उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और प्रशासन के बीच उपजा विवाद अब सियासी रंग ले चुका है. जहां एक ओर उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य इस मामले को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं भाजपा के फायरब्रांड नेता बृजभूषण शरण सिंह ने इस पर बेहद सधी हुई और चौंकाने वाली प्रतिक्रिया दी है. आइए विस्तार से जानते हैं पूरा मामला और विवाद.
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बृजभूषण शरण सिंह ने पल्ला झाड़ा
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर पहुंचे पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह से जब पत्रकारों ने माघ मेले में शंकराचार्य पर लगाई गई पाबंदियों को लेकर सवाल पूछा, तो उन्होंने बहुत ही चतुराई से मामले को टाल दिया. पत्रकार के सवाल को बीच में ही काटते हुए बृजभूषण ने सिर्फ इतना कहा, 'मैं वहां पर था नहीं.' उन्होंने इस विवाद पर किसी भी तरह की टिप्पणी करने से साफ इनकार कर दिया और खुद को इस पूरे मामले से अलग रखा. उनका यह रुख इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वे अक्सर हर मुद्दे पर बेबाकी से अपनी राय रखते हैं.
केशव प्रसाद मौर्य ने की सम्मान की बात
बृजभूषण के रुख से उलट, उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने इस मामले में नरम और सम्मानजनक रुख अपनाया है. उन्होंने स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद को 'पूज्य शंकराचार्य जी' कहकर संबोधित किया और उनके चरणों में प्रणाम करते हुए अपना विरोध खत्म कर संगम स्नान करने का आग्रह किया. मौर्य ने स्पष्ट कहा कि अगर किसी भी पुलिसकर्मी या अधिकारी ने किसी संत का अनादर किया है, तो उसकी जांच कराई जाएगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी.
क्या है पूरा विवाद?
विवाद की शुरुआत मौनी अमावस्या के स्नान के दौरान हुई थी. आरोप है कि मेला प्रशासन ने शंकराचार्य स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को उनकी पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जाने से रोक दिया था. इस दौरान शंकराचार्य के समर्थकों और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक और धक्का-मुक्की भी हुई. इस अपमान से आहत होकर शंकराचार्य धरने पर बैठ गए थे. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस विवाद पर बिना नाम लिए 'कालनेमि' शब्द का इस्तेमाल कर निशाना साधा था, जिससे मामला और गरमा गया.
राजनीति के केंद्र में शंकराचार्य
शंकराचार्य का यह विवाद अब केवल धार्मिक न रहकर पूरी तरह सियासी हो चुका है. विपक्षी दल भी इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में बृजभूषण शरण सिंह का मामले से दूरी बनाना और केशव प्रसाद मौर्य का बीच-बचाव करना, भाजपा के भीतर इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण को दर्शाता है. अब सबकी नजरें शंकराचार्य के अगले कदम पर टिकी हैं.
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