Saharanpur Mosque Case: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को ढाए जाने का मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है. इसे मामले में मस्जिद कमेटी के मुतवल्ली मोहम्मद तनवीर अहमद कोर्ट पहुंचे हैं. इस याचिका में प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. मामला कानूनी और प्रशासनिक दोनों ही स्तरों पर बड़ा रूप ले लिया है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रशासन ने बिना कोई कानूनी नोटिस जारी किए और बिना किसी ध्वस्तीकरण आदेश के ही यह कार्रवाई कर दी. इसके साथ ही याचिका में पूजा स्थल अधिनियम के उल्लंघन की बात भी कही गई है. इस कानूनी लड़ाई में जिला प्रशासन, राज्य सरकार के अलावा शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड को पक्षकार बनाया गया है. माना जा रहा है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस मामले पर अगले हफ्ते तक सुनवाई कर सकता है.
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जमीयत उलेमा-ए-हिंद की एंट्री और नेताओं से मुलाकात
इस मामले में दिल्ली से जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की बात कही थी. जमीयत का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल स्थिति का जायजा लेने के लिए सहारनपुर पहुंचा था. इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने पूर्व सांसद व सपा नेता हाजी फजलुर रहमान और इस केस की पैरवी कर रहे अधिवक्ता नौशाद अली से मुलाकात कर पूरे मामले पर चर्चा की थी.
जिला अदालत जाने की बताई गई वजह
वक्फ ट्रिब्यूनल की जगह सीधे जिला अदालत का रुख करने पर पूर्व सांसद हाजी फजलुर रहमान ने स्थिति स्पष्ट की. उनका कहना था कि ट्रिब्यूनल में काफी समय से जज नहीं बैठ रहे थे, जिससे वहां से तुरंत राहत मिलने की उम्मीद कम थी. इसी वजह से जिला अदालत का दरवाजा खटखटाया गया था, लेकिन वहां से उम्मीद के विपरीत फैसला आया.
रात के अंधेरे में कार्रवाई पर उठे सवाल
उन्होंने सवाल उठाते हुए जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना हकीमुद्दीन कासमी ने इसे सरासर नाइंसाफी करार दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि रात के अंधेरे में फैसले लेकर मस्जिद को शहीद कर दिया गया और इंसाफ के तमाम रास्ते बंद कर दिए गए. उनका कहना था कि अगर बातचीत और अदालती प्रक्रिया का उचित मौका दिया जाता तो न्याय हो सकता था.
हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकीं सभी की निगाहें
मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद अब सभी की नजरें अगले हफ्ते होने वाली संभावित सुनवाई पर टिकी हैं. माना जा रहा है कि सुनवाई के दौरान अदालत राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन से इस पूरी कार्रवाई का हिसाब मांग सकती है. इस मामले का जो भी फैसला आएगा, वह भविष्य में धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है.
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