असली शंकराचार्य और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर क्या है विवाद की पूरी कहानी

Real Shankaracharya controversy: प्रयागराज माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है. मौनी अमावस्या पर स्नान से रोके जाने, धरना प्रदर्शन और मेला प्रशासन द्वारा नोटिस दिए जाने के बाद सवाल उठ रहा है कि असली शंकराचार्य कौन हैं. सुप्रीम कोर्ट में लंबित पट्टाभिषेक विवाद, चार शंकराचार्य पीठों की परंपरा और समर्थन को लेकर जानिए इस पूरे मामले की पूरी कहानी विस्तार से.

Real Shankaracharya controversy
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और असली शंकराचार्य विवाद

रजत सिंह

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उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहा माघ मेला सुर्खियों में बना हुआ है. इसके पीछे की वजह इस बार कोई आपदा या कोई अनहोनी नहीं बल्कि ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती है. मौनी अमावस्या के दिन कथित तौर पर उन्हें स्नान करने से रोका गया है जिसके बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती धरने पर बैठ गए है. उन्होंने आरोप लगाया है कि प्रशासन ने शंकराचार्य के पद और हिंदू धार्मिक आस्था का अपमान किया है. वहीं प्रयागराज मेला प्रशासन उनके इस आरोपों से इनकार कर रही है.

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इसी बीच अब नया बवाल और खड़ा हो गया है. प्रयागराज मेला प्रशासन ने अविमुक्तेश्वरानंद को एक नोटिस सौंपकर सवाल किया है कि जब आपके पद का मामला सुप्रीम कोर्ट में है तो आप खुद को किस आधार पर शंकराचार्य कह रहे है. अब इस पर भी वे भड़क गए है. तो ऐसे में एक सवाल उठ रहा है कि असली शंकराचार्य कौन हैं? आइए विस्तार से समझते हैं पूरी बात.

पहले जानिए ताजा विवाद 

प्रयागराज में माघ मेला लगा हुआ है जहां अलग-अलग जगहों से लोग स्नान के लिए आ रहे है. इसी दौरान मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और पुलिस के बीच एक तीखी झड़प हुई. जिसके बाद वे धरना पर बैठे तो अब प्रयागराज मेला प्रशासन ने उनके शिविर पर एक नोटिस चस्पा किया. इस नोटिस में उनसे 24 में जवाब मांगा कि वे अपने नाम के आगे 'शंकराचार्य' शब्द का प्रयोग कैसे कर रहे हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उनके पट्टाभिषेक को लेकर कुछ आदेश दिए है.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने दिया अपना जवाब

इस नोटिस को लेकर अविमुक्तेश्वरानंद फिर से भड़क गए है. उन्होंने साफ-साफ कहा है कि प्रशासन, मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति यह तय नहीं कर सकते हैं कि कौन शंकराचार्य होगा और कौन नहीं. उन्होंने कहा कि शंकराचार्य ही शंकराचार्य का निर्णय करते है. उनके मुताबिक चार में से दो पीठों(शृंगेरी और द्वारका) का उन्हें लिखित तौर पर समर्थन प्राप्त है और इसके अलावा तीसरी पीठ(पुरी) की मौन स्वीकृति भी है. शृंगेरी और द्वारका के शंकराचार्यों ने उन्हें मान्यता दे दी है और उनके साथ स्नान भी कर चुके हैं.

पद को लेकर क्या है विवाद?

दरअसल अक्तूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी, जिसमें उनके पट्टाभिषेक पर रोक लगाने की मांग की गई थी. कोर्ट ने सुनवाई के बाद आदेश दिया था फिलहाल कोई भी नया पट्टाभिषेक ना किया जाए. वहीं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के वकील का कहना है कि कोर्ट के आदेश से पहले ही सितंबर 2022 में उनका पट्टाभिषेक शृंगेरी और द्वारका में विधिवत रूप से पूरा हो चुका था. इसलिए वे शंकराचार्य है. यह विवाद 1992 से चला आ रहा है जब अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हुआ था. उनके निधन के बाद उत्तराधिकारी को लेकर स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती और अविमुक्तेश्वरानंद के बीच कानूनी लड़ाई अभी तक चल रही है.

शंकराचार्य पीठ और परंपरा

आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने चार पीठों की स्थापना की थी. वर्तमान समय में मान्यता प्राप्त मुख्य नाम इस प्रकार से है: 

  • शारदा पीठ (द्वारका): स्वामी सदानंद सरस्वती
  • ज्योतिष मठ (बद्रिकाश्रम): स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (विवादित/विचाराधीन)
  • गोवर्धन पीठ (पुरी): स्वामी निश्चलानंद सरस्वती 
  • शृंगेरी पीठ (दक्षिण): स्वामी भारती तीर्थ जी

फिलहाल, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती मौखिक और पीठों की परंपरा के मुताबिक खुद को शंकराचार्य मानते हैं. लेकिन कानूनी तौर पर अभी भी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

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