है.
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